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केवल आतिशबाजी और रोशनी का पर्व नहीं है दिवाली…त्योहार सुख समृद्धि, स्वच्छता, पवित्रता और रोशनी का प्रतीक है यह त्योहार

भारत के इतिहास में त्योहारों का एक अपना ही एक गौरव है। दीपोत्सव ज्योति पर्व के रूप में मनाने की परंपरा अति प्राचीन हैै। यह पर्व ज्योति का प्रतीक माना जाता है क्यों कि कहा जाता हैै कि सुख-समृद्वि एवं ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी उन्हीं के घरों में प्रवेश करती हैं, जिनका घर रंगाई पुताई केे अलावा स्वच्छ, पवित्र एवं रोशनी से जगमगाता हो। अंधेर नगरी में तो लक्ष्मी जी कभी भूल से भी नहीं फटकती हैं। परिणामतरू लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने के लिए दीपोत्सव पर हर व्यक्ति अपने घर दरवाजे की अच्छी तरह सफाई कर घर केे आस-पास भी प्रकाश की व्यवस्था करता हैै।

उत्तर भारत में तो लोग महीनों पूर्व से ही घरों की मरम्मत तथा इसकेे आस-पास एकत्रित कूड़ेे-करकट एवं जंगल-झंखाड़ का दीपोत्सव पर पूरी तरह सफाया कर डालते हैैं। तदुपरांत मकानों की रंगाई, पुताई कर कुुछ शौकीन लोग अपने मकानों की दीवारों पर लक्ष्मी, काली, पार्वती, सरस्वती, हनुमान, गणेश, शिव एवं उनके वाहनों की चित्रकारी करवाते हैैं।
उत्तर भारत केे गांवों में दीपावली आने से 15 दिन पूर्व ही यहां केे युवक एवं बच्चे बांस की कमानी और धागों से विभिन्न तरह केेकैैंडिल व रॉकेेट बनाना आरंभ कर देते हैैं। पुनः इन पर चमकदार व रंगीन चिमचिमी को गम से चिपकाकर बड़़ी कुुशलता से इन्हें सजाते हैं। धर्मशास्त्रों केे अनुरूप उत्तर भारत में दीपोत्सव मनाने की परंपरा बिल्कुुल भिन्न हैै।

दीपावली केे एक दिन पूर्व यहां शाम की बेला में घर केे बाहरी हिस्से में यम दीप जलाने की प्रथा हैै। घर की महिलाएं संध्या में स्नानकर के गोबर से निर्मित यम दीपों में सरसों का तेल और बाती डाल कर प्रज्ज्वलित करती हैैं। पुनः घर केे बाहरी भाग वाले टीले पर इसे रख दिया जाता है। इसे जलाने की परंपरा का मुख्य कारण यह हैै कि इससे यम देवता और उनके वंश अति प्रसन्न होते हैं। फलतरूघर केे किसी सदस्य की अकाल मृत्यु नहीं होती।

दीपावली केे दिन प्रायरू महिलाएं मिट्टी वाले फर्श को गोबर से लिपाई करकेे पुनरू आंगन में रंगीन रंगोली बनाती हैं। संध्या में स्नान केेपश्चात्ड्ढ महिलाएं धुले हुुए दीपों में गाय का शुद्घ घी डाल कर थाल सजाती हैैं और नए परिधानों को पहन कर इन दीपों को गांव स्थित दुर्गा गौरी, विषहरी, सरस्वती, लक्ष्मी एवं काली माता केेमंदिरों में जाकर उन्हेें अर्पित करती हैैं।

वे दरवाजे के अग्रभाग में बांस का घेरा डालकर उस पर गीली मिट्टी बैठाते हैैं। इसी पर डिबियों को सजाते हैं। इनकी सजावट मालाओंका रूप ले लेती हैं। सचमुच ये दीप मालाएं अति चित्ताकर्षक लगती हैैं। घर-आंगन में जो दिये जलाए जाते हैैं वे सभी सरसों के तेल से जलाए जाते हैं। इन्हीं दीपों से यहां केे पुरुष वर्ग दीपावली में खेले जाने वाला चर्चित खेल उक्कापाती खेलते हैैं। उक्कापाती खेलने की परंपरा सदियों पुरानी है।

महिलाएं दीपों कोजलाने के पश्चात घर के पुरुष हाथों में उक्कापाती लेकर दरवाजे केचौखट पर जलते हुुए दीपों से इसे जलाती हैैं। यह सण्टी हल्की और सूखी होने से इसमें अग्नि तुरंत तकड़़ लेती हैै। पुनरू लोग इस जलती हुुई उक्कापाती को चौखट केअंदर बाहर करते हुुए ‘लक्ष्मी घर में और दरिद्रता बाहर’ बोलते जाते हैं। ऐसा वे लोग घर केेसभी चौखटों पर बोलते हैं। पुनरू उन जलती हुुई उक्कापाती को लेकर बड़़ी तेजी से घर केेबाहरी हिस्से में आते हैैं। इन उक्कापातियों को एक जगह एकत्रित करकेे इनकी जलती हुुई लौ को सभी लोग इस पार से उस पार पांच बार तड़़पते हैैं। सभी इन उक्कापातियों में आने वाले पांचों डण्टलों को बुझाकर ठीक उन्हेें वैसे ही पीते हैैं, जैसे लोग हुुक्का पीते हैैं। यही कारण हैै कि इस खेल का नाम उक्कापाती पड़ा है। ऐसी मान्यता है कि इसकेेपीने से मनुष्य सभी रोगों से निजात पा लेते हैैं। बचे हुुए डण्टल घर में सहेेज कर रख लिए जाते हैं।ं
दिवाली का नाम सुनते ही आतिशबाजी दिमाग में घूमने लगती है। आतिशबाजी का सबसे पुराना जिक्र चीन के ग्रंथों में है। प्रोफेसर कैरिगटन गुडरिच की पुस्तक ‘शाट हिस्ट्री ऑफ द चायनीज पीपुल’ में सन्ड्ढ 960-1275 के काल में हुए युद्घों में बारूद के प्रयोग की चर्चा है। चीन के रसायन शास्त्री शोरे और गंधक के प्रयोग का महत्व जान चुके थे।

थाई राजवंश का एक रसायनशास्त्री (जिसका नाम ‘सुन’ था) शोरे, गंधक और कोयले को मिलाकर अग्रिचूर्ण बनाया करता था। इसका उपयोग वह राजवंश के विशेष पुरूषों के लिए करता था। अग्रिचूर्ण की सहायता से धूमबाण, सर्वबाण जैसे पटाखे सिर्फ मनोरंजक प्रयोग था पर बाद में इसका प्रयोग युद्घ में होने लगा। इसी आधार पर यह कहा जाता है कि चीन ही विश्व में पहला देश हैं, जिसने युद्घ में तोप का प्रयोग किया। चीन में सबसे पुरानी तोप 1332 में ढाली गई थी।

सन्ड्ढ 1788 में पोटैशियम क्लोरेट,1865 में मैग्रिशियम और 1894 में एल्यूमिनियम का अविष्कार हुआ। इन तीनों अविष्कारों से आतिशबाजी को एक नया रूप मिला और आतिशबाजी की दुनिया में क्रांति आ गई। भारत में आतिशबाजी का प्रचलन कब से हुआ, यह ठीक ठीक ज्ञात नहीं है पर 1400 के आसपास के ग्रंथों में आतिशबाजी का उल्लेख मिलता है। दक्षिण भारत केेबोगर द्वारा रचित ‘वाणशास्त्रम्ड्ढ’ और ‘बोगरसूत्रम्ड्ढ’ में अग्निग्रचूर्ण बनाने केे लिए कई प्रकार केे सूत्र दिये गये हैं।

विजयनगर से आतिशबाजी की कला का प्रचार पूरेे दक्षिण भारत में हुुआ। दक्षिण भारत में यह कला आज भी जीवित है और मुगलकालीन गं्रथों में भी आतिशबाजी का काफी उल्लेख मिलता है। आईन-ए-अकबरी में अनेक प्रकार केे तोपों का विवरण प्राप्त होता हैै। इसी प्रकार हैैदरअली और टीपू सुल्तान केेशासन में भी विभिन्न किस्म की तोपों का विवरण मिलता हैै।18 वीं सदी केे अंत में टीपू ने अंग्रेजों केे विरूद्घ राकेेटों का भी प्रयोग किया था। खैर, इसी प्रकार आतिशबाजी हर खुशी व उमंग में चारचांद लगाती है। दीपोत्सव आतिशबाजी के बिना अधूरा सा है। लेकिन, आतिशबाजी भी करें तो संभलकर।

उमेश कुमार सिंह
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