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लोकतंत्र का व्यंग्य या लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर संकट?

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यह केवल मतदान की व्यवस्था नहीं, बल्कि संवाद, सहमति, असहमति, संवैधानिक मर्यादाओं और सामाजिक उत्तरदायित्वों का एक सशक्त तंत्र है। लोकतंत्र की शक्ति विरोध में निहित है, लेकिन उसकी गरिमा विरोध की शैली, उद्देश्य और मर्यादा से निर्धारित होती है। हाल के दिनों में चर्चित हुई तथाकथित ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) इसी संदर्भ में गंभीर विमर्श की मांग करती है। यह आंदोलन प्रतियोगी परीक्षाओं, विशेषकर नीट परीक्षा में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के विरोध के नाम पर उभरा। प्रारम्भ में यह सोशल मीडिया पर व्यंग्यात्मक अभियान के रूप में सामने आया और बाद में दिल्ली के जंतर-मंतर तक पहुंच गया। इसके समर्थकों ने इसे युवाओं के आक्रोश की अभिव्यक्ति बताया, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यह वास्तव में शिक्षा सुधार का आंदोलन है या लोकतांत्रिक असंतोष को व्यंग्य, उपहास और राजनीतिक धु्रवीकरण की दिशा में मोड़ने वाला एक नया प्रयोग?

भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार देता है। किंतु कोई भी अधिकार निरंकुश नहीं होता। लोकतंत्र में विरोध का उद्देश्य समाधान की खोज होना चाहिए, न कि अराजकता का विस्तार। यदि विरोध का स्वर केवल उपहास, आक्रोश और टकराव तक सीमित रह जाए, तो वह लोकतंत्र को मजबूत करने के बजाय कमजोर करने लगता है। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का नाम ही एक नकारात्मक और व्यंग्यात्मक मानसिकता का परिचायक है। किसी राजनीतिक दल की नकल करते हुए स्वयं को “कॉकरोच” के प्रतीक से जोड़ना लोकतांत्रिक विमर्श को गंभीरता से अधिक तमाशे में बदलने का प्रयास प्रतीत होता है। लोकतंत्र में व्यंग्य का स्थान है, लेकिन व्यंग्य यदि विचार का स्थान ले ले, तो वह जनमत को भ्रमित भी कर सकता है।
किसी भी आंदोलन का मूल्यांकन उसकी मांगों और कार्यप्रणाली से किया जाता है। सीजेपी की प्रमुख मांगें हैं-परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, पेपर लीक की रोकथाम, शिक्षा मंत्री का इस्तीफा तथा युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराना। इनमें से अधिकांश मांगें ऐसी हैं जिन पर देश का हर जिम्मेदार नागरिक सहमत हो सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन मांगों को मनवाने का तरीका भी उतना ही जिम्मेदार है? क्या कॉकरोच के मुखौटे पहनना, राजनीतिक व्यंग्य को आंदोलन का आधार बनाना और सोशल मीडिया पर उत्तेजक अभियानों को बढ़ावा देना शिक्षा सुधार का व्यावहारिक मार्ग है? क्या इससे सरकार, विशेषज्ञों और समाज के बीच सार्थक संवाद स्थापित होगा? इतिहास बताता है कि स्थायी परिवर्तन नारेबाजी से नहीं, बल्कि वैचारिक स्पष्टता, संगठनात्मक अनुशासन और रचनात्मक दबाव से आते हैं।

भारत की युवा आबादी उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। लेकिन यही शक्ति यदि निराशा, बेरोजगारी और असंतोष से घिर जाए तो विभिन्न राजनीतिक शक्तियों के लिए उपयोग का साधन भी बन सकती है। आज देश का युवा प्रतियोगी परीक्षाओं, रोजगार और भविष्य को लेकर चिंतित है। यह चिंता वास्तविक है। लेकिन हर वास्तविक चिंता के साथ एक खतरा भी जुड़ा होता है-उसका राजनीतिक दोहन। जब किसी आंदोलन के पीछे विभिन्न राजनीतिक समूहों, सत्ता-विरोधी संगठनों और वैचारिक एजेंडों की उपस्थिति दिखाई देने लगे, तब यह आशंका स्वाभाविक हो जाती है कि कहीं युवाओं की पीड़ा को राजनीतिक हथियार तो नहीं बनाया जा रहा। यदि छात्र आंदोलन शिक्षा सुधार की जगह सरकार-विरोधी अभियान में बदल जाए, तो सबसे बड़ा नुकसान स्वयं छात्रों का होता है। युवाओं को यह समझना होगा कि वे किसी राजनीतिक प्रयोगशाला के उपकरण नहीं हैं। उनकी ऊर्जा राष्ट्र निर्माण के लिए है, किसी छिपे हुए राजनीतिक एजेंडे के लिए नहीं।

सीजेपी के समर्थकों द्वारा कभी-कभी नेपाल, बांग्लादेश अथवा अन्य देशों में हुए युवा आंदोलनों का उल्लेख किया जाता है। ऐसी तुलना न केवल जल्दबाजी है बल्कि भ्रामक भी हो सकती है। भारत की लोकतांत्रिक संरचना, संस्थागत शक्ति, न्यायिक व्यवस्था, मीडिया की स्वतंत्रता और संवैधानिक ढांचा पड़ोसी देशों से भिन्न है। जिन परिस्थितियों में अन्य देशों में जनआंदोलन उभरे, वे परिस्थितियां भारत में मौजूद नहीं हैं। भारत में चुनावी परिवर्तन की सशक्त व्यवस्था है। यहां सरकारें जनमत से बनती और बदलती हैं। इसलिए भारत के युवाओं को विदेशी या पड़ोसी देशों के आंदोलनों की भावनात्मक तुलना के बजाय भारतीय लोकतंत्र की विशेषताओं को समझना चाहिए। हर देश की राजनीतिक परिस्थितियां अलग होती हैं। इसलिए विदेशी उदाहरणों के आधार पर भारत में असंतोष को भड़काना न तो बौद्धिक रूप से उचित है और न ही राष्ट्रीय हित में।

आज सोशल मीडिया किसी भी विचार को कुछ ही घंटों में लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है। लेकिन यही उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लोकप्रियता और वैधता एक जैसी चीजें नहीं हैं। कई बार कोई विचार ट्रेंड तो बन जाता है, लेकिन उसके पास न स्पष्ट दृष्टि होती है, न कोई रचनात्मक कार्यक्रम और न कोई उत्तरदायित्व। सोशल मीडिया पर वायरल होना लोकतांत्रिक स्वीकृति का प्रमाण नहीं है। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का तेजी से लोकप्रिय होना इस बात का संकेत अवश्य है कि युवाओं में असंतोष है, लेकिन यह इस बात का प्रमाण नहीं कि आंदोलन का मार्ग सही है। लोकतंत्र में ट्रेंडिंग हैशटैग से अधिक महत्व तथ्यों, नीति और संस्थागत संवाद का होता है। यदि राजनीति केवल मीम, व्यंग्य और डिजिटल आक्रोश तक सीमित हो जाए तो लोकतंत्र धीरे-धीरे विचारशील नागरिकता से हटकर भीड़तंत्र में बदल सकता है।

भारत ने वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का संकल्प लिया है। यह लक्ष्य केवल आर्थिक विकास का नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिरता, संस्थागत विश्वास और राष्ट्रीय एकता का भी है। यदि युवा शक्ति का बड़ा हिस्सा निरंतर अविश्वास, नकारात्मकता और टकराव की राजनीति की ओर आकर्षित होता है, तो यह लक्ष्य प्रभावित हो सकता है। विकास के लिए केवल आलोचना नहीं, बल्कि सहभागिता भी आवश्यक है। युवाओं को सरकार से प्रश्न पूछने चाहिए, लेकिन साथ ही समाधान भी प्रस्तुत करने चाहिए। उन्हें जवाबदेही मांगनी चाहिए, लेकिन संस्थाओं के प्रति सम्मान भी बनाए रखना चाहिए। लोकतंत्र की सफलता विरोध और सहयोग के संतुलन में निहित है। इस पूरे प्रकरण का एक महत्वपूर्ण पक्ष उन राजनीतिक दलों और नेताओं की भूमिका है जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ऐसे आंदोलनों को समर्थन देते दिखाई देते हैं।

यदि कोई राजनीतिक दल वास्तव में शिक्षा सुधार चाहता है तो उसे संसद, विधानसभाओं और नीति मंचों पर ठोस प्रस्ताव रखने चाहिए। लेकिन यदि छात्र असंतोष को केवल सरकार को घेरने के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, तो यह लोकतंत्र और युवाओं दोनों के साथ अन्याय है। राजनीतिक दलों को स्पष्ट करना चाहिए कि वे शिक्षा सुधार के लिए क्या ठोस कार्यक्रम रखते हैं। केवल विरोध का समर्थन करना पर्याप्त नहीं है। लोकतंत्र में जिम्मेदार विपक्ष का दायित्व विकल्प प्रस्तुत करना भी होता है। परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता, पेपर लीक पर कठोर दंड, रोजगार सृजन, शिक्षा की गुणवत्ता और युवाओं के लिए अवसरों का विस्तार-ये सभी वास्तविक और महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। लेकिन इनका समाधान व्यंग्यात्मक राजनीति या प्रतीकात्मक आक्रोश में नहीं है। समाधान सरकार, न्यायपालिका, शिक्षाविदों, विशेषज्ञों, छात्र संगठनों और समाज के बीच निरंतर संवाद में है। आवश्यकता इस बात की है कि युवाओं के असंतोष को रचनात्मक ऊर्जा में बदला जाए। भारत का लोकतंत्र विरोध को स्वीकार करता है, लेकिन वह विरोध तभी सार्थक होता है जब वह व्यवस्था को तोड़ने के बजाय सुधारने की दिशा में आगे बढ़े।

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ जैसी प्रवृत्तियां पहली दृष्टि में लोकतांत्रिक व्यंग्य और युवा असंतोष की अभिव्यक्ति लग सकती हैं, लेकिन इनके दूरगामी प्रभावों की गंभीर समीक्षा आवश्यक है। यदि राजनीति उपहास, प्रतीकात्मक आक्रोश और डिजिटल उत्तेजना तक सीमित हो जाएगी, तो लोकतांत्रिक विमर्श की गुणवत्ता प्रभावित होगी। भारत को आज ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो प्रश्न भी पूछें और समाधान भी खोजें। जो विरोध भी करें और राष्ट्र निर्माण में भागीदारी भी निभाएं। लोकतंत्र की शक्ति संघर्ष में नहीं-संवाद में है, विभाजन में नहीं-समन्वय में है और तात्कालिक उत्तेजना में नहीं-दीर्घकालिक राष्ट्रहित में है। इसलिए समय की मांग है कि युवा, राजनीतिक दल और समाज सभी मिलकर यह विचार करें कि क्या ‘कॉकरोच राजनीति’ वास्तव में लोकतंत्र को मजबूत करेगी, या फिर वह भारत की लोकतांत्रिक संस्कृति, राजनीतिक मर्यादाओं और विकसित भारत-2047 के राष्ट्रीय संकल्प के सामने एक नई चुनौती बनकर उभरेगी। यही प्रश्न आज सबसे अधिक प्रासंगिक है।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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