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स्वदेशी रोजगार एवं व्यापार की आत्मा है

-स्वदेशी दिवस, 12 दिसम्बर 2023 पर विशेष-

भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन का स्वदेशी एक महत्वपूर्ण आन्दोलन, सफल रणनीति व राष्ट्रीय दर्शन है। ‘स्वदेशी’ का अर्थ है- अपने देश का, अपने देश मंे निर्मित। इस रणनीति का लक्ष्य ब्रिटेन में बने माल का बहिष्कार करना तथा भारत में बने माल का अधिकाधिक प्रयोग करके साम्राज्यवादी ब्रिटेन को आर्थिक हानि पहुँचाना व भारत के लोगों के लिये रोजगार सृजन करना था। यह ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने और भारत की समग्र आर्थिक व्यवस्था के विकास के लिए अपनाया गया साधन था। आज आजादी के अमृतकाल को अमृतमय बनाने के लिये स्वदेशी-दर्शन के बल पर भारत को दुनिया की आर्थिक महाशक्ति बनाने के लिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संकल्पबद्ध है। उपनिवेशी मानसिकता से मुक्त होकर, अपने देश में जो है उसको युगानुकूल बनाते हुए, ‘स्व’ आधारित स्व-देशी विकासपथ अपनाने की उनकी मुहीम का प्रभाव है कि हम अब सैन्य उपकरण तक आयात नहीं, बल्कि निर्यात करने की स्थिति में है। स्वदेशी कोई रूढ़िवाद नहीं, बल्कि रोजगार, व्यापार एवं संस्कृति की आत्मा है। 12 दिसंबर 1930 भारत के स्वदेशी आंदोलन का अत्यंत महत्वपूर्ण दिन बना, इसे आज भी स्वदेशी दिवस के रूप में याद किया जाता है।
लोकमान्य गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी के स्वदेशी अपनाने का आह्वान और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के आंदोलन से प्रेरित होकर विदेश वस्त्रों से भरी लारी को रोकते हुए बाबू गेनू शहीद हो गए।

अंग्रेजों की हुकूमत देश को आर्थिक रूप से लूट रही थी। अंग्रेज कपास, रेशम, पटसन व लोहा आदि कच्चे माल को भारत से विदेश ले जाते और लंदन से माल लाकर महंगे दामों पर बेचते। अंग्रेजों की इस कुटिल अर्थनीति को विफल करने के आन्दोलन में बाबू गेनू ने पूरी शक्ति से भाग लिया। देशप्रेम की भावना के वशीभूत होकर कभी-कभी सामान्य सा दिखायी देने वाला व्यक्ति भी बहुत बड़ा काम कर जाता है। ऐसा ही बाबू गेनू के साथ हुआ। एक बार उनका एक बैल पहाड़ी से गिर कर मर गया। इस पर बड़े भाई ने उसे बहुत डांटा। इससे दुखी होकर गेनू मुम्बई आकर एक कपड़ा मिल में काम करने लगा। उसी मिल में उसकी माँ कोंडाबाई भी मजदूरी करती थी। उन दिनों देश में स्वतन्त्रता का संघर्ष छिड़ा था। स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग तथा विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आन्दोलन जोरों पर था। 22 वर्षीय बाबू गेनू भी इस आन्दोलन में बढ़-चढ़कर भाग लेते थे। मिल के अपने साथियों को एकत्र कर वह आजादी एवं स्वदेशी का महत्व बताया करते थे। 26 जनवरी, 1930 को ‘सम्पूर्ण स्वराज्य माँग दिवस’ आन्दोलन में बाबू गेनू की सक्रियता देखकर उन्हें तीन महीने के लिए जेल भेज दिया, पर इससे बाबू के मन में स्वतन्त्रता प्राप्ति की चाह और तीव्र हो गयी। 12 दिसम्बर, 1930 को मिल मालिक मैनचेस्टर से आये कपड़े को मुम्बई शहर में भेजने वाले थे। जब बाबू गेनू को यह पता लगा, तो उसका मन विचलित हो उठा। उसने अपने साथियों को एकत्र कर हर कीमत पर इसका विरोध करने का निश्चय किया। 11 बजे वे कालबादेवी स्थित मिल के द्वार पर आ गये। धीरे-धीरे पूरे शहर में यह खबर फैल गयी। इससे हजारों लोग वहाँ एकत्र हो गये। यह सुनकर पुलिस भी वहाँ आ गयी।

कुछ ही देर में विदेशी कपड़े से लदा ट्रक मिल से बाहर आया। उसे सशस्त्र पुलिस ने घेर रखा था। गेनू के संकेत पर घोण्डू रेवणकर ट्रक के आगे लेट गया। इससे ट्रक रुक गया। जनता ने ‘वन्दे मातरम्’ और ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाये। पुलिस ने उसे घसीट कर हटा दिया, पर उसके हटते ही दूसरा कार्यकर्ता वहाँ लेट गया। बहुत देर तक यह क्रम चलता रहा। यह देखकर अंग्रेज पुलिस सार्जेण्ट ने चिल्ला कर आन्दोलनकारियों पर ट्रक चढ़ाने को कहा, पर ट्रक का भारतीय चालक इसके लिए तैयार नहीं हुआ। इस पर पुलिस सार्जेण्ट उसे हटाकर स्वयं उसके स्थान पर जा बैठा। यह देखकर बाबू गेनू स्वयं ही ट्रक के आगे लेट गया। सार्जेण्ट की आँखों में खून उतर आया। उसने ट्रक चालू किया और बाबू गेनू को रौंद डाला। सब लोग भौंचक रह गये। सड़क पर खून ही खून फैल गया। गेनू का शरीर धरती पर ऐसे पसरा था, मानो कोई छोटा बच्चा अपनी माँ की छाती से लिपटा हो। उसे तत्क्षण अस्पताल ले जाया गया पर उसके प्राण पखेरू तो पहले ही उड़ चुके थे। इस प्रकार स्वदेशी के लिए बलिदान देने वालों की माला में पहला नाम लिखाकर बाबू गेनू ने स्वयं को अमर कर लिया। तभी से 12 दिसम्बर को ‘स्वदेशी दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।

इस प्रकार बाबू गेनू के बलिदान दिवस को पूरे देश में स्वदेशी दिवस के रूप में मनाया जाता। स्वदेशी उत्पाद उचित दाम के साथ लाभकारी सिद्ध होते है। स्वदेश की चीजों अपनाने से हमारा धन हमारे ही देश में रहता है एवं हमारे उत्पादों को बल मिलता है, इससे हमारी आर्थिक स्थितियां मजबूत होती है, व्यापार एवं उद्योग को बल मिलता है। विदेशी वस्तुओ और कंपनियों का सामान खरीद कर हम धीरे-धीरे अपने देश का पैसा बाहर भेज रहे हैं और चीन जैसे देश इसी से आर्थिक महाशक्ति बने हुए है।  भारत की अर्थव्यवस्था विदेशी कंपनियों की गुलाम बन रही है, इससे बचने का एक मात्र उपाय है स्वदेशी प्रचार। अपने जीवन में जितना संभव हो सके स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग कीजिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि स्वदेशी का ये भाव सिर्फ विदेशी कपड़े के बहिष्कार तक ही सीमित नहीं था, बल्कि ये हमारी आर्थिक आजादी का बहुत बड़ा प्रेरक था। आज उनके आह्वान पर ‘वोकल फॉर लोकल’ की स्पिरिट के साथ देशवासी पूरे मन से स्वदेशी उत्पाद खरीद रहे हैं और यह एक जन आंदोलन बन गया है।

आत्मनिर्भर भारत का सपना बुनने और मेक इन इंडिया को बल प्रदान करने वाले लोग खादी को मात्र कपड़ा ही नहीं, बल्कि हथियार समझते हैं। यही कारण है कि नौ साल पहले खादी और ग्रामोद्योग का कारोबार मात्र 25 हजार, 30 हजार करोड़ रुपए के आसपास ही था। आज ये एक लाख तीस हजार करोड़ रुपए से अधिक तक पहुंच चुका है। पिछले 9 वर्षों में ये जो अतिरिक्त 1 लाख करोड़ रुपए इस सेक्टर में आए हैं। इस अतिरिक्त आमदनी से जुटा धन अब हथकरघा सेक्टर से जुड़े गरीब भाई-बहनों के पास पहुंच रहा है, यह धन गांवों एवं आदिवासियों के पास पहुंच रहा, इसी से गरीबी दूर हो रही है। नीति आयोग ने कहा भी है कि पिछले 5 साल में साढ़े तेरह करोड़ लोग भारत में गरीबी से बाहर निकले हैं।

स्वदेशी-अभियान को बल देते हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक ने व्यापक उपक्रम किये हैं, स्वदेशी जागरण मंच इसके लिये प्रतिबद्ध है। रक्षाबंधन एवं दीपावली पर स्वदेशी निर्मित राखियों, दीयों एवं पटाखों के प्रयोग से न केवल आर्थिक व्यवस्था को मजबूत बनाया है बल्कि असंख्य छोटे उद्योगों एवं कामगारों को ताकतवर बनाया है। गणेश उत्सव, दशहरा, दीपावली, दुर्गापूजा आदि पर्वों पर स्वदेशी के संकल्प को दोहरा कर हमने भारत को आर्थिक महाशक्ति बनाने की ओर अग्रसर किया है। आज वोकल फॉर लोकल की भावना के साथ देशवासी स्वदेशी उत्पादों को हाथों-हाथ खरीद रहे हैं, ये एक जनआंदोलन बन गया है। बापू ने आंदोलन के जरिए जनता से स्वदेशी चीजे अपनाने की बात कही। स्वावलंबी गाँव आर्थिक विकेंद्रीकरण का ही रूप है जिसका आधार स्थानीयता एवं उस पर आधारित प्रौद्योगिकी संसाधन है।

इसका उद्देश्य लोगों की सेवा करना और उन्हें आर्थिक दृष्टि से मजबूत बनाना है। इस व्यवस्था में उत्पादन, उपभोग स्थानीय होने के कारण मालिक, श्रमिक और उपभोक्ता तीनों एक ही हो जाते हैं, यही इसकी विशिष्टता है। आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वावलम्बी अर्थ-व्यवस्था पर जोर दे रहे हैं, यह गांधी के सिद्धान्तों पर ही आधारित है। महात्मा गांधी ने हस्तशिल्प व कुटीर उद्योग को हमेशा बढ़ावा दिया है। उनके ग्राम स्वराज का सपना था कि गांव के कुटीर, लघु और कृषि उद्योग तेजी से आगे बढ़े। अगर देश का हर नागरिक सोचे कि जो वह स्वदेशी उत्पाद इस्तेमाल कर रहा है, उससे न केवल देश की कंपनी का फायदा होगा, बल्कि देश में ज्यादा से ज्यादा रोजगार उत्पन्न होंगे, तो देश तेजी से आत्मनिर्भर एवं आर्थिक ताकत बनने की ओर बढ़ेगा।

ललित गर्ग
ललित गर्ग
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