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मानव, गिरि-कानन, सिंधु कर रहे धरा की सवारी

लेख का शीर्षक पाठक को आश्चर्यचकित कर रहा होगा कि आखिर हम मनुष्य, पहाड़, जंगल, जानवर, विशाल सागर और अन्यान्य छोटे-बड़े जीव-जंतु धरती की सवारी कैसे कर सकते हैं ? और यदि हम सवारी कर रहे हैं तो यह धरती हमें गति करते हुए दिखती क्यों नहीं और हम गतिमान पृथ्वी पर सवारी करते हुए स्थिर होकर दैनंदिन कार्य-व्यवहार सहजता पूर्वक कैसे सम्पन्न कर लेते हैं। और धरती हमें कहीं और क्यों नहीं ले जाती या हमारे घर-परिवार, पड़ोस मकान आदि की भौगोलिक स्थितियां परिवर्तित क्यों नहीं होतीं, क्योंकि हम सभी साथ-साथ घूम रहे हैं। सामान्य तौर पर व्यक्ति, जीव-जंतु या वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजने हेतु सवारी साधन का प्रयोग किया जाता है। दरअसल सवारी का अर्थ किसी चलित वस्तु से है, इस अर्थ में देखें तो हमारी पृथ्वी अपने जन्म काल से लगातार चल रही है और हम सभी उस पर सवार हैं। पर हमें यह कैसे पता चला कि पृथ्वी चल रही है। यह जानकारी समाज तक पहुंचाने का श्रेय जाता है लियोन फौकॉल्ट को। कौन है यह महनीय व्यक्तित्व और इसने क्या किया था, आईए उनके योगदान को जानते हैं।

‌फ्रांसीसी भौतिक विज्ञानी ज़ीन बर्नाड लियोन फौकॉल्ट ने 8 जनवरी, 1851 को अपने उपकरण एक खास प्रकार के पेंडुलम के माध्यम से पहली बार पृथ्वी के अपने अक्ष में घूमने का सफल प्रयोग करके दुनिया को दिखाया। उनकी इस महत्वपूर्ण उपलब्धि को स्मरण रखने हेतु प्रत्येक वर्ष 8 जनवरी को पृथ्वी घूर्णन दिवस या अर्थ रोटेशन डे मनाया जाता है ताकि आने वाली पीढ़ियां लियोन फौकॉल्ट के महान योगदान से परिचित हो श्रद्धा व्यक्त कर सकें। हालांकि इसके पूर्व भी बहुत सारे विज्ञानियों इस सम्बंध में कुछ प्रयोग किए थे पर वह पूर्णता तक नहीं पहुंच पाए थे। यदि हम भारतीय संदर्भ की बात करें तो आर्यभट्ट ने सर्वप्रथम पृथ्वी के गोलाकार होने तथा अपने अक्ष (धुरी) पर घूर्णन करने के बारे में बताया था। पृथ्वी का अक्ष एक काल्पनिक रेखा या बिंदु है जिस पर पृथ्वी 66×1/2 डिग्री का कोण बना पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर घूर्णन करती है। पृथ्वी अपने अक्ष पर घूर्णन करते हुए लगभग 24 घंटे (23 घंटे 56 मिनट एवं 4 4 सेकेंड) में एक चक्कर पूरा करती है।

इसी घूर्णन गति के कारण हम पृथ्वी पर दिन और रात का अनुभव करते हैं। पृथ्वी की अपने अक्ष पर घूर्णन गति 1674 किलोमीटर प्रति घंटा होती है। घूर्णन गति के अलावा पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा भी करती है जिससे पृथ्वी पर ऋतुओं में बदलाव होता है। सूर्य की एक परिक्रमा करने में पृथ्वी को 365 दिन 6 घंटे 4 सेकंड लगता है। सवाल उभरता है की इतनी तीव्र गति से घूर्णन करने वाली पृथ्वी पर हम स्थिर कैसे हैं। सामान्यतः  कह सकते हैं कि पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति सभी को अपनी ओर खींचें रहती है। यदि ऐसा न होता तो पृथ्वी पर कुछ भी स्थिर नहीं होता। उपग्रह राकेट आदि प्रक्षेपण के लिए पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति से बाहर निकलना आवश्यक होता है जिसे पलायन वेग कहा जाता है जोकि 11.186 किमी प्रति सेकेंड है। पृथ्वी सौर परिवार का सूर्य से तीसरा ग्रह है जिसके 71प्रतिशत भाग पर जल तथा 29 प्रतिशत भूमि भाग है। यह 71 प्रतिशत का 99 प्रतिशत जल खारे पानी के रूप में महासागरों में है। केवल 1 प्रतिशत मीठा जल ग्लेसियर, झीलों, नदियों, तालाबों और कुओं में उपलब्ध है। पृथ्वी पर जल की उपलब्धता द्रव, गैस और ठोस रूप में है। 1972 में अंतरिक्ष यान अपोलो -17 ने अंतरिक्ष से पृथ्वी का एक संपूर्ण चित्र लिया था जिसे ब्लू मार्बल के नाम से जाना जाता है, तभी से पृथ्वी को नीला ग्रह भी कहा जाने लगा है। पृथ्वी में 78% नाइट्रोजन गैस और 21 प्रतिशत ऑक्सीजन गैस की उपलब्धता है शेष भाग में कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड तथा अक्रिय गैस और जलवाष्प है। यदि हम पृथ्वी की विषुवतीय त्रिज्या की बात करें तो यह 6378.1 किमी तथा ध्रुवीय त्रिज्या 6356.8 किमी है क्योंकि पृथ्वी उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुवों पर गोलाकार न होकर आंशिक चपटी है। सूर्य का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी को अंतरिक्ष में टिकाए हुए है। 

 वास्तव में पृथ्वी सभी प्राणियों एवं वनस्पतियों का आश्रय स्थल है। वह सम्पूर्ण चराचर जगत् को धारण करने वाली धरा है। वह नाना विधियों से जीव-जंतुओं का पोषण करने वाली माता है, इसीलिए भारतीय वांग्मय में मनुष्य ने स्वयं को उसकी सन्तान स्वीकार कर माता के रूप में अर्चना आराधना करते हुए माता भूमि: पुत्रोहं पृथ्विया: कहा है। धरती रत्नों की खान है इसलिए वह रत्नगर्भा है। वह फटरस से युक्त है। वह सुगंधा है, मेघों को आकर्षित करने वाली है। अपनी पीठ पर गिर कानन को   स्थान दे समस्त जीव-जंतुओं के लिए भोजन और औषधियों को प्रदान करने वाली ममतायुक्त वत्सला मां है। वह चिर शांति स्थिर प्रज्ञा है। वह सहनशक्ति और धैर्य की पराकाष्ठा का अंतिम बिंदु है। धरा स्वधर्म पालन एवं व्यवहार में मौन तपस्यारत है। पर मानव के लालच ने ऊँचे पहाड़ खोदकर विशाल गड्ढे बना दिए। सदानीरा नदियों का वक्षस्थल चीरकर बालू की अंतिम परत तक निकाल ली। जलद मीत कानन मानव तृष्णा की भेंट चढ़ गये। फलत: पृथ्वी का अक्षीय संतुलन अस्थिर हो रहा है जिसका असर उसकी घूर्णन गति पर पड़ रहा है। विज्ञानी चिंतित हैं और हम ? विचार करें पृथ्वी है तो हम हैं, हमारी खुशियां है और है अनेकानेक जीव-जंतुओं का सान्निध्य-साहचर्य। पृथ्वी मां है, अपनी संतान के जीवन निर्वाह के लिए वह दोनों हाथ उदारमना​ हो उपहार बांट रही है। हम पृथ्वी मां की सेवा साधना करें, विनाश नहीं। लेखक शैक्षिक संवाद मंच के संस्थापक हैं।

प्रमोद दीक्षित मलय शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)
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