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भीषण गरमी मं ‘गोंदली-बोरे बासी’ – गरीब के भात ह बनिस जीवन बचइया

सुप्पर डुप्पर फुड बोरे बासी

छत्तीसगढ़ के माटी मं जनम लेय ये परंपरा आज फेर ले अपन असली पहचान बनावत दिखत हवय। भीषण गरमी, लू अऊ पानी के कमी के बीच, जऊन चीज ला लोगन पहिली “गरीब मन के खाना” कहत रहिन, ओही आज “सुपरफूड” के दर्जा पा गे हवय…बोरे बासी।

परंपरा अऊ विज्ञान के संगम

बोरे बासी माने रात के बचे भात ला पानी मं भिजाके दूसर दिन खाय जाय। ये सिरिफ खान-पान नई, बल्कि छत्तीसगढ़िया जिनगी के एक हिस्सा आय। वैज्ञानिक रूप ले देखे जावय त ये एक प्रकार के “फर्मेंटेड फूड” हवय, जेमां रात भर मं प्राकृतिक जीवाणु (लैक्टिक बैक्टीरिया) बनथे, जऊन पाचन ला मजबूत करथे अऊ शरीर ला ठंडा रखथे।

पहिली के सियान मन ले “गोंदली-बोरे बासी” ला गरमी के लाइफसेवर बताय गे हवय..ये बात सिरिफ लोक अनुभव नई, वैज्ञानिक आधार घलो रखथे।छत्तीसगढ़ जइसन गरम प्रदेश मं बोरे बासी एक प्राकृतिक “कूलेंट” के काम करथे।ये शरीर के तापमान ला संतुलित रखथे,पानी के कमी (डिहाइड्रेशन) ले बचाथे अउ लू (हीट स्ट्रोक) के खतरा कम करथे ।

गांव-देहात मं किसान अऊ मजदूर मन रोज बिहान बोरे बासी खाके काम मं निकल थें, काबर ये दिन भर शरीर ला ठंडा अऊ ताकतवर बनाके रखथे।जऊन चीज ला हमन साधारण समझथन, ओही मं भारी पोषण छुपे हवय, एमां आयरन, पोटैशियम, कैल्शियम,विटामिन B-12 अऊ मिनरल्स, कार्बोहाइड्रेट ले ऊर्जा फर्मेंटेशन से बने प्रोबायोटिक्स (पेट के लिए फायदेमंद) भरपूर राजे।इही से ये पाचन सुधारे, गैस-कब्ज दूर करे अऊ शरीर ला ताजगी देथे।

 ये बोरे बासी सिरिफ स्वास्थ्य नई, बल्कि आर्थिक अऊ पर्यावरणीय सोच के घलो प्रतीक आय- बचे भात के उपयोग → भोजन के बर्बादी नई…सस्ता अऊ सुलभ → हर वर्ग के लोग खा सकथें। आज जब महंगाई अऊ फास्ट फूड के जमाना हवय, त बोरे बासी जइसन साधारण भोजन हमन ला सिखाथे कि “सही खान-पान महंगा नई, समझदार होना जरूरी आय।”

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अब तौ छत्तीसगढ़ सरकार घलो के दिन “बोरे बासी दिवस” मना के ये परंपरा ला बढ़ावा देहे हवय। ये पहल सिरिफ खाना नई, बल्कि किसान अऊ मजदूर के सम्मान अऊ छत्तीसगढ़िया संस्कृति के गौरव के प्रतीक आय।

सियान मन जऊन “गोंदली” के जिक्र करथें, वो एक प्रकार के मोटा अनाज (मिलेट) आय। जब बोरे बासी मं गोंदली जइसन पौष्टिक अनाज जुड़थे, त ये अउ जियादा हेल्दी बन जाथे जेमा ज्यादा फाइबर,शुगर कंट्रोल,लंबा समय तक ऊर्जा बने रइथे।

पूरा छत्तीसगढ़ मं एला खाय जाथे। गाँव-गाँव के जियादा घर मन मं बोरे-बासी ल बिहान के खाय के रूप मं ले जाथे। ये खाना किसान, मजदूर अऊ आदिवासी समाज के मुख्य आहार आय। ये “जन-जीवन मं एतका घुल-मिल गे हवय कि समय तय करे मं घलो एकर असर दिखथे।”अनुमान के हिसाब ले गाँव इलाका मं करीबन 60–80% परिवार गरमी के दिन मं नियमित रूप ले एला खाथें, जबकी शहर इलाका मं करीबन 15–35% लोग एला आंशिक या मौसमी रूप मं लेथें।बस्तर संभाग (जइसे दंतेवाड़ा, कांकेर, नारायणपुर) मं एकर उपयोग बहुते जियादा होथे, काबर कि इहाँ आदिवासी जीवनशैली अऊ प्राकृतिक खान-पान ऊपर निर्भरता जियादा हवय। सरगुजा संभाग (अंबिकापुर, बलरामपुर) मं घलो ये परंपरा दिखथे, जिहां पारंपरिक खेती अऊ गाँव के जीवन चलत हवय।

मध्य छत्तीसगढ़ (रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर) मं ये गाँव मं जियादा अऊ शहर मं कम दिखथे, जबकि औद्योगिक जिला (कोरबा, रायगढ़) मं मजदूर वर्ग मं जियादा अऊ शहरी मध्यम वर्ग मं कम उपयोग होथे। कुल मिलाके कहे जा सकथे कि जतका जियादा ग्रामीण अऊ आदिवासी इलाका, ओतके जियादा बोरे-बासी के उपयोग होथे।

पिछला बछर मनाए गे “बोरे-बासी तिहार” मं करीबन 50,000 मजदूर मन ला एला खवाय गीस। बोरे-बासी असल मं रात के बचे भात ल पानी मं भिगोके बिहान खाय जाथे। एला नमक, प्याज, हरी मिर्च, अचार संग खाथें, कभू-कभू दही या भाजी संग घलो खाय जाथे। ये जियादातर बिहान, खेत जाय के पहिली या दुपहरिया मं खाय जाथे। एकर कारण ये आय कि ये शरीर ल ठंडक देथे अऊ ऊर्जा संग पानी घलो देथे। ये सस्ता अऊ आसानी ले मिल जाय वाला खाना आय।बोरे-बासी जइसन खाना भारत के दूसर राज मन मं अलग-अलग नाम ले खाय जाथे। जइसे ओडिशा मं एला पखाला भात,पश्चिम बंगाल मं पांता भात,असम मं पोइता भात दक्षिण भारत मं पझैय साधम एखर अलावा दक्षिण-पूर्व एशिया (जइसे इंडोनेशिया) मं घलो एला बड़े चाव ले खाय जाथे। ए तरह ले बोरे-बासी सिरिफ खाना नई, बल्कि छत्तीसगढ़ के परंपरा अऊ जीवनशैली के पहचान आय।

एखर सब्बो निचोड़ बाती ए हावय के आज जरूरत हवय कि हमन अपन जड़ों ला पहिचानन। जऊन बोरे बासी ला हमन पिछड़ेपन के निशानी समझत रहिन, ओही आज आधुनिक विज्ञान के नजर मं “सुपरफूड” बन गे हवय। जेला हम सबो झन जानन…. मानन… अउ एखर सुघ्घर जम्मो भाई बहिनी अउ दाई ददा मन उपयोग करन जाए।

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गरमी, बीमारी अऊ महंगाई के ए बेरा मं -बोरे बासी सिरिफ खाना नई, बल्कि जीवनशैली के समाधान आय।छत्तीसगढ़ के हर घर, हर पीढ़ी ला ये अपन परंपरा ला अपनाय के जरूरत हवय, ताकि हमन स्वस्थ रहन अऊ अपन सांस्कृतिक पहचान ला जिंदा रख सकन।

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