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दवा के नाम पर मौत, इलाज के नाम पर भय कब तक?


किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी सेना, अर्थव्यवस्था, तकनीकी उपलब्धियों या ऊंची इमारतों से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वह अपने नागरिकों के जीवन, स्वास्थ्य और सुरक्षा के प्रति कितना संवेदनशील है। स्वास्थ्य व्यवस्था किसी भी देश की आत्मा होती है। अस्पताल केवल भवन नहीं होते, वे जीवन की उम्मीद के केंद्र होते हैं। डॉक्टर केवल पेशेवर व्यक्ति नहीं होता, वह मौत और जीवन के बीच खड़ा वह संवेदनशील रक्षक होता है, जिस पर मनुष्य सबसे अधिक विश्वास करता है। लेकिन जब यही स्वास्थ्य व्यवस्था भ्रष्टाचार, फर्जीवाड़े, मुनाफाखोरी और अनैतिकता की गिरफ्त में आ जाए, तब समाज का विश्वास टूटने लगता है और चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा दिखाई देने लगता है। आज भारत में चिकित्सा क्षेत्र से जुड़ी जो घटनाएं सामने आ रही हैं, विशेषकर मध्यप्रदेश और राजस्थान की घटनाओं ने इसी भयावह यथार्थ को उजागर किया है।

भारत आज विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। वर्ष 2047 तक स्वतंत्रता के सौ वर्ष पूरे होने पर विकसित भारत, समृद्ध भारत और आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना को साकार करने के लिए अनेक योजनाएं बनाई जा रही हैं। आर्थिक प्रगति, डिजिटल क्रांति, आधारभूत ढांचे का विस्तार, तकनीकी उन्नयन और वैश्विक मंचों पर भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा आशा जगाती है। लेकिन इसी बीच स्वास्थ्य क्षेत्र में बढ़ती धांधलियां, फर्जी डॉक्टरों की नियुक्तियां, नकली दवाओं का कारोबार, अस्पतालों में मुनाफाखोरी और चिकित्सा सेवाओं का व्यवसायीकरण इस विकास यात्रा पर गहरे प्रश्नचिह्न खड़े कर रहे हैं। यदि नागरिकों का जीवन ही सुरक्षित नहीं रहेगा तो विकास के सारे दावे खोखले प्रतीत होंगे। मध्यप्रदेश के दमोह और जबलपुर के सरकारी अस्पतालों में फर्जी डॉक्टरों की नियुक्तियों का खुलासा किसी एक राज्य की प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की कमजोरी का प्रतीक है। इससे भी अधिक चिंताजनक मामला राजस्थान मेडिकल काउंसिल में सामने आया, जहां ऐसे लोगों को डॉक्टर के रूप में पंजीकृत कर दिया गया जिन्होंने न मेडिकल शिक्षा प्राप्त की और न ही आवश्यक इंटर्नशिप की। यह केवल कागजी अनियमितता नहीं, बल्कि लोगों के जीवन से खिलवाड़ करने वाला गंभीर अपराध है। एक अयोग्य व्यक्ति जब डॉक्टर बनकर मरीजों के सामने बैठता है, तब वह इलाज नहीं करता, बल्कि मानव जीवन पर प्रयोग करता है, उसके कारण जिंदगी मौत में बदल जाती है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि ऐसे लोग व्यवस्था में प्रवेश कैसे कर जाते हैं? क्या कोई व्यक्ति अकेले इतना बड़ा फर्जीवाड़ा कर सकता है? निश्चित रूप से नहीं। इसके पीछे सत्यापन तंत्र की विफलता, विभागीय मिलीभगत और संस्थागत भ्रष्टाचार की परतें मौजूद होती हैं। जब मेडिकल काउंसिल, अस्पताल प्रशासन और परीक्षा एवं पंजीयन संस्थाओं की भूमिका संदेह के घेरे में आ जाए, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि बीमारी केवल व्यक्ति में नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था में फैल चुकी है। आज चिकित्सा क्षेत्र का संकट केवल फर्जी डॉक्टरों तक सीमित नहीं है। निजी अस्पतालों में मुनाफाखोरी ने स्वास्थ्य सेवा के मानवीय स्वरूप को गंभीर क्षति पहुंचाई है। मरीज की विवशता को आर्थिक अवसर में बदल देने की प्रवृत्ति बढ़ी है। अनेक मामलों में अनावश्यक जांचें कराना, जरूरत न होने पर मरीजों को आईसीयू में भर्ती करना, वेंटिलेटर पर रखना, अत्यधिक बिल बनाना और उपचार को लंबा खींचना आम शिकायतें बन चुकी हैं। मरीज अस्पताल में इलाज के लिए जाता है, लेकिन कई बार आर्थिक और मानसिक शोषण का शिकार होकर लौटता है। चिकित्सा सेवा का मूल उद्देश्य पीड़ा दूर करना था, लेकिन कई स्थानों पर वह व्यापार और लाभ कमाने का माध्यम बन गई है।

सरकारी अस्पतालों की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। गरीब और जरूरतमंद नागरिकों के लिए बने इन संस्थानों में संसाधनों की कमी, कर्मचारियों की लापरवाही, भ्रष्टाचार और बिचौलियों की दखलअंदाजी ने व्यवस्था को कमजोर किया है। कई बार मुफ्त दवाएं मरीजों तक नहीं पहुंचतीं, मशीनें अनुपयोगी पड़ी रहती हैं, जांचों में देरी होती है और मरीज अस्पतालों के चक्कर लगाते-लगाते टूट जाता है। गरीब व्यक्ति के लिए बीमारी केवल शारीरिक पीड़ा नहीं रहती, बल्कि आर्थिक और मानसिक संकट भी बन जाती है। आज एक और गंभीर संकट सामने आया है-डॉक्टर बनने की अंधी दौड़ और शॉर्टकट संस्कृति। नीट जैसी परीक्षाओं में धांधलियों ने पहले ही देश को झकझोर दिया है। यदि प्रवेश प्रक्रिया ही संदिग्ध हो जाए और उसके बाद फर्जी डिग्रीधारी डॉक्टर व्यवस्था में प्रवेश करने लगें, तो यह पूरे चिकित्सा तंत्र की विश्वसनीयता को समाप्त कर देगा। डॉक्टर बनने के पीछे वर्षों की कठिन पढ़ाई, प्रशिक्षण, अनुशासन और संवेदनशीलता की साधना होती है। लेकिन यदि इस प्रक्रिया को धन, भ्रष्टाचार और जालसाजी से बदल दिया जाएगा तो परिणाम केवल भयावह ही होंगे। यह स्थिति केवल स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक विश्वास का संकट भी है। जब नागरिक डॉक्टर की योग्यता पर संदेह करने लगें, अस्पतालों में भय के साथ प्रवेश करें और दवा खरीदते समय उसकी प्रामाणिकता को लेकर आशंकित रहें, तब यह किसी भी राष्ट्र के लिए खतरनाक संकेत है। स्वास्थ्य व्यवस्था में विश्वास टूटना समाज की आत्मा पर चोट पहुंचाने जैसा है।
दुनिया के विकसित देशों में चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े अपराधों को अत्यंत गंभीर माना जाता है। वहां फर्जी चिकित्सकों को केवल नौकरी से नहीं हटाया जाता, बल्कि आजीवन प्रतिबंध, भारी आर्थिक दंड और आपराधिक मुकदमों का सामना करना पड़ता है। कई देशों में डॉक्टरों के पंजीकरण और प्रमाणपत्रों का नियमित सत्यापन होता है तथा डिजिटल निगरानी व्यवस्था इतनी मजबूत होती है कि फर्जीवाड़े की संभावना बहुत कम रह जाती है। इसके विपरीत भारत में कई बार जांच प्रक्रिया लंबी, जटिल और धीमी होती है। वर्षों तक जांच चलती रहती है और दोषी बच निकलते हैं। यह व्यवस्था अपराधियों में भय नहीं, बल्कि निर्भीकता पैदा करती है। अब समय केवल चिंता व्यक्त करने या औपचारिक आश्वासनों का नहीं, बल्कि निर्णायक और कठोर कदम उठाने का है। देश के प्रत्येक पंजीकृत डॉक्टर का लाइव डिजिटल डेटाबेस तैयार किया जाना चाहिए, जहां कोई भी नागरिक एक क्लिक पर डॉक्टर की योग्यता, पंजीकरण संख्या, मेडिकल कॉलेज और सेवा विवरण की पुष्टि कर सके। मेडिकल काउंसिलों को केवल कागजी संस्थाएं नहीं, बल्कि सक्रिय निगरानी तंत्र बनाना होगा। अस्पतालों का नियमित निरीक्षण हो, डॉक्टरों के दस्तावेजों का रैंडम फिजिकल वेरिफिकेशन किया जाए और फर्जीवाड़ा पकड़े जाने पर केवल फर्जी डॉक्टर ही नहीं, बल्कि उसके दस्तावेज पास करने वाले अधिकारी और सत्यापन करने वाले कर्मचारी भी सह-आरोपी बनाए जाएं। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक व्यवस्था नहीं सुधरेगी।

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इसके साथ ही चिकित्सा शिक्षा में नैतिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं को पुनर्स्थापित करना होगा। चिकित्सा केवल रोजगार नहीं, सेवा का क्षेत्र है। डॉक्टर का पहला धर्म लाभ कमाना नहीं, जीवन बचाना होना चाहिए। यदि चिकित्सा क्षेत्र से संवेदनाएं समाप्त हो जाएंगी तो मशीनें बचेंगी, मानवता नहीं। आज समाज एक गहरे भय और असुरक्षा के दौर से गुजर रहा है। जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं, जब जीवन बचाने वाले ही जीवन के लिए खतरा बन जाएं, जब अस्पतालों में भरोसे की जगह डर और संदेह बैठ जाए, तब नागरिक कहां जाए? यह प्रश्न केवल मध्यप्रदेश और राजस्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश के सामने खड़ा है। यह केवल चिकित्सा व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि नैतिक पतन और सामाजिक विघटन का संकेत है।

वर्ष 2047 का विकसित भारत केवल आर्थिक समृद्धि से नहीं बनेगा। वह तभी बनेगा जब नागरिक स्वयं को सुरक्षित महसूस करेंगे, जब अस्पताल आशा के केंद्र बनेंगे, जब दवा पर विश्वास होगा और जब डॉक्टर का नाम सुनते ही श्रद्धा और भरोसा जागेगा। सड़कें, उद्योग, तकनीक और पूंजी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण मनुष्य का जीवन है। यदि जीवन ही सुरक्षित नहीं रहेगा तो विकास का कोई भी सपना अधूरा रह जाएगा। मेडिकल जैसे पवित्र पेशे में घुस चुके भ्रष्टाचार, फर्जीवाड़े और अनैतिकता के इस कैंसर का उपचार समय रहते करना होगा। यह केवल कानून का प्रश्न नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र का प्रश्न है। यदि हमने समय रहते कठोर निर्णय नहीं लिए तो फर्जी चिकित्सकों, नकली दवाओं और मुनाफाखोरी का यह जाल समाज के विश्वास को पूरी तरह निगल जाएगा। विकसित भारत की यात्रा में स्वास्थ्य व्यवस्था की पारदर्शिता, शुचिता, जवाबदेही और मानवीयता सबसे बड़ी आवश्यकता है, क्योंकि जहां जीवन सुरक्षित नहीं, वहां विकास का कोई भी स्वप्न स्थायी नहीं हो सकता।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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