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पृथ्वी की संरचना काल से प्रारंभ होती है हिंदू नव वर्ष

-हिंदू नव वर्ष पर विशेष-

पृथ्वी के निर्माण का उल्लेख ब्रह्म पुराण में मिलता है। जिसमें बताया गया है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही ब्रह्मा भगवान ने इस पृथ्वी की रचना की थी। जिसके बाद से सृष्टि का संचालन प्रारंभ हुआ। इसलिए सनातन धर्मावलंबी इसी दिन हिन्दू नववर्ष मनाते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि नव संवत्सर मनाने की शुरुआत उज्जैन के महान सम्राट विक्रमादित्य के कार्यकाल में हुई थी। इसे भारतीय नववर्ष के नाम से भी जाना जाता है। विक्रमादित्य के समय में इसकी शुरुआत होने से इसे विक्रम संवत के नाम से जाना जाता है। राजा विक्रमादित्य के दरबार में वराहमिहिर नाम के एक प्रसिद्ध खगोलशास्त्री थे। उन्हें सूर्य, चंद्रमा और तारों तथा उनकी गति के बारे में अच्छा खासा ज्ञान था। उन्हीं ने सबसे पहले साल के सभी दिनों को विक्रम संवत के रूप में मनाने का प्रस्ताव दिया था। विक्रम संवत ग्रेगोरियन कैलेंडर से लगभग 57 वर्ष आगे चलता है।

उदाहरण के लिए 2024+57=2081 विक्रम संवत शुरू होने जा रहा है। नव संवत्सर से शुरू हुए हिन्दू कैलेंडर में कुल 12 महीने होते हैं, जिनमें चैत्र पहला महीना होता है जबकि फाल्गुन आखिरी महीना होता है।हिंदू कैलेंडर के 12 माह- चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन ।भारत के विभिन्न भागों में नव वर्ष दो-तीन प्रमुख तिथियों को मनाया जाता है। प्रायः पहली दो तिथियाँ मार्च और अप्रैल के महीने में पड़ती है. पहली तिथि – मेष संक्रान्ति अथवा वैशाख संक्रान्ति (बैसाखी) अथवा विषुव/विषुवत संक्रान्ति (बिखौती) अथवा सौरमण युगादि भी कहते हैं। इस तिथि को मुख्य रूप से सौरमण वर्षपद मानने वाले प्रान्त नये वर्ष के रूप से मनाते हैं, जैसे : तमिळ-नाडु और केरल। इसके अतिरिक्त बंगाल और नेपाल भी इसे नव वर्ष के रूप में मनाते है।

हिमालयी प्रान्तों जैसेः उत्तराखण्ड, हिमाचल और जम्मू के साथ साथ पंजाब, पूर्वांचल और बिहार में केवल एक पर्व के रूप मनाया जाता है पर नव वर्ष के रूप में नहीं। उत्तराखंड, हिमाचल, जम्मू, पंजाब, पूर्वांचल और बिहार में नव सम्वतसर वर्ष प्रतिपदा के दिन आरम्भ होता है। सिखों के द्वारा नवनिर्मित नानकशाही कैलंडर के अनुसार सिख नव वर्ष चैत्र संक्रांति को मनाया जाता है। दूसरी तिथि : वर्ष प्रतिपदा (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा) अथवा चन्द्रमण युगादि। इस तिथि को मुख्य रूप से चन्द्रमण वर्षपद मानने वाले प्रान्त नये वर्ष के रूप से मनाते हैं। कर्णाटक एवं तेलुगू राज्य- तेलंगाना और आन्ध्र प्रदेश में इसे उगादी (युगादि-युग+आदि का अपभ्रंश) के रूप में मनाते हैं। यह चैत्र महीने का पहला दिन होता है। कश्मीरी नववर्ष भी इसी दिन होता है और उसे नवरेह के नाम से जाना जाता है।

महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा के रूप में यही दिन मनाया जाता है। और सिन्धी इसी दिन को चेटी चंड कहते हैं। सिंधी उत्सव चेटी चंड, उगाड़ी और गुड़ी पड़वा एक ही दिन मनाया जाता है। मदुरै में चित्रैय महीने में चित्रैय तिरूविजा नए बरस के रूप में मनाया जाता है।  तीसरी तिथि : बलि प्रतिपदा (कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा)। यह दीपावली के अगले दिन मनाया जाता है। दीपावली पर सब हिन्दू महालक्ष्मी पूजा कर एक वर्ष के लेखे जोखे को बंद कर देते हैं। अगले दिन से नये आर्थिक/वाणिज्यिक वर्ष का आरम्भ होता है। व्यापारी वर्ग प्रधान प्रान्तों यह दिन मुख्य रूप से नव वर्ष के रूप में मनाते हैं। मारवाड़ी नया बरस दीपावली के अगले दिन होता है। गुजराती नया बरस भी दीपावली के अगले दिन होता है। इस दिन जैन धर्म का नववर्ष भी होता है।इसी दिन के सूर्योदय से ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की।सम्राट विक्रमादित्य ने इसी दिन राज्य स्थापित किया। इन्हीं के नाम पर विक्रमी संवत् का पहला दिन प्रारंभ होता है। प्रभु श्री राम के राज्याभिषेक का दिन यही है।शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात् नवरात्र का पहला दिन यही है।सिखो के द्वितीय गुरू श्री अंगद देव जी का जन्म दिवस है।स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने इसी दिन आर्य समाज की स्थापना की एवं कृणवंतो विश्वमआर्यम का संदेश दिया।

सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक वरूणावतार झूलेलाल इसी दिन प्रगट हुए।राजा विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हूणों और शकों को परास्त कर भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना। शक संवत की स्थापना की। युधिष्ठिर का राज्यभिषेक भी इसी दिन हुआ।१०. संघ संस्थापक प.पू.डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार का जन्म दिन। महर्षि गौतम की  जयंती तिथि भी यही है।वसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है। फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है। नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात् किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिये यह शुभ मुहूर्त होता है। हिंदू नव वर्ष के प्रथम दिन से हमें परस्पर एक दुसरे को नववर्ष की शुभकामनाएँ देनी चाहिए। पत्रक बांटें, झंडे, बैनर…. आदि लगावे । आपने परिचित मित्रों, रिश्तेदारों को नववर्ष के शुभ संदेश भेजें। इस मांगलिक अवसर पर अपने-अपने घरों पर भगवा पताका फेहराएँ।आपने घरों के द्वार, आम के पत्तों की वंदनवार से सजाएँ। घरों एवं धार्मिक स्थलों की सफाई कर रंगोली तथा फूलों से सजाएँ।इस अवसर पर होने वाले धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लें अथवा  विभिन्न सांस्कृतिक एवं सामाजिक धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन करें। प्रतिष्ठानों की सज्जा एवं प्रतियोगिता करें। झंडी और फरियों से सज्जा करें।

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