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पहला अध्यापक : शिक्षक के प्रति श्रद्धा, संवेदना एवं सम्मान जगाती कृति

पुस्तक ‘पहला अध्यापक’ शिक्षा पर केद्रित उन तमाम महत्वपूर्ण कृतियों में से एक है जो पाठकों के सामने न केवल व्यक्ति के जीवन में शिक्षा के महत्व एवं भूमिका का सम्यक् चित्र उपस्थित करती हैं बल्कि अशिक्षा के कुहासे की चादर ओढ़े सोये पड़े समाज को झकझोर कर जगाती भी है। यह पुस्तक तत्कालीन सोवियत रूस के सामाजिक ताने-बाने, कुप्रथा-परम्पराओं एवं रिवाजों की सीली परतें खोलते हुए सूखी उर्वर जमीन का दृढ आधार भी तैयार करती है जिस पर करुणा, समता, न्याय, बंधुत्व एवं परस्पर विश्वासयुक्त मानवीय मूल्यों से सुवासित भव्य भवन निर्मित किया जाना सहज सम्भव है। यह कथा अशिक्षा के दलदल में आंकठ धंसे श्रमजीवी कृषकों की हथेलियों में शिक्षा का सूरज धर प्रगति की नवल राह दिखाती पहले अध्यापक के प्रति श्रद्धा, संवेदना, सम्मान एवं पावन प्रेम के पुण्य स्मरण एवं समर्पण का जीवन्त मोहक आख्यान है।

पहला अध्यापक मूलरुप से रुसी भाषा में चिंगिज ऐटमाटोव लिखित ‘दुईशेन’ का भीष्म साहनी कृत हिंदी अनुवाद है, जो राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया गया है। 69 पृष्ठों में बिखरी कथा में अशिक्षा, अंधविश्वास एवं कुप्रथाओं में जकड़े रूसी ग्रामीण समाज में शिक्षा के प्रसार के लिए एक युवा कम्युनिस्ट लीग सदस्य के संघर्ष, श्रम, जिजीविषा, लगन से शिक्षा के स्वप्न के साकार करने की रोचक दास्तान है। अनपढ़ ठंढे पहाड़ी गांव कुरकुरेव के लोगों की अज्ञानता से जूझते हुए दुइशेन का संघर्ष दरअसल ज्ञान की सर्जना का संघर्ष है।

उसका परिश्रम अंधेरे के कृष्ण फलक में उजाले की सुनहरी रेख खींचने का संकल्पित प्रयास है। तभी तो वह बच्चों सें कहता हैं, ‘‘काश कि तुम जानते बच्चो, कैसा उज्ज्वल भविष्य तुम्हारी राह देख रहा है।’’ तो वहीं छात्रा आल्तीनाई द्वारा अपने पहले अध्यापक दुइशेन के प्रति व्यक्त कृतज्ञता का प्रदर्शन भी है। एक ऐसे अध्यापक के प्रति जो स्वयं ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं हैं, शिक्षण के तौर तरीके नहीं जानता, और न ही अध्यापन-कर्म का कहीं विधिवत प्रशिक्षण ही प्राप्त किया है। पर वह जीवन में शिक्षा के महत्व से सर्वथा परिचित है। आल्तीनाई कहती है, ‘‘मैं आज भी सोचती हूं और हैरान हो जाती हूं कि वह अर्ध शिक्षित युवक जो मुश्किल से अक्षर जोड-जोड़ कर पढ़ता था, जिसके पास एक भी पाठ्यपुस्तक न थी यहां तक कि वर्णमाला की भी पुस्तक तक न थी, कैसे एक ऐसे काम को हाथ में लेने का साहस कर पाया जो वास्तव में महान था।’’

पुस्तक में मुख्यतः तीन पात्र हैं। शिक्षक दुइशेन, शिक्षार्थी आल्तीनाई सुलैमानोव्ना और सूत्रधार के रूप में कथा को पाठकों तक पहुंचाने का काम करने वाला स्वयं लेखक। पुस्तक में जीवन के विविध रंग समाहित हैं। अगर उत्कट पवित्र प्रेम एवं त्याग का निर्झर मधुर निनाद कलरव कर रहा है तो घृणा, हिंसा, क्रोध एवं लालच की लू-लपटें मन झुलसाती हैं। जहां रिश्तों की गरमाहट, मधुरता एवं संवेदनशीलता मुखर होकर प्रकट हुई है वहीं निष्ठुरता, प्रताड़ना, अमानवीयता, अपमान एवं यौन हिंसा की एक क्षुद्र काली धारा भी प्रवाहित है। बच्चों की शिक्षा के प्रति शिक्षक दुईशेन का जुनून भरा एकल प्रयास पाठक के हृदय में घर कर जाता है।

तो वहीं समुदाय का असहयोग, उपेक्षा, उपहास एवं तिरस्कार मन क्षुब्ध करता है। पुस्तक शिक्षा पर केंद्रित होकर भी अन्य मुद्दों की बंद चौहद्दी में तमाम खिड़कियां खोलती है ताकि बदलाव की बयार का शीतल झोंका भीतर आ सके। पुस्तक समाज में औरतों की कमतरी एवं पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना को रेखांकित कर बाल विवाह का विद्रूप चेहरा भी उभारती है। एक अनाथ लड़की के प्रति उसके चाचा-चाची के क्रूर कटुतापूर्ण बर्ताव पाठक की आंखें न केवल पनीली करते हैं बल्कि सम्पूर्ण भारतीय उप महाद्वपीय क्षेत्र के सामाजिक ढांचे से जोड़ता भी है। एक पत्नी के बावजूद दूसरी पत्नी (तोकोल) लाने या रखैल बनाकर रखने के सामाजिक चलन को इंगित करते दृश्य पाठक के मन को कषैला करते हैं।

पुस्तक की कथावस्तु की चर्चा करूं तो कथा का नायक दुइशेन अपनें गांव कुरकुरेव में स्कूल खोलने हेतु समुदाय की सभा में प्रस्ताव रखता है लेकिन कोई उसके साथ नहीं आता है। सब कहते हैं, ‘‘हम किसान हैं, मेहनत करके जिंदगी बसर करते हैं, हमारी कुदालें हमें रोटी देती हैं, हमारे बच्चे भी इसी तरह बसर करेंगे। उन्हें पढ़ने-लिखने की कोई जरूरत नहीं हैं। पढाई की जरूरत होती है अफसरों- अधिकारियों को। हम तो सीधे-सादे लोग हैं, हमें उल्टे-सीधे फेर में नहीं डालो।’’ तब वह सवाल करता है, ‘‘क्या सचमुच आप लोग बच्चों की तालीम के खिलाफ हैं।’’ और फिर वह सोवियत सत्ता का मुहर लगा एक पत्र निकालता है और तब सभा शान्त हो जाती है पर सहमत एवं सहयोगी नहीं। खंडकर हो चुके एक बाड़े की झाडियों को काट आंगन साफ कर स्कूल बन जाने के बाद एक सुबह वह बच्चों को एकत्र करने गांव में पहुंच हर दरवाजे पर दस्तक देता हैं। वास्तव में यह दस्तक अशिक्षित समाज की ड्योढी पर उजाले की दस्तक है।

तमाम बच्चों को साथ लेता हुआ वह अंत में आल्तानाई के घर पहुंचता है जहां उसकी चाची से तीखा प्रतिवाद होता है जो बालिकाओं की शिक्षा के सख्त खिलाफ है। आखिर चाचा के हस्तक्षेप से आल्तीनाई दुइशेन के साथ स्कूल जाती है जहां प्रत्येक बच्चे को एक-एक कापी, पेंसिल और तख्ती बांटी जाती है। स्कूल में बच्चे पहली बार तमाम नये शब्दों और उनके अर्थो से परिचित होते हैं। वहीं लेनिन का चित्र भी देखते हैं। कथा आगे तमाम उतार-चढ़ावों के साथ बढ़ती है जिसमें चाची द्वारा आल्तानाई का एक बंजारे के हाथ सौदा कर स्कूल से जबरिया उठवा देना, शिक्षक दुइशेन का लठैतों से संघर्ष और सरकार की मदद से लड़की को बंजारे के चंगुल से मुक्त करवा उच्च शिक्षा हेतु मास्को भेजना जहां आल्तीनाई पढ़-लिखकर दर्शनशास़्त्र की प्रोफेसर बन जती है। और एक दिन वह अपने गांव के सामूहिक फार्म के स्कूल के उद्घाटन में जाती है जहां ग्रामीणों की बातचीत से पता चलता है कि अभी स्कूल के पुराने छात्रों के तार का पुलिन्दा सौंप जाने वाला डाकिया दुइशेन ही है। शाम को उद्विग्न मन वह शहर लौट गयी और कुछ समय बाद लेखक को पत्र लिखा कि उसे उन तमाम लोगों तक पहुंचायें जो दुइशेन स्कूल को जानना चाहते हैं। सूत्रधार लेखक यहीं पर विराम लेता है।

पुस्तक का मुद्रण ठीक है। आवरण आकर्षक है। संवाद छोटे एवं रुचिपूर्ण हैं। भाषा सरल एव प्रवाहमय है। सैबाल चटर्जी के बनाये रेखांकन कथा को अर्थ विस्तार देते हैं। कुछ जगह वर्तनीगत अशुद्धियां खटकती हैं। जैसे विदेशों, अनेकों एवं शब्दकोष शब्द जिन्हें विदेश, अनेक एवं शब्दकोश होना चाहिए था। पुस्तक पठनीय है, खासकर शिक्षकों एवं शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले प्रत्येक कार्यकर्ता के पास यह किताब होनी चाहिए। पुस्तक पढ़ते हुए पाठक अपने परिवेशीय शिक्षकों में दुइशेन की छवि गढ़ने लगते है। यही पुस्तक की सफलता है।

प्रमोद दीक्षित मलय शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)
प्रमोद दीक्षित मलय
शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)
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