NEW English Version

नशा: राष्ट्र की जड़ों को खोखला करने वाली चुनौती


भारत आज विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में अग्रणी है। देश की लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की है। यह युवा शक्ति भारत की सबसे बड़ी सामर्थ्य, सबसे बड़ी पूंजी और उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला है। विज्ञान, तकनीक, उद्योग, शिक्षा, खेल और नवाचार के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों के पीछे इसी युवा शक्ति का योगदान है। किंतु विडंबना यह है कि आज यही युवा वर्ग नशे के बढ़ते जाल में फंसता जा रहा है। नशा अब केवल व्यक्तिगत कमजोरी या स्वास्थ्य संबंधी समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक स्थिरता, आर्थिक विकास और सांस्कृतिक मूल्यों के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। देश के विभिन्न भागों में समय-समय पर करोड़ों और अरबों रुपये मूल्य के मादक पदार्थों की बरामदगी यह प्रमाणित करती है कि नशे का कारोबार संगठित अपराध का एक विशाल अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क बन चुका है। विशेष रूप से पंजाब, जम्मू-कश्मीर, राजस्थान, गुजरात तथा पूर्वोत्तर राज्यों में सीमापार से होने वाली तस्करी ने स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया है। सुरक्षा एजेंसियों द्वारा लगातार हेरोइन, अफीम, चरस, कोकीन तथा सिंथेटिक ड्रग्स की बड़ी खेपों को पकड़ा जाना इस बात का संकेत है कि भारत को नशे के बड़े बाजार के रूप में देखा जा रहा है।

यह फोटो कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) द्वारा निर्मित है

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो तथा विभिन्न सरकारी रिपोर्टों के अनुसार देश में लाखों युवा किसी न किसी प्रकार के मादक पदार्थों के सेवन के आदी हैं। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा कराए गए एक व्यापक अध्ययन में यह तथ्य सामने आया था कि करोड़ों भारतीय तंबाकू, शराब और अन्य नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं तथा उनमें बड़ी संख्या युवाओं की है। चिंता की बात यह है कि स्कूल और कॉलेज स्तर तक नशे की पहुंच बढ़ रही है। अनेक राज्यों में ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां किशोरों को ड्रग्स के वितरण और तस्करी में इस्तेमाल किया गया। नशे के बढ़ते संकट का एक राष्ट्रीय सुरक्षा पक्ष भी है। अनेक सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान प्रत्यक्ष युद्ध में लगातार असफल होने के बाद भारत को अस्थिर करने के लिए आतंकवाद, नकली मुद्रा और नशे की तस्करी जैसे छद्म युद्ध के हथियारों का उपयोग करता रहा है। पंजाब में लंबे समय से सीमा पार से ड्रोन और अन्य माध्यमों द्वारा मादक पदार्थों की तस्करी के मामले सामने आते रहे हैं। अब जम्मू-कश्मीर में भी नशे के बढ़ते प्रभाव को इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है। आतंकवाद की कम होती गतिविधियों के बीच नशे का फैलाव एक नए खतरे के रूप में उभर रहा है, जिसका उद्देश्य युवा पीढ़ी को कमजोर करना और समाज की ऊर्जा को नष्ट करना है।

इसी संदर्भ में जम्मू-कश्मीर में प्रारंभ किया गया ‘नशामुक्त जम्मू-कश्मीर’ अभियान महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के नेतृत्व में चल रहा यह अभियान प्रशासनिक कार्रवाई के साथ-साथ सामाजिक सहभागिता पर भी बल देता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें शैक्षणिक संस्थानों, सामाजिक संगठनों, धार्मिक समूहों तथा आम नागरिकों को जोड़ने का प्रयास किया गया है। कुलगाम सहित कई क्षेत्रों में विभिन्न समुदायों द्वारा इस अभियान को समर्थन दिया जाना इस बात का संकेत है कि नशे जैसी समस्या का समाधान सामूहिक प्रयासों से ही संभव है। वास्तव में नशे का सबसे दुखद और भयावह प्रभाव युवा पीढ़ी पर पड़ता है। युवा जीवन ऊर्जा, सृजन और सपनों का प्रतीक होता है, किंतु नशा इन सभी संभावनाओं को नष्ट कर देता है। एक बार नशे की गिरफ्त में आने के बाद व्यक्ति धीरे-धीरे अपनी शारीरिक क्षमता, मानसिक संतुलन, आर्थिक स्थिति और सामाजिक प्रतिष्ठा खोने लगता है। उसका आत्मविश्वास कमजोर पड़ जाता है और वह अवसाद, तनाव तथा अपराध की दुनिया की ओर बढ़ सकता है। यही कारण है कि नशा केवल व्यक्ति को नहीं, पूरे परिवार को प्रभावित करता है। परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ती है, पारिवारिक संबंध टूटते हैं और सामाजिक जीवन में अस्थिरता बढ़ती है।

नशे के विस्तार के पीछे केवल तस्करी जिम्मेदार नहीं है। इसके सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक कारण भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। बेरोजगारी, भविष्य की अनिश्चितता, बढ़ती प्रतिस्पर्धा, पारिवारिक तनाव, सामाजिक विघटन, अकेलापन, मानसिक अवसाद और गलत संगति युवाओं को नशे की ओर धकेलती है। आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति ने भी कृत्रिम सुख और त्वरित आनंद की मानसिकता को बढ़ावा दिया है। जब जीवन में लक्ष्य, दिशा और सकारात्मक प्रेरणा का अभाव होता है, तब व्यक्ति नशे जैसे विनाशकारी विकल्पों की ओर आकर्षित हो सकता है। नशे और अपराध का संबंध भी अत्यंत गहरा है। अनेक अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि चोरी, लूट, हिंसा, सड़क दुर्घटनाओं और अन्य अपराधों के पीछे नशे की भूमिका बढ़ती जा रही है। नशे की डोज प्राप्त करने के लिए युवा अपराध की राह पर उतर जाते हैं। इससे कानून-व्यवस्था प्रभावित होती है और समाज में असुरक्षा का वातावरण बनता है। सरकारें इस चुनौती से निपटने के लिए अनेक स्तरों पर प्रयास कर रही हैं। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, राष्ट्रीय जांच एजेंसी, सीमा सुरक्षा बल तथा राज्य पुलिस की संयुक्त कार्रवाइयों से कई बड़े ड्रग नेटवर्क ध्वस्त किए गए हैं। पंजाब, राजस्थान, गुजरात और जम्मू-कश्मीर में विशेष अभियान चलाकर तस्करों पर शिकंजा कसा गया है।

इस संदर्भ में सामाजिक और आध्यात्मिक आंदोलनों की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। कानून भय पैदा कर सकता है, लेकिन जीवन में सकारात्मक परिवर्तन केवल जागरूकता और आत्मानुशासन से ही आता है। आचार्य तुलसी ने अणुव्रत आंदोलन के माध्यम से नशामुक्ति को एक व्यापक सामाजिक अभियान का स्वरूप दिया था। उन्होंने संयम, सदाचार और आत्मनियंत्रण के आधार पर लाखों लोगों को व्यसनमुक्त जीवन की प्रेरणा दी। अनेक क्षेत्रों में उनके अभियान ने उल्लेखनीय परिणाम दिए। आचार्य महाश्रमण ने भी अपनी ऐतिहासिक अहिंसा यात्रा के दौरान भारत और पड़ोसी देशों में लाखों लोगों को नशा त्यागने की प्रेरणा दी। उनकी पदयात्राओं का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य समाज में नैतिक चेतना जगाना और युवाओं को व्यसनमुक्त जीवन की ओर प्रेरित करना रहा। हजारों किलोमीटर की यात्राओं में उन्होंने गांव-गांव और शहर-शहर जाकर लोगों को यह संदेश दिया कि नशामुक्ति केवल स्वास्थ्य की सुरक्षा नहीं, बल्कि आत्मविकास, पारिवारिक सुख और राष्ट्र निर्माण का आधार है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि नशे के विरुद्ध बहुआयामी रणनीति अपनाई जाए। सीमाओं पर निगरानी और तकनीकी सुरक्षा को और मजबूत किया जाए। ड्रोन के माध्यम से होने वाली तस्करी को रोकने के लिए आधुनिक उपकरणों का उपयोग बढ़ाया जाए। नशा तस्करों के विरुद्ध त्वरित न्यायिक प्रक्रिया सुनिश्चित की जाए ताकि अपराधियों में कानून का भय पैदा हो। स्कूलों और कॉलेजों में नशा विरोधी शिक्षा को नियमित पाठ्यक्रम और गतिविधियों का हिस्सा बनाया जाए। युवाओं के लिए रोजगार, खेल, कौशल विकास और सांस्कृतिक गतिविधियों के अवसर बढ़ाए जाएं ताकि उनकी ऊर्जा सकारात्मक दिशा में प्रवाहित हो सके। इसके साथ ही पुनर्वास केंद्रों की संख्या और गुणवत्ता में भी सुधार आवश्यक है।

आज पंजाब, जम्मू-कश्मीर और अन्य प्रभावित राज्यों के लिए नशामुक्ति केवल सामाजिक सुधार का कार्यक्रम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्र निर्माण का विषय बन चुका है। यह लड़ाई केवल सरकार या पुलिस नहीं जीत सकती। परिवार, विद्यालय, धार्मिक संस्थाएं, सामाजिक संगठन, मीडिया और जागरूक नागरिकों को मिलकर इसे जनआंदोलन बनाना होगा। जिस प्रकार स्वच्छ भारत अभियान ने जनभागीदारी से सफलता प्राप्त की, उसी प्रकार नशामुक्त भारत का सपना भी सामूहिक संकल्प और निरंतर प्रयासों से ही साकार हो सकता है। भारत की युवा शक्ति देश की सबसे बड़ी संपदा है। यदि यह शक्ति नशे की गिरफ्त में चली गई तो राष्ट्र की प्रगति बाधित होगी, लेकिन यदि इसे स्वस्थ, संस्कारित, जागरूक और लक्ष्यनिष्ठ बनाया गया तो भारत विश्व के सामने एक नई शक्ति के रूप में उभरेगा। इसलिए नशे के विरुद्ध संघर्ष केवल एक सामाजिक अभियान नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य को सुरक्षित करने का संकल्प है।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
Book Showcase

Best Selling Books

Ikigai: The Japanese secret to a long and happy life

By Héctor García, Francesc Miralles

₹318

Book 2 Cover

Why I am an Atheist and Other Works

By Bhagat Singh

₹104

Truth without apology

By Acharya Prashant

₹240

Until Love Sets Us Apart

By Aditya Nighhot

₹176

Translate »