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सर्पों की पूजा और उनका संसार

09 अगस्त नाग पंचमी पर्व पर विशेष-

नागपंचमी का त्यौहार भारतवर्ष में बड़ी धूमधाम पूर्वक मनाया जाता है। इस दिन गांवों और शहरों में कुश्ती ,दंगल के खेल अखाड़ों में आयोजित किये जाते हैं। बिलासपुर शहर में गोड़पारा स्थित मन्नुलाल अखाड़ा समिति द्वारा प्रतिवर्ष लालबहादुर शास्त्री स्कूल के मैदान में दंगल प्रतिस्पर्धा क आयोजन किया जाता है। गांव गांव में इस अवसर पर लोगों द्वारा नागपूजा की जाती हैं एवं नागों को दूध लाई खेतों एवं देवालयों में पिलाया एवं चढ़ाया जाता है। नागपंचमी का दिन अनेकानेक मंत्रों की सिद्धि के लिये बाबा गुनियाओं के लिए बड़ा महत्वपूर्ण होता है।  वैदिक धर्म में नागपंचमी  मनाने की कई प्रचलित, कथाएं हैं। फिर भी मंत्र साधना हेतु इस दिवस का विशेष महत्व होता है बैगा गुनिया लोग इस तिथि को पहली तिथिवार से यानी चौथ से लगा हुआ मानकर रात अपने शिष्यों को गुरुमंत्र देने की तैयारी में लगे रहते हैं मुख्यतः इस दिन को मंत्र सिद्धि के लिये अत्युत्तम माना जाता है। छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की संख्य ज्यादा हैं।

ज्यादातर गोड़ी संस्कृति के कारण यहां मंत्र तंत्र पर विश्वास रखने वाले अधिक मिलते हैं। बैगा-गुनिया लोग तथाकथित भूत प्रेत भगाने के लिये इस दिन तरह तरह के अनुष्ठान करना प्रारंभ कर देते हैं आज के वैज्ञानिक जीवन का इन क्रियाकलापों के बीच कोई प्रभाव नहीं जान पड़ता है। मुख्यतः इस दिन अरनी जंजीरामंच की सिद्धि की जाती है। इसके लिये एक वृद्ध आयोजन नगमल नामक प्रक्रिया से प्रारंभ होती है। महतो प्रक्रिया में जिसे पाठ पीढ़वा सौपना कहते हैं लगभग हर तीसरे गांव में आयोजित होता है पाठ पीढ़वा दरअसल में मंच सीखने और सिखाने वाले बैगा के बीच गुरुशिष्य परंम्परा को जारी रखने व देवता का सम्मानित करने की प्रथा है।

इस समय एक नीम की लकड़ी का पीढ़ा बनाया जाता है और दीप, धूप घी, नारियल, आदि संकलित कर नागदेवता एवं इष्ट देवताओं की पूजा-अर्चना की जाती हैं फिर गुरु अपने मंत्रों को शिष्य अथवा कई शिष्यो के कानों में अलग अलग बोलकर दीक्षा देता हैं। सामान्यतः सांप, बिच्छू, हाथ-पांव, पेट, सिर आदि दर्द एवं भूतप्रेत उतारने भगाने वाले मंत्रों सहित बाबा गठिया एवं अन्य बीमारियों के निदान के लिये भी मंत्र देता है। बतौर उदाहरणार्थ पेटदर्द के लिये सिद्ध किया जाने वाला मंत्र निम्न उद्धृत है जैसे- “अत्यर ऊपर पत्थर, पत्थर ऊपर गार बांधे, गौरी पार्वती घरे !!

पेट के लिये मोर फूंके,मोर गुरु के फूंके ।। 
गुरु कोन महादेव पार्वती के फूंके। पेट पीरा उड़िया जा ।।

उक्त मंत्र पढ़कर ही सिद्ध, नहीं किया जा सकता है। मंत्र साधना के पीछे कुछ बंदिशें भी रहती हैं अगर बंदिशों का उल्लंघन कर कोई ,लोगों को ठगकर पैसा कमाने का उपाय करेगा तो उसक मंत्र शक्तिक्षीण हो जाती हैं यह मान्यता भी सर्वमान्य हैं। यह भी कहा जाता है कि अगर शिष्य गुरु को अपनी सेवा से प्रसन्न कर लेता हैं तो कठिन से कठिन मंत्र भी वह रुपांतरित कर अनपढ़ गंवार शिष्य को भी मंत्र प्रदान कर देता हैं।

किसी मंत्र के लिये संस्कृत ज्ञान का होना जरुरी नहीं होता। शायद उक्त छत्तीसगढ़ी बोली में प्रस्तुत मंत्र को पढ़कर सहज ही में कोई विश्वास नहीं कर पायेगा फिर भी इस अंचल की लाखों ग्रामीण जनता की यही मान्यता और विश्वास का हस्तांतर साल दर साल नागपंचमी के अवसर पर होता आया है। यदि इस दिन कोई बैगा किसी कारण वश मंत्रों को शिष्यों में प्रसार नही कर पाता तो वह आने वाले भादो महीने के ऋषि पंचमी को जनहित के लिये अनेकशिष्यों को मंत्रों से पारंगत करता है। एक अन्य क्रिया नगमन की होती हैं इसकी प्रक्रिया वृद्धि रुपाकार में होती हैं इसमें नागपूजा के पहले दिन गांव के बाहर किसी मैदान को साफ सुथरा बनाकर उसे दलदली बना दिया जाता है, दूसरे दिन यानी पंचमी को सार्वजनिक रुप से शिष्यों को बुलाकर उन्हें मंत्र से भारित किया जाता है। गुरु द्वारा मंत्रभारित होते ही  शिष्यगण उस मैदान में सर्प की तरह बोलने लगते हैं।

इसके बाद बैगा अपने शिष्यों को गुरुदीक्षा भी देता है। नागपंचमी के दिन सामान्य ग्रामीण जन प्रातः होते ही दूधलाई लेकर खेतों, देवालयों में ले जाते हैं जहां नागदेवता (सांप) को दूध लाई प्रसाद के रूप में पिलाया जाता है एवं उनकी पूजा अर्चना भी की जाती है।. इस दिन प्रायः सभी हिन्दू घरों में भी नाग देवता की पूजा अर्चना की जाती हैं एवं पूजागृह में नागदेवता की आकृति गौमाता के गोबर से निर्मित की जाती है। कोई कोई घी, बंदन या रंग के द्वारा भी वासुकी एवं शेषनाग का काल्पनिक चित्र बनाते हैं। इसके बाद चंदन, बंदन फूल पत्रों से उनकी आरती एवं अराधना की जाती हैं नागपंचमी को किसान लोग प्रायः अपने खेतों में हल चलाने से परहेज रखते हैं।

वे लोग इस दिन  हल चलाना अच्छा नहीं समझते, हालांकि आजकल आधुनिक जमाने में हल की जगह ट्रेक्टर का उपयोग होने से इस मान्यता को आघात पहुंचा है। नागपंचमी की बात हो और सांपों की प्रजाति की बात न हो यह कैसे हो सकता हैं। विश्व भर में सांपों की लगभग पचीस सौ जातियां पाई जाती हैं, जिनमें से केवल बारह प्रतिशत जातियां की जहरीली होती है। अर्थात 2500 में से 200 जातियां ही ऐसी हैं जिनके काटने से मृत्यु होना संभव हैं शेष 2300 जातियों के सांपों में से कुछ में नाममात्र का जहर होता हैं, और कुछ में तो जहर होता ही नहीं। कम जहर वाले सांप के काटने से नशा भर हो सकता है। बिना जहर वाले सांप का काटना और कांटा चुभना एक बराबर हैं। 

     संसार का सबसे जहरीला सांप हैं आस्ट्रेलिया का टाइगर स्नेक, किंग कोबरा भी भयंकर  जहरीला होता हैं। जितनी तेजी से सांप का जहर असर करता हैं, उससे भी अधिक तेजी से मनुष्य के मनोमस्तष्कि पर असर करता हैं सांप काटने का भय। अक्सर मृत्यु की वजह जहर और भय दोनों ही होते हैं. भय के कारण भी कई लोग मर जाते हैं । हमारे देश में केवल दो सौ से तीन सौ जहरीले सांप पाये जाते हैं। इनमें कोबरा, करैत, सास्केल, बाइपर और रसेल्स वाईपर आदि चार जातियां सर्वाधिक जहरीली होती हैं।

इन चारों जातियों के सांपों का जहर मनुष्य को तो छोड़िये हाथी तक को मार डालने में सक्षम होता हैं। पदम, कालगण्डेस, संखचूड़, भदा, शेषनाग, कालीनाग, राजनाग, तामेश्वरी, फुलफगार, ऐराज, प्रहलाद, डीडूं, धामिन, रक्तवंशी, अजगर,सुआपंखी, जलेबिया और दुमई आदि सांपों की लगभग पचास जातियां ऐसी हैं, जिनके सांप जहरीले कम लेकिन ज्यादा  खतरनाक होते हैं। सांप ठण्डे देशों में कम पाये जाते हैं और गर्म देशों में अधिक पाये जाते हैं । यही कारण है कि भारत, अफ्रीका, थाइलैंड और श्रीलंका में सांप अधिक होते हैं।

       कम अधिक की बात छोड दे तो संसार में ऐसी कोई जगह नहीं हैं जहां सांप नहीं पाये जाते हैं। सरीसृप वर्ग का यह प्राणी जमीन पर भी रहता हैं, जमीन के नीचे भी, पानी में भी ये रहते हैं, और पेड़ों पर भी। सांप के सिर के दोनों ओर, आंखों के थोड़ा नीचे विषग्रंथि होती है। ऊपर जबड़े के आगे की ओर एक-एक विषदंत होता है विषदंतों में छेद होता हैं। विष ग्रंथियों से एक नली द्वारा विष, विषदंतों तक पहुंचता हैं। कोबरा और करैत के विषदंतों में एक विशेष प्रकार खाना होता हैं जबकि वाश्पर के विषदंत नली के आकार के होते हैं । कोबरा सर्प काले मटमैले रंग का होता हैं। इसके सिर पर छत्र सा होता हैं, और गले में श्वांस नली के ऊपर गाय के खुर जैसा सफेद निशान होता हैं इसी निशान की वजह से देहातों में इसे गरुखुर या गोखरु भी कहा जाता है। करैत की पीठ पर सफेद लकीर होती हैं ये लकीरें पूंछ की ओर से साफ होती हैं, तथा सिर की ओर हल्की होती हैं। इनके पूरे शरीर पर हीरे जैसे चिन्हें होते हैं।

      वाइपर मोटा और भूरे लाल रंग का होता हैं। रसेल्स वाइपर को दबोइयां सांप के नाम से भी जाना जाता है। इसकी लंबाई डेढ़ मीटर तक होती हैं। यह मोटा इतना होता हैं कि पहली नजर से अजगर का बच्चा नजर आता हैं। इसका सिर मोटा, तिकोना और चौड़ा होता हैं। तथा थूथन छोटा होता हैं। नाक के छेद खुले और बड़े होते हैं। पुतलियां लंबी और आंखे बड़ी रहती हैं। रसेल्स वाइपर का रंग मटमैला, भूरा, पेट गोलाई पर और पूंछ छोटी होती हैं। शरीर के ऊपर बडे बडे धब्बों की तीन कतारें होती हैं।दो दायें बांय और एक बीच में होती हैं। बीच वाली कतार में छोटे छोटे एक निशान होते हैं। इसके सिर के पीछे काली निशान होता है। और आंखों से मुंह तक काले रंग की रेखा सी खिंची रहती हैं, यह  भारत, वर्मा, थाइलैंड, ताइवान, श्रीलंका और आस्ट्रेलिया में अधिक पाया जाता हैं।

वैसे रसेल्स वाइपर दक्षिणी भारत में एकइस सौ फुट की ऊंचाई तक और हिमालय पर अठारह सौ फुट की ऊंचाई तक भी पाया जाता हैं। पर यह मैदानों और समुद्र तट पर रहना ज्यादा पसंद करता हैं। चूहे इसका प्रिय भोजन होते हैं । सांपों की उम्र दस से बीस वर्ष के बीच होती हैं। यह बेवजह किवंदती हैं कि सांप सौ दो सौ साल तक जीवित रहते हैं। विषैला सर्प विष का प्रयोग अपने शत्रु को मारने के लिये ही करता हैं। काटने पर विषदंतों के छेदों द्वारा इसका जहर शत्रु के शरीर में चला जाता हैं। विष की जितनी मात्रा शत्रु के शरीर में जायेगी, वह उतना ही घातक होगा, विष का असर रक्त में पहुंचने पर होता हैं। कोबरा व करैत का विष मस्तिष्क तथा रीढ़ की हड्डी पर असर करता हैं।

दंश की जगह में दर्द और जलन होता हैं तथा सूजन आ जाता हैं। कभी कभी खून भी निकलता हैं, और दंश की जगह सुन्न पड़ जाती हैं। जहर का असर  शुरु होते ही नींद आने लगती हैं,और ये मांसपेशियों पर नियंत्रण समाप्त हो जाता हैं।थोड़ी देर बाद सांसें धीमी पड़ने लगती हैं, तथा मुंह से झाग आने लगते हैं। बाद में श्वसन क्रिया बंद होने से मौत हो जाती हैं।  जहरीले सांप के काटने पर यदि उचित इलाज न हो तो, एक से बारह घण्टे के इबीच कभी भी मौत हो सकती हैं। वैसे विष का असर इस बात पर भी निर्भर करता है कि काटे हुये व्यक्ति का स्वास्थ्य कैसा हैं ।. सांप काटे व्यक्ति को इलाज के लिये एण्टीस्नेक वेनम सी एम का इंजेक्शन दिया जाता है। खैर यह तो रहा नागों का संसार हम फिर से नाग पंचमी पर्व पर आते हैं।

      नागपंचमी का त्यौहार वैसे तो बिलासपुर जिले सहित छत्तीसगढ़ के प्रायः सभी क्षेत्रों में  धूमधाम से मनाया जाता हैं परंतु अकलतरा  बलौदा के आसपास के क्षेत्रों में इस पर्व में दलहा पहाड़ में रोमांचक पर्वतारोहण किया जाता हैं। इस दिन आसपास के क्षेत्रों में हजारो लोग जिसमें बाल, अबाल, वृद्ध,नर, नारी सभी होते हैं, ये पहाड़ की चोटी पर चढ़कर रोमांचक आनंद का अनुभव करते हैं। जिले के अधिकांश स्थानों पर से दिखाई देने वाला, अनेकानेक विहंगम एवं नवनाभिराम दृश्यों से संपन्न यह पहाड़ बिलासपुर से सीपत बलौदा मार्ग पर लुथरा शरीफ से चार किलोमीटर पर तथा अकलतरा बलौदा मार्ग पर परसाही से सात कि.मी. पर स्थित हैं। पहाड़ की तली तक कच्ची सड़क गयी हैं।

यह पहाड़ दक्षिण दिशा की ओर से खड़ी ढलान लिये हैं, अतः इस ओर से चढ़ना दुष्कर हैं, इसलिये उत्तर दिशा में पहाड़ पर चढ़ना पड़ता हैं। पहाड़ की तली पर एक अत्यंत सुंदर जलाशय हैं। स्वच्छ जल से भरे इसके तट पर गुलमोहर के घने जंगल है। करीबदो सौ मीटर की ऊंचाई पर कोराचुंआ नामक स्थान हैं, जहां पर नागपंचमी के दिन विशाल मेला का आयोजन किया जाता है। यहां पर स्वामी जगदेवानंद द्वारा निर्मित एक भव्य आश्रम हैं। उनकी मृत्यु के बाद उनकी समाधिस्थल भी  इसी आश्रम में बनी हुई हैं आश्रम के नीचे भूमिगत जल का एक कुण्ड हैं जिसे सूर्यकुण्ड कहा जाता हैं, जो हमेशा शीतल एवं मीठे जल से भरा रहता हैं। इस कुण्ड के बारे में यह प्रचलित हैं कि जिस व्यक्ति  को सफेद कुष्ठ या किसी भी प्रकार का. त्वचारोग हो वह अगर ग्यारह रविवार तक उस कुण्ड में स्नान करे तो उसकी बीमारी जड़ से समाप्त हो जाती हैं।

नागपंचमी के दिन उस जल का पान करना बहुत शुभ माना जाता है। मेला भ्रमण एवं कुण्ड के के जल का पान करने के बाद पर्वत की चढ़ाई शुरु होती हैं। चोटी पर पहुंचने के लिये करीब पांच किलोमीटर की चढ़ाई चढ़नी पड़ती हैं। चढ़ने में करीब दो घण्टा का समय लगता हैं। इस सोठी पहाड़ पर नागपंचमी के पावन पर्व पर हजारों लोग कष्ट उठाते हुये भी चोटी चढ़ने के रोमांचक अनुभव का आनंद लेने के लिये वहां जाते हैं। चढाई के दौरान अनेक मनभावन एवं लुभावने प्राकृतिक दृश्य भी अवलोकित होते हैं।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
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