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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व देश के प्रधान प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू

14 नवंबर पंडित नेहरू जयंती-

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”

श्री नेहरू के बारे में लिखना एक दुरूह प्रक्रिया हैं। लेकिन उन पर लिखना बड़ा मनमोहक अनुभूति प्रदान करता है। उनके लिये कुछ भी कहना हो तो शब्द ही कम पड़ जाते हैं, बनिस्बत अन्य भारतीय नेताओं का। वैसे किसी भी महापुरुषों की तुलना मुझे नहीं करनी चाहिये, पर भी पंडित जवाहर लाल नेहरू आधुनिक भारत के शिल्पकार थे और आज भारत की उत्तरोत्तर प्रगति जो विश्व के परिदृश्य में दिखाई दे रहीं हैं उन्हीं की दूरगामी योजनाओं एवं कार्यों का परिणाम हैं। वैसे भी ज्यादातर उनके बाद की परवर्ती सरकारों ने उन्हीं की नीतियों का अनुसरण किया है। शायद यहीं बात उनकी सफलता का एक कारण भी रहा हो।

आजादी की लड़ाई में प्रमुख रूप से हिस्सा लिये हुये पंडित नेहरू दिव्यमान व्यक्तित्व के धनी एक जनप्रिय नेता थे। महात्मा गाँधी ने इनके जनजीवन को जितना झझकोरा हैं, शायद इतिहास के किसी महापुरुष में ऐसा अहम बदलाव नहीं देखा गया होगा। जवाहर लाल नेहरू का व्यक्तित्व इतना विशाल था कि उगते सूरज के समान तेजस्विता एवं वहीं पूर्णिमा के पूर्ण चंद्रमा की सफेद झकाझक रोशनी से सरोबार था।

   हालांकि हर व्यक्ति में अच्छाईयां भी होती हैं तो बुराइयाँ भी पाई जाती है, इस पर किसी को कभी एतराज नहीं रहा है। तात्कालिक नेताओं ने उन पर भी कुछ आरोप लगाए थे कि भारत विभाजन के लिये गाँधी एवं नेहरु की नीतियाँ ही दोषी हैं। लेकिन यह सत्य नहीं था। इसके और भी अन्य कई कारण थे। उन्होंने भारत वर्ष के निर्माण के लिये इतने उल्लेखनीय कार्य किये हैं कि उनकी किंचित बुराइयों पर नजर ही नहीं पड़ पातीं। लोग जब राजीव गाँधी को अपने नाना का पौत्र नाना की प्रतिछाया बताने की सिफारिशें करते थे, तभी इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि इतिहास में नेहरू की कितनी जरूरत रहीं होगी।

इतिहास वेत्ता मॅथ्यूस ने एक अवसर पर कहा था कि भविष्य में नेहरु की तस्वीर एक प्रखर राजनीतिज्ञ के रूप में भले ही न उभरे, कलम के धनी के रूप में सदियों याद किये जायेंगे। विख्यात पत्रकार जॉन गुंचर के अनुसार इस सदीं में नेहरू की टक्कर इने गिने लेखकों से होती है। आलोचकों ने उनकी तुलना ब्लाक हर्डर, स्पेगलर और अर्नाल्ड हायंबी से की हैं। जवाहर लाल नेहरु यदि राजनीति में नहीं आते तो वे भी एक महान लेखक के रूप में दुनिया में उनका यश सुरक्षित था। साहित्य को इनके राजनीति में चले जाने से भारी नुकसान हुआ हैं।

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नेहरु राजनीति में जाने के बाद साहित्य सेवा के लिये बहुत ही कम, अपवाद स्वरुप ही समय दे पाये थे। लेकिन नेहरु की एक खासियत थीं कि वे जिस काम के पीछे पड़ जाये, उसमें विशेषज्ञता हासिल कर ही दम लेते थे। यहीं कारण हैं कि वे एक मूलतः लेखक होते हुये भी कुशल एवं परिपक्व राजनीतिज्ञ के रुप में भी सुस्थापित हुये।

 नेहरु का निरालापन, रोमन बादशाहों जैसे नाक नक्श, सिर पर लगीं नुकीली टोपी, मुस्कराता हुआ चेहरा, शेरवानी के बटन होल में लगा लाल गुलाब हाथों में कभी कभी घूमता छोटा सा छड़ीपुस्त पायजामा और उससे भी तुरंत उनका व्यक्तित्व हिंदुस्तान को आज भी बखूबी याद है। बच्चों में भी काफी ज्यादा लोकप्रिय नेहरू बच्चों के बीच तो बिलकुल ही बच्चे बन जाते है, वैसे ही बच्चों जैसी हरकतें, दीन-दुनिया से बेखबर बच्चों में ऐसे रम जाते थे कि बच्चों को लगता ही नहीं था कि हमारे सामने देश के ‘प्रधानमंत्री  और एक बुर्जुगवार हैं। तभी तो आज भी बच्चे उन्हें अपने प्रिय संबोधन “चाचा नेहरू” के नाम से याद करते हैं।

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