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शोधार्थियों के लिए अनमोल खजाना है बच्चों का देश का ‘रजत जयंती विशेषांक’

7 दिसम्बर, 1999

पत्रिका के पृष्ठ 45 पर पत्रिका के पुराने अंकों से रचनाकारों की रचनाएँ प्रकाशित की गई हैं। इनमें पंचग्राम से चितरंजन भारती की ‘अच्छे बच्चे’, वाराणसी से डॉ. श्री प्रसाद की ‘ये बच्चे हैं’ तथा गुड़गांव से घमंडीलाल अग्रवाल की कविता ‘है आराम हराम’ रोचक तो हैं ही, बच्चों को गुदगुदाती भी हैं। श्री अग्रवाल जी की कविता की अंतिम पंक्ति देखें- 

धोखा देना है बुरा, सदा निभाओ साथ।
कानों में हमसे कही, गीदड़ ने यह बात।।

कभी निकम्मे मत बनो, करो हमेशा काम।
सबक सिखाती लोमड़ी, है आराम हराम।।

पृष्ठ 46 पर शकुंतला कालरा की कहानी ‘नया सवेरा’ रोचक है। सरल और सहज भाषा में प्रस्तुत यह कहानी पठनीय बन पड़ी है। इसी के अगले पृष्ठ पर ‘चुनमुन जी !’ नाम से बच्चों के लिए एक सुंदर संदेश छपा है, जो बच्चों का ध्यान अपनी ओर खींचता है। देखें-

चुनमुन जी !
क्या आपकी वार्षिक
परीक्षा समाप्त हो गई हैं ?
परीक्षा की तैयारी में
कहाँ-कहाँ कमी रही,
ध्यान दिया क्या ? ऐसा
करने से उन्हें सुधार जा सकता है।

मैं समझता हूँ, बच्चों के लिए इस तरह के अच्छे संदेश देने के अलावा दूसरा माध्यम हो ही नहीं सकता। यह बच्चों के लिए अहम पन्ना है। ‘सहन करो सफल बनो’ समणी विपुल प्रज्ञा ने छोटी सी कहानी के माध्यम से सुंदर संदेश बच्चों को दिया है। पृष्ठ 49 पर भरतपुर के डॉ. दाऊदयाल गुप्ता की कविता ‘हमारी माँ’ तथा जयपुर के डॉ. कृपाशंकर शर्मा ‘अचूक’ की कविता ‘चिंता करते क्यों कल की’ मन को गुदगुदाने वाली हैं। डॉ. कृपाशंकर शर्मा ‘अचूक’ जी बच्चों के बहुत प्रिय कवि हैं। कविता की पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-

कीमत समझो हर पल की
चिंता करते क्यों कल की ?
जुड़ कर मिनट याम होते
विधि से सुबह शाम होते,
संगति करो नहीं छल की
चिंता करते क्यों कल की ?
करो कल्पना उड़ने की
नहीं बात हो मुड़ने की,
मदद करो नित निर्बल की
चिंता करते क्यों कल की ?

यह कविता रोचक तो है ही, बच्चों को संदेश भी देती है। बच्चे मजे-मजे में इसे पढ़ेंगे, ऐसा विश्वास है। ‘बच्चों का देश’ पत्रिका के पृष्ठ 50 पर जयपुर से मुरली मनोहर मंजुल का आलेख ‘सबसे कठिन मैराथन’ में सुंदर, रोचक जानकारी बच्चों के लिए लेखक ने दी है। बच्चे निश्चित ही इससे लाभान्वित होंगे। पृष्ठ 51 पर ‘बालक बना महान’ कॉलम के अंतर्गत डॉ. बालशौरि रेड्डी जी ने भारतरत्न, पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन जी पर रोचक और ज्ञानवर्धक जानकारी दी है। हमें अपने बच्चों को अपने महापुरुषों के बारे में बताते रहना चाहिए, ताकि वे भारतीय परंपरा, धर्म, संस्कृति, ग्रंथ तथा महापुरुषों के बारे में गहराई से जान सकें। रेड्डी जी का यह आलेख विद्यार्थियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

पृष्ठ 53 पर अंबाला, छावनी से डॉ. महाराज कृष्ण जैन की बुलबुल और ‘सोने का पिंजरा’ ज्ञानवर्धक कहानी है। अगले पृष्ठ पर बालक बना महान कॉलम के अंतर्गत जयपुर से राजेंद्र शंकर भट्ट ने ‘मेधावी बचपन : यशस्वी जीवन पुरुषोत्तम दास टंडन’ में टंडन जी के बारे में बढ़िया जानकारी दी है। पत्रिका के पृष्ठ 56 पर धरोहर के रूप में सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ‘उनकी याद जलियाँवाला बाग’ नाम से कविता प्रकाशित की गई है। यह कविता पढ़कर रोम-रोम फड़क उठता है, जलियाँवाला बाग का पूरा चित्र आँखों के सामने खिंच जाता है और बेकसूरों की चीखें कानों में गूँजने लगती हैं। दिल बार-बार अपनी इस पसंदीदा कवयित्री को प्रणाम करता है कि इस कविता के माध्यम से बच्चों के साथ नौजवानों में भी राष्ट्रभक्ति का भाव जागृत करने का महती कार्य किया है। यह कविता जलियाँवाला बाग में मारे गए बेकसूरों के लिए श्रद्धांजलि है। अंतिम पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं- 

तड़प-तड़प कर वृद्ध मरे हैं गोली खाकर।
शुष्क पुष्प कुछ वहाँ गिरा देना तुम जाकर॥

यह सब करना, किन्तु बहुत धीरे से आना।
यह है शोक-स्थान, यहाँ मत शोर मचाना।।

पृष्ठ 57 पर जयपुर के डॉ. मनोहर प्रभाकर की कविता ‘दो दिन मीठे ये बचपन के’ तथा हाजीपुर के राजनारायण चौधरी की कविता ‘नमन हमारा’ प्रकाशित हुई है। प्रभाकर जी के कविता की पंक्तियाँ देखें-

ये निर्मल हैं गंगा जल से,
ये उज्जवल धवल हिमाचल से।
ये पावन फूल सरीखे हैं,
प्रभु की प्रतिमा के पूजन के।
दो दिन मीठे ये बचपन के।

अगले पृष्ठ पर जीव जगत कॉलम के अंतर्गत ‘कागजी नौटिलस’ विलुप्त प्रायः जीव के बारे में अच्छी जानकारी दी गई है। पृष्ठ 59 पर डॉ. दिविक रमेश की कविता ‘आओ हम भी करें दोस्ती’ प्रकाशित की गई है। यह कविता बच्चों का मनोरंजन भी करती है और सीख भी देती है। पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-

आओ हम भी करें दोस्ती
जैसे स्टेशन और रेल की,
आओ हम भी करें दोस्ती
जैसी अपनी और खेल की।
कहानी और कविता वाली
पुस्तक भी तो कितनी प्यारी,
जी करता है पुस्तक से भी
करें दोस्ती प्यारी प्यारी।

पृष्ठ 60 पर वाराणसी के गोपालदास नागर के कहानी ‘सफलता का रहस्य’ अच्छी और प्रेरक कहानी है। अगले पृष्ठ पर गाजीपुर के प्रसिद्ध लेखक पवन कुमार वर्मा की कहानी ‘मिट्टी के खिलौने’ प्रकाशित की गई है। यह कहानी प्रेरणादायक है। सरल, सहज भाषा में प्रस्तुत की गई यह कहानी बालमन को छूती है। पृष्ठ 62 पर न्यायमूर्ति अंशुमान सिंह जी का संदेश प्रकाशित किया गया है। बच्चों के लिए प्रेरक है। देखें- “बचपन मनुष्य जीवन का वह काल है, जो लौटकर नहीं आता। बचपन में प्राप्त शिक्षा-दीक्षा, संस्कार और आचार विचारों की नींव पर ही उसके सर्वांगीण विकास की इमारत खड़ी होती है। आज भी मुझे मेरे बचपन की अनेक बातें याद आती हैं लेकिन याद करके मैं बचपन में लौट जाने का प्रयास करता हूँ। मुझे इस पत्रिका के विमोचन का अवसर मिला था और तभी मुझे लगा था कि यह पत्रिका बच्चों को संस्कारित करने की दिशा में सार्थक पहल करेगी। मुझे आशा है कि बच्चों का देश पत्रिका बच्चों में राष्ट्रीयता की भावना तथा सद्दसंस्कार देने में सहायक सिद्ध होगी। मैं पत्रिका के सफल प्रकाशन की कामना करता हूँ।”

यह संदेश बच्चों के लिए पढ़ने, आगे बढ़ने और जीवन में कुछ कर गुजरने के जज्बे को आगे बढ़ाने का कार्य करेगा। पृष्ठ 63 पर मेरे प्रिय लेखक संगरिया, राजस्थान से गोविन्द शर्मा की कहानी ‘आस्था का मन्दिर’ पठनीय है। इस कहानी की विशेष बात को रेखांकित किया गया है, जो गृहण करने योग्य है। देखें- “प्रत्येक मनुष्य उस ईश्वर की सन्तान है जिसका हम मन्दिर बनाते हैं। अतः मानव सेवा उस ईश्वर की सबसे बड़ी पूजा है। मानवता का मन्दिर सबसे बड़ा मन्दिर है।” दिल को छू लेने वाले यह विचार प्रत्येक बच्चे को जानना चाहिए।”

पृष्ठ 64 पर युवा बल साहित्यकार डॉ. उमेशचन्द्र सिरसवारी की बाल कविता ‘आज यह जाना मैंने’ प्रकाशित की गई है। यह कविता माँ को समर्पित की गई है। माँ हजारों कष्ट सहकर अपने बच्चे की परवरिश करती है, बिना यह सोचे-समझे कि वह उसके बूढ़ापे में उसका सहारा बनेगा या नहीं। पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं- 

आज यह जाना मैंने,
माँ बड़ी दयालु होती है।
खुद सह लेती कष्ट सभी,
न कभी शिकायत करती है।
आए विपत्ति लाख पूत पर,
हर बार मरहम बन जाती है।
कष्टों का अहसास न करती,
न बिलकुल भी डरती है।।

पृष्ठ 65 पर हिंदी बाल कविता के सशक्त हस्ताक्षर शाहजहाँपुर से सुनैना पाण्डेय, फैजाबाद से मोहम्मद फहीम और हरदोई से डॉ. रोहिताश्व अस्थाना जी की बाल कविताएँ क्रमशः ‘जब भी सीखो’, ‘कोयल’ तथा ‘माँ बतलाओ’ प्रकाशित हुई हैं। डॉ. अस्थाना बच्चों के प्रिय कवि हैं। उनकी बाल कविताएँ रोचक और प्रेरक होती हैं। पंक्तियाँ देखें- 

माँ बतलाओ पढ़ लिखकर,
सीमा का वीर जवान बनूँ।
या फिर धरती से सोना,
उपजाऊँ श्रमिक किसान बनूँ।।
माँ बोलो तो कवि बनकर,
मैं सारा देश जगा आऊँ।
लिए तिरंगा हाथों में,
मैं ऊँचे ही ऊँचे फहराऊँ।।

पृष्ठ 66 पर सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश से चित्रेश की कहानी ‘कला के रंग’ मन को भाती है, वहीं पृष्ठ 67 पर अंधविश्वास को लेकर एक कथा ‘जब साँप ने रास्ता काटा’ प्रकाशित हुई है। यह कथा बच्चों को किसी भी बात पर आँखें बंद कर भरोसा न करने तथा प्रचलित कथाओं पर बिना तथ्य के विश्वास न करने के प्रति जागरूक करती है। पृष्ठ 68 पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष और प्रोफेसर डॉ. विश्वनाथ शुक्ल का पत्रिका के लिए शुभकामना संदेश छपा है। इस संदेश में प्रोफेसर शुक्ल ने बच्चों की तुलना महापुरुषों से की है, अर्थात वे बच्चों में श्री राम, श्री कृष्ण, बुद्ध और महावीर के दर्शन करते हैं, यह प्रेरक है।

पृष्ठ 69 पर क्या आप जानते हैं ? कॉलम के अंतर्गत रोचक तथ्य प्रकाशित किए गए हैं, जो बच्चों का ज्ञानवर्धन करते हैं। हरियाणा की प्रख्यात लेखिका डॉ. मंजरी शुक्ला की कहानी ‘अप्रैल फूल’ पृष्ठ 70 पर प्रकाशित हुई है। यह कहानी बच्चों को बहुत गुदगुदाती है और संदेश भी देती है। इसी के पृष्ठ 71 पर भारत की तत्कालीन राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटील का शुभकामना संदेश प्रकाशित हुआ है, जो बच्चों का मनोबल बढ़ाता है।

अणुविभा समय-समय पर देश भर में जागरूकता आंदोलन चलाता रहता है, जिसके अंतर्गत भावी पीढ़ी को बालोदय से जोड़ना, उन्हें बुराइयों से दूर रहने, मादक पदार्थों के सेवन से परहेज करने जैसे आंदोलन सम्मिलित हैं। पृष्ठ 72 पर अणुविभा द्वारा अहिंसा यात्रा, बाल दिवस, बालोदय कार्यक्रम की झलकियाँ प्रस्तुत की गई हैं।

पृष्ठ 73 पर हैदराबाद से पवित्रा अग्रवाल की कहानी और ‘ठग पकड़े गए’ रोचक और मनोरंजन से परिपूर्ण कहानी है। पृष्ठ 74 पर चाँद मोहम्मद (मेड़ता सिटी) ने बच्चों के लिए ‘रास्ता बताइए’ के अंतर्गत बच्चों का ज्ञान परखा है। चाँद मोहम्मद बच्चों के लिए बहुत ही रोचक, प्रेरक पजल बनाते रहे हैं और देशभर की बाल पत्र-पत्रिकाओं में सबसे अधिक प्रकाशित होने वाले लेखक हैं। इनके यह पजल बच्चों का बौद्धिक व मानसिक विकास करते हैं।

पृष्ठ 75 पर सुजानगढ़ के महावीर शर्मा ‘विनीत’ की ‘बड़ा मारने वाला या बचाने वाला’ एक संदेशपरक कहानी है। पृष्ठ 76 पर नई दिल्ली के डॉ. वेद मित्र शुक्ल की ‘परमवीर चक्र विजेता’ कविता प्रकाशित हुई है, जो बच्चों में राष्ट्रीय भक्ति की भावना जागृत करती है। पृष्ठ 77 पर रुदौली के जगतपति अग्रवाल की रोचक और जुवान पर सहज ही चढ़ जाने वाली बाल कविता ‘अम्मा मुझे चुनाव लड़ा दो’ प्रकाशित की गई है। यह कविता खेल-खेल में बच्चों का मनोरंजन करती है। पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-

अम्मा मुझे चुनाव लड़ा दो,
मैं भी संसद में जाऊँगा।
बन कर शिक्षा मंत्री देश का,
मैं नियम नये बनवाऊँगा।
बच्चों की शिक्षा के लिए मैं,
अपनी आवाज उठाऊँगा।
खेल-खेल में चले पढ़ाई,
पद्धति ऐसी अपनाऊँगा।

इसी पृष्ठ पर मेड़ताशहर के मोहन सिंह ने बच्चों के लिए चुटकुले लिखे हैं। बच्चे चुटकुले बेहद पसंद करते हैं। बच्चों के जीवन में इनका बहुत महत्व है। पृष्ठ 78 पर सुल्तानपुर के श्याम नारायण श्रीवास्तव की कहानी ‘पहेली की कहानी’ अच्छी कहानी है। यह कहानी बच्चों को पहेली भी समझाती है और श्रवण कुमार की कथा भी बताती चलती है। पत्रिका के अगले पृष्ठ पर हिंदी के वरिष्ठ कवि एवं साहित्यकार नंद चतुर्वेदी जी का ‘बच्चों का देश’ पत्रिका के पाठकों के लिए प्रेरक संदेश प्रकाशित हुआ है। यह संदेश बच्चों के लिए बल देता है।

पृष्ठ 80 पर बीकानेर के लेखक इन्द्रजीत कौशिक की कहानी ‘क्षमादान’ प्रकाशित हुई है। यह कहानी बच्चों के लिए प्रेरणा का कार्य करती है। अगले पृष्ठ पर भोपाल से नीना सिंह सोलंकी ने प्रिय सोनू के लिए पत्र लिखा है, जिसमें विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से उसे आगे बढ़ने की सीख दी है। पृष्ठ 82 पर प्रीति प्रवीण का जानकारीपरक आलेख ‘क्या आप जानते हैं ?’ के अंतर्गत गन्ने के बारे में रोचक जानकारी दी गई है। पृष्ठ 83 पर हिंदी बाल साहित्य के सक्रिय रचनाकार अखिलेश श्रीवास्तव ‘चमन’ की कविता ‘नए साल में’, जाकिर अली ‘रजनीश’ की कविता ‘नया साल है’ तथा विनोद चन्द्र पाण्डेय ‘विनोद’ की कविता ‘नया वर्ष नया हर्ष’ प्रकाशित हुई हैं। यह तीनों ही रचनाकार बाल साहित्य की थाती हैं। अपने-अपने तरीके से इन्होंने बाल साहित्य के नए प्रतिमान गढ़े हैं। तीनों की कविताओं से आप चार-चार पंक्तियाँ देखें-

फूलों जैसे मुसकाएँगे,
नए साल में हम।
अपनी खुशबू फैलाएँगे,
नए साल में हम।
लड़ना-भिड़ना, झगड़ा करना,
उलटी-सीधी लत।
सोच लिया है छोड़ेंगे हम,
हर गन्दी आदत।
डाँट न मम्मी से खाएँगे,
नए साल में हम।

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