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शोधार्थियों के लिए अनमोल खजाना है बच्चों का देश का ‘रजत जयंती विशेषांक’

बच्चों के लिए बालसाहित्य प्राचीनकाल से ही लिखा जाता रहा है। कुछ विद्वान विष्णु शर्मा की पचतंत्र की कहानियाँ से इसकी शुरूआत मानते हैं। मेरा मानना है कि जब धीरे-धीरे लेखन का धरातल फैलता गया, तब हमारे लेखकों ने बच्चों के लिए रचनाओं की कमी महसूस की। द्वारिका प्रसाद महेश्वरी, रामनरेश त्रिपाठी, सुभद्रा कुमारी चौहान, श्रीधर पाठक, हरिवंश राय बच्चन, सोहनलाल द्विवेदी, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जैसे सरीखे साहित्यकारों ने बालसाहित्य विषयक रचनाएँ लिखकर सबका दिल जीता।

इसी क्रम में बाल दर्पण, पराग, बिगुल, वानर जैसी बाल पत्रिकाएँ प्रकाशित हुईं और प्रचुर मात्रा में बालसाहित्य लिखा जाने लगा। समय बदला, हरिकृष्ण देवसरे, जयप्रकाश भारती जैसे विद्वान आगे आए और बच्चों की लोकप्रिय पत्रिका ‘नंदन’ के माध्यम से कई प्रतिमान गढ़े। ‘बाल भारती’ वर्ष 1948 से निरंतर प्रकाशित हो रही है।यह बालसाहित्य के लिए सुनहरा समय कहा जा सकता है। तत्पश्चात बालसाहित्य की महत्ता महसूस की जाने लगी और बालहंस, बालप्रहरी, बच्चों का देश जैसी पत्रिकाएँ प्रारंभ हुईं। कई पत्रिकाएँ बाद में विभिन्न कारणों से बंद हो गईं और कई अब भी निरंतर प्रकाशित हो रही हैं।

‘बच्चों का देश’ पत्रिका अगस्त, 1999 में प्रारंभ हुई और आज 25 वर्ष की नौजवान की दहलीज पर पहुँच चुकी है। पत्रिका परिवार ने पत्रिका की रजत जयंती बहुत ही धूमधाम से मनाई। देशभर से 100 से अधिक बाल साहित्यकारों का ‘बालसाहित्य समागम’ कार्यक्रम राजसमन्द में आयोजित किया और देश भर में एक नई मिसाल कायम की। कार्यक्रम के बारे में अलग से बात करेंगे, अभी पत्रिका के रजत जयंती पर बात करते हैं।

‘बच्चों का देश’ वर्ष-26, अंक : 1-3, अगस्त-अक्टूबर, 2024 का अंक संयुक्तांक रजत जयंती विशेषांक रंगीन शानदार कलेवर के साथ प्रकाशित किया गया है। 260 पेज के इस अंक का मूल्य 100 रुपए है। इस पच्चीस वर्ष की यात्रा के दौरान जो-जो कवर पृष्ठ इसके बनाए गए, उन सबको मिक्स करके रजत जयंती विशेषांक का कवर बनाया गया है, जो मनमोहक तो है ही, आकर्षित भी करता है। ‘बच्चों का देश’ का प्रथम खंड-1, अंक-1, अगस्त, 1999 का कवर मनभावन है और चर्चा का केंद्र बना। ‘व्यक्तित्व विकास का सशक्त माध्यम’ टैग लाइन को लेकर चल रही ‘बच्चों का देश’ पत्रिका ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं।

यह पत्रिका कुछ दिन के लिए बंद भी हुई, लेकिन अणुव्रत विश्व भारती सोसायटी के माध्यम से फिर उठ खड़ी हुई और अपना रजत जयंती मना डाला। इस अंक के संपादक संचय जैन, सह संपादक प्रकाश तातेड़ तथा कार्यालय प्रभारी चन्द्रशेखर देराश्री हैं। पत्रिका से अणुव्रत विश्व भारती सोसायटी के जुड़ने के बाद सोसायटी के अध्यक्ष श्री अविनाश नाहर जी तथा महामंत्री भीखम सुराणा जी की टीम जुड़ी है। अनुक्रमणिका का नाम ‘मैं यहाँ हूँ’ एक सुंदर चित्र के साथ दिया गया है, जो बच्चों को गुदगुदाता है। रजत जयंती विशेषांक के अवसर पर आचार्य महाश्रमण जी का पवन संदेश छपा है, तथा ‘अध्यक्ष की कलम से’ में अध्यक्ष जी के विचारों को सम्मिलित किया गया है। इस 260 पेज की पत्रिका में पिछले अंकों से कहानी, कविताएँ, आलेख सम्मिलित किए गए हैं, जो बच्चों का मनोरंजन तो करते ही हैं, उन्हें अपने कर्तव्यों के प्रति सजग भी करते हैं।

अपने संपादकीय के माध्यम से संचय जैन जी के विचार सदैव प्रेरित करते हैं। इस बार के संपादकीय में एक कथा के माध्यम से गुदगुदाया है। अंक में सर्वप्रथम रजत जयंती विशेषांक अनुशास्ता को समर्पित किया गया है। अगले पृष्ठों में बाल साहित्य समागम के कुछ चित्र प्रकाशित किए गए हैं तथा 18-20 अगस्त, 2024 को राजसमन्द में आयोजित कार्यक्रम की रिपोर्ट ‘बाल साहित्य संवर्धन की दिशा में एक यादगार आयोजन’ नाम से प्रकाशित किया गया है। इस समागम में सम्मिलित साहित्यकारों की पूरी सूचना दी गई है। उद्घाटन सत्र से लेकर सभी महत्वपूर्ण सत्रों पर गंभीरतापूर्वक विवेचन इस समाचार में किया गया है। अणुविभा की बाल केंद्रित प्रवृत्तियों पर विशेष सत्र, बाल साहित्य से जुड़े मुद्दों पर गहन विमर्श के अंतर्गत विचार किया गया है। समागम में उपस्थित बाल साहित्यकारों ने चिल्ड्रन’स पीस पैलेस का अवलोकन किया, तथा इस कार्यक्रम के दौरान जिले के विभिन्न विद्यालयों में जाकर बाल साहित्यकारों ने बच्चों से संवाद किया, चर्चा की, बाल साहित्य भेंट किया, इसकी पूरी चर्चा इस पृष्ठ पर की गई है। पृष्ठ 26-28 पर बाल साहित्य समागम की झलकियाँ तथा अणुव्रत बालोदय दीर्घाओं का अवलोकन तथा स्कूली बच्चों के बीच लेखकगण के अंतर्गत चित्र प्रस्तुत किए गए हैं।

‘बच्चों का देश’ पत्रिका द्वारा श्रेष्ठ नई पीढ़ी के नव-निर्माण का संकल्प शुरू हुआ था, यह आप पृष्ठ 31 से पढ़ सकते हैं। इन पृष्ठों पर हम ‘बच्चों का देश’ की 25 वर्षों की अनवरत यात्रा के बारे में विस्तार से पढ़ते हैं। ‘बच्चों का देश’ एक पंक्ति से ही इस बात को स्पष्ट करती है। पंक्ति द्रष्टव्य है- “इंसान भविष्य के प्रति सदैव चिंतित व जागरूक रहा है। उसकी यह चिंता व जागरूकता स्वयं अपने व अपने परिवार के भविष्य के प्रति तो होती ही है, हर युग में ऐसे भी लोगों की कमी नहीं होती जो अपने समाज और यहाँ तक कि संपूर्ण मानव जाति के भविष्य को बेहतर बनाने के बारे में भी गंभीरता से सोचते हैं और प्रयास करते हैं। यही कारण है कि बाल पीढ़ी को भविष्य के लिए तैयार का करने का कार्य हर युग की प्राथमिकता में शामिल रहा है।” और यह कार्य ‘बच्चों का देश’ पत्रिका पिछले 25 वर्षों से भली-भाँति कर रही है।

‘बच्चों का देश’ पत्रिका का प्रवेशांक 15 अगस्त, 1999 को निकला था, उस अंक का लोकार्पण विद्वतजनों ने बहुत ही समारोहपूर्व किया था। यह पूरा विवरण पत्रिका के पृष्ठ 32 से प्रकाशित किया गया है। पत्रिका के पहले अंक की संपादक कल्पना जैन थीं, जिन्होंने अपने संपादन कौशल से पत्रिका को सींचा और निखारा। कल्पना जैन के संपादन कौशल को शुरू के अंकों में हम देख सकते हैं। साथ ही उन्होंने बाल साहित्य जगत की जानी मानी हस्ती डॉ. राष्ट्रबंधु जी, डॉ. बालशौरि रेड्डी जी, जयप्रकाश भारती जी, तारादत्त निर्विरोध, डॉ. दिविक रमेश जैसे विद्वानों को जोड़ा और पत्रिका को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया। इन रचनाकारों ने न केवल पत्रिका में रचनाएँ लिखीं, बल्कि अपने रचना कौशल से नई पीढ़ी को ऊर्जा दी। अपनी इस यात्रा में ‘बच्चों का देश’ पर कुछ दिन के लिए खतरे के बादल भी मंडराए, लेकिन अणुव्रत अनुशास्ता के आशीर्वाद से बिछुड़ा रास्ता फिर पकड़ लिया और अपने रजत जयंती में प्रवेश किया। यह पूरी जानकारी इन पृष्ठों पर प्रमुखता से प्रकाशित की गई है। पत्रिका को अणुव्रत अनुशास्ता का सक्षम नेतृत्व मिला, जिससे पत्रिका निरंतर निखरती गई।

‘बच्चों का देश’ पत्रिका की प्रथम वर्षगाँठ वर्ष 2000 में जयपुर में धूमधाम से मनाई गई। इस अवसर पर राजस्थान के माननीय राज्यपाल महोदय समेत विभिन्न हस्तियों का आशीर्वाद ‘बच्चों का देश’ को मिला। इस दौरान पत्रिका ने अपना स्वरूप निखारा, सतत मूल्यांकन के जरिए पत्रिका आगे बढ़ी।

रजत जयंती विशेषांक का मुख्य आकर्षण पृष्ठ 42 पर ‘विद्यार्थी अणुव्रत’ है। यह प्रत्येक विद्यार्थी को अपने जीवन में उतारना चाहिए। पाठकों का ध्यान खींचने के लिए यह संकल्प यहाँ दिया जा रहा है- 

विद्यार्थी अणुव्रत

  • मैं परीक्षा में अवैध उपायों का सहारा नहीं लूंगा।
  • मैं हिंसात्मक एवं तोड़फोड़-मूलक प्रवृत्तियों में भाग नहीं लूंगा।
  • मैं अश्लील शब्दों का प्रयोग नहीं करूंगा, अश्लील साहित्य नहीं पढूंगा तथा अश्लील चलचित्र नहीं देखूंगा।
  • मैं मादक तथा नशीले पदार्थों का सेवन नहीं करूंगा।
  • मैं चुनाव के सम्बन्ध में अनैतिक आचरण नहीं करूंगा।
  • मैं दहेज से अनुबंधित एवं प्रदर्शन से युक्त विवाह नहीं करूंगा और न भाग लूंगा।
  • मैं बड़े वृक्ष नहीं काटूंगा और प्रदूषण नहीं फैलाऊंगा।”

दिल को छू लेने वाले यह विचार आज के दौर में प्रासंगिक हैं। पत्रिका के पृष्ठ 43 पर डॉ. राष्ट्रबंधु जी के द्वारा हिंदी के अब्दुर्रहीम खानखाना पर बच्चों के लिए रोचक जानकारी दी गई है। इसके अगले पृष्ठ पर भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी का प्रेरक संदेश भी प्रकाशित किया गया है, जो प्रेरणादायक है। देखें- “मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि बच्चों में राष्ट्रीय एकता एवं देश-प्रेम की भावना जगाने तथा उनमें अच्छे संस्कार भरने के लिए ‘बच्चों का देश’ नामक एक मनोवैज्ञानिक बाल पत्रिका निकाली जा रही है। मैं इस पत्रिका के नन्हें-मुन्ने पाठकों को स्नेह और आशीर्वाद देता हूँ और कामना करता हूँ कि वे बड़े होकर सभ्य और अच्छे नागरिक बनें तथा अपने देश का नाम रोशन करें।”

अटल बिहारी वाजपेयी

प्रधानमंत्री, भारत

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