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भारत की प्रथम महिला राज्यपाल सरोजिनी नायडू

भारत भूमि कर्म की पुण्य धरा है। यह साहित्य, शिक्षा, संस्कृति, संगीत, कला, ज्ञान-विज्ञान की जननी है और पोषक भी। यहां जीवन के विविध क्षेत्रों में जहां पुरुषों ने विश्व-गगन में अपनी सामर्थ्य की गौरव पताका फहराई है तो महिलाओं ने भी सफलता के शिखर पर अपने पदचिह्न अंकित किए हैं। सरोजिनी नायडू भारतीय राजनीति और काव्य कानन की एक ऐसी ही महाविभूति हैं जिनके कृतित्व और व्यक्तित्व की सुवास से विश्व महमहा रहा है। जिनकी आभा से जग चमत्कृत है। लोक ने ‘दि नाईटिंगेल ऑफ इंडिया’ कह उनकी प्रशस्ति की। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष होने का गौरव हासिल किया तो भारत के किसी राज्य की सर्वप्रथम राज्यपाल बनने का कीर्तिमान भी रचा। कविताओं में प्रेम और मृत्यु के गीत गाये तो प्रकृति के कोमल उदात्त मनोहारी चित्रों में लेखनी से इंद्रधनुषी रंग भरे। किसान-कामगारों के श्रम के प्रति निष्ठा व्यक्त की तो देश राग को क्रान्ति स्वर भी दिया। उनका जीवन प्रेरक है और अनुकरणीय भी। 

भारत कोकिला सरोजिनी नायडू का जन्म 13 फरवरी, 1879 को हैदराबाद में एक शिक्षित बंगाली परिवार में हुआ था। पिता अघोरनाथ चट्टोपाध्याय एक विज्ञानी और शिक्षाशास्त्री थे जिन्होंने हैदराबाद में निजाम कॉलेज की स्थापना की थी। माता श्रीमती वरद सुंदरी गृहिणी थी और बांग्ला भाषा में कविताएं लिखती थीं। परिवार के शैक्षिक एवं साहित्यिक परिवेश का प्रभाव सरोजिनी के बालमन पर पड़ना ही था। तभी तो सरोजिनी बाल्यकाल से ही प्रकृति के सौन्दर्य को देखतीं और कल्पना-सागर में डूब जातीं। 13 वर्ष की छोटी अवस्था में ‘लेडी ऑफ दि लेक’ नामक एक लंबी कविता लिखी जिसे पढ़कर निजाम हैदराबाद बहुत प्रभावित हुए और सरोजिनी को उच्च शिक्षा प्राप्ति के लिए इंग्लैंड जाने का परामर्श और छात्रवृत्ति के रूप में आर्थिक सहयोग प्रदान किया। लंदन के किंग्स कॉलेज और बाद में कैम्ब्रिज के गिर्टन कालेज में अध्ययन किया।

कविता रचने का संस्कार वहां भी बना रहा फलतः पढ़ाई के साथ-साथ वह न केवल कविताएं रचती रहीं बल्कि अंग्रेजी के बड़े कवियों के संपर्क में भी बनी रहीं। इस काव्य सत्संग का प्रभाव यह पड़ा कि सरोजिनी की कविताओं में अब भारतीय दृष्टिकोण प्रतिबिम्बित होने लगा। 1905 में प्रकाशित आपके पहले कविता संग्रह ‘गोल्डेन फ्रेशहोल्ड’ ने कविता प्रेमियोें का ध्यान अपनी ओर खींचा। ‘बर्ड ऑफ टाइम’ (1912) और ‘ब्रोकन विंग’ (1917) कविता संकलनों के प्रकाशन से साहित्य क्षेत्र में सरोजिनी की काव्यात्मक सौन्दर्य, बिम्ब विधान, आलंकारिक शब्द चातुर्य, प्रकृति का सूक्ष्म अवलोकन और राष्ट्रीय चेतना को पुष्टि और स्वीकृति मिली। इसी बीच 1898 में चिकित्सक डॉ.गोविंद राजुल नायडू से अन्तरजातीय विवाह किया। तत्कालीन सामाजिक संदर्भों और रूढ़ियों के बीच सरोजिनी का यह साहसिक कदम एक बड़े बदलाव के रूप में देखा गया। 

देश का वह दौर स्वतंत्रता आंदोलन और अंग्रेजों के विरुद्ध सतत संघर्ष का दौर था। और शायद ही कोई युवा रहा हो जो उन परिस्थितियों में देश के लिए कुछ कर गुजरने के भाव से न भरा रहा हो। सरोजिनी का मन भी 1905 के बंग भंग की घटना से आहत हुआ और हृदय में देश सेवा की उत्कट इच्छा जगी। संयोग से 1914 में इंग्लैंड में महात्मा गांधी जी से भेंट हुई। वह गांधी जी केे जीवना आदर्शोंं एवं विचारों से अत्यधिक प्रभावित हुई और उनके सुझाव पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में काम करना प्रारंभ कर दिया। वह देश की आम जनता से सीधा संवाद करना चाहती थीं ताकि लोगों की कठिनाईयों, पीड़ा और इच्छाओं को समझ सकें साथ ही स्वाधीनता आंदोलन में शामिल होने हेतु सभी को प्रेरित कर सकें।

इस उद्देश्य से उन्होंने 1915 से 1918 तक संपूर्ण देश का भ्रमण किया। इस दौरान किसानों, मजदूरों, महिलाओं और विद्यार्थियों से बात की। वह अंग्रेजी, हिंदी, बांग्ला, उर्दू और तेलुगू भाषा की अच्छी जानकार थीं। देश भ्रमण की अवधि में वह लोगों से बातचीत करने में अपनी इस भाषाई सामर्थ्य का उपयोग करके सहजता से आत्मीय सम्बंध स्थापित कर लेती थीं। उनकी लोकप्रियता न केवल कांग्रेस पार्टी के अन्दर बल्कि पूरे देश में लगातार बढ़ती ही जा रही थी। जनता उनको सुनना-देखना चाहती थी। इसी का परिणाम था कि सरोजिनी नायडू को 1925 में कानपुर में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष के रूप में चुना गया। कांग्रेस के इतिहास में वह पहली महिला अध्यक्ष थीं। 1932 में वह भारत की प्रतिनिधि के रूप में अफ्रीका गईं और वहां की जनता और सरकार के साथ वार्ता की। 1930 में नमक सत्याग्रह में गांधी जी के साथ रहीं और गांधी जी की गिरफ्तारी के बाद नमक सत्याग्रह का नेतृत्व करतीं रहीं।

1931 में दूसरे गोलमेज सम्मेलन में उनको भारतीय प्रतिनिधि मंडल में शामिल गया। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय सहभागिता की और गांधी जी के साथ 21 महीने तक कारावास भोगा। संयोग से सरोजिनी की पुत्री पद्मजा नायडू भी उसी समय जेल में बंद थी जो आजादी के बाद पश्चिमी बंगाल की राज्यपाल बनीं। मार्च 1947 में एशियाई संबंध सम्मेलन के संचालन समिति की अध्यक्षता की। स्वतंत्रता के लिए उनके अदम्य संघर्ष और आमजन के प्रति आत्मीयता भाव से वह आमजन के हृदय में बस गई थीं। सरोजिनी नायडू की प्रशासनिक क्षमता और लोक चेतना के कारण ही आजादी मिलने के बाद उनको उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य का राज्यपाल बनाया गया। वह भारत के किसी प्रदेश की राज्यपाल बनने वाली पहली महिला हैं।  

राजनीति की सक्रियता के बीच भी उनका काव्य-उर्वर मन कविताएं रचता रहा। उनकेे राष्ट्रीय चिंतन, भारत के प्रति अतिशय प्रेम-भाव, महिलाओं को स्वावलम्बी और राजनीतिक रूप से सचेतन बनाने की उत्कट चाह और प्रकृति के प्रति तादात्म्य सम्बंध उनकी कविताओं में मुखर होते देखा जा सकता है। उनकी कविताओं का भारतीय भाषाओं के साथ ही फ्रेंच और जर्मन में भी अनुवाद हुआ है। उनकी महत्वपूर्ण कृतियों में ‘दी मैजिक ट्री’, ‘ए ट्रेजरी आफ पोयम्स’, ‘द गिफ्ट ऑफ इंडिया’ प्रमुख रूप से उल्लिखित की जा सकती हैं। उनकी मृत्यु के बाद उनकी कविताओं का एक संग्रह ‘‘द वेदर ऑफ द डॉन’’ 1961 में प्रकाशित किया गया। इंडियन वीवर्स, इंडिया लव सांग्स, इंडियन फॉरेस्ट जैसी काव्य रचनाएं कविता के नवल मानक स्थापित करती हैं। इतना ही नहीं, उनकी कविताओं में देशभक्ति, प्रकृति के विभिन्न मनोहारी रूप, महिला, प्यार और मृत्यु जैसे विषय बार-बार उभर कर आते हैं। वह मानवता का राग गाते हुए वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को बल प्रदान करते हुए कहती हैं –

लिए बांसुरी हाथों में, हम घूमें गाते-गाते। 
मनुष्य सभी हैं बंधु हमारे, सारा जग अपना है।।

तो वहीं अपने लक्ष्यों को प्राप्त किए बिना वह मृत्यु को भी स्वीकार नहीं करेंगी। वह कहती हैं, 

मेरे जीवन की सुधा नहीं मिटेगी जब तक। 
मत आना हे मृत्यु कभी तुम मुझ तक।।

वह देशवासियों से मेहनत करने का आह्वान करती हैं,

श्रम करते हैं हम 
कि हम समुद्र होे तुम्हारी जागृति का क्षण।
हो चुका जागरण,
अब देखो, निकला दिन कितना उज्ज्वल।।

राजनीति एवं काव्य की इस अप्रतिम प्रतिभा ने 2 मार्च, 1949 को नश्वर देह को त्याग अनन्त यात्रा पर प्रस्थान किया। भारत सरकार ने 13 फरवरी, 1964 को उनकी इस स्मृति को नमन करते हुए 15 नए पैसे का एक डाक टिकट जारी किया था। आज सरोजिनी नायडू भले ही हमारे बीच नहीं हैं पर उनके कर्म और विचार देशवासियों को कर्म पथ पर बढ़ने को सदा प्रेरित करते रहेंगे। एक दीप स्तम्भ की भांति अपने आलोक से राष्ट्र-साधकों का मार्गदर्शन करतीं रहेंगी।

प्रमोद दीक्षित मलय शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)
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