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गौरैया रे! तेरे बिन सूना है घर का आंगन

 मुझे नहीं मालूम कि मुझे गौरैया सहित तोते, मैना, कबूतर, बाज, गिद्ध, बतख, टिटिहरी आदि पक्षी और पीपल, बरगद, नीम, अशोक, कदम्ब, कैथा, जामुन, आम के वृक्ष क्यों पसंद हैं। लेकिन जब भी मैं इनके साथ, इनके बीच होता हूं तो लगता है कि मैं आनंद की दुनिया में हूं। तमाम सुख-दुख से मुक्त परम आनन्द की अनुभूति करता हूं। इसीलिए जब 2012 में अतर्रा नामक कस्बे में अपना मकान बनवाया तो अगले हिस्से में पेड़-पौधों के लिए यथासम्भव जगह छोड़ी और अगली बरसात में ही आम, अमरूद, सीताफल, आंवला, शमी, मीठी नीम और कुछ लताओं तथा बोगनवेलिया के पौधे रोप दिए थे जो आज बड़े हो गये हैं। हालांकि आंवला और शमी नहीं बच पाए। आम, अमरूद और सीताफल अपने फलन के मौसम में फूल और फलों से लद जाते हैं। गौरैया, गिलहरी, तोते, कोयल सहित तरह-तरह के पक्षियों ने इन पेड़ों को अपना अड्डा बना लिया है।

चिड़ियों ने घोंसले बना लिए, हर वर्ष एक बहुत छोटी काले रंग की चमकीली चिड़िया भी आकर घोंसला बनाती और अंडों से बच्चे निकलने के बाद उड़ जाती है। बसंता, कठफोड़वा, धनेश और सतभैया जैसे पक्षी भी डेरा जमाते हैं। पेड़ों की डालियों पर गिलहरियों की दिनभर धमा-चौकड़ी, चिड़ियों का कलरव, कोयल की कूक अमिय आनंद रस की वर्षा करती है। पेड़ पर लगे फल चिड़ियों के लिए और जमीन पर गिरे फल हमारे लिए होते हैं। आज 20 मार्च विश्व गौरैया दिवस है। इस वर्ष की थीम है- प्रकृति के नन्हे दूतों को श्रंद्धाजलि। तो मेरा अंतर्मन प्रकृति और मानव के पारस्परिक सम्बंधों की सुखद स्मृतियों की अनुभूति से रोमांचित हुआ जा रहा है।

प्रकृति एवं मानव जीवन परस्पर अन्योन्याश्रित है। मानवीय अस्तित्व के लिए यह परमावश्यक है कि प्रकृति में जीवन की जो प्राचीन जैव श्रंखला एवं विविधता विद्यमान है उसे न केवल बचाए रखा जाए बल्कि उसको संरक्षित कर समृद्ध भी किया जाए। लेकिन मानव प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की भावना से रहने-जीने की बजाय अपने बुद्धि-बल से प्रकृति से अधिकाधिक लूट-छीन लेने के भाव से लगातार घाव करता जा रहा है। संकट केवल गौरैया के जीवन पर नहीं है, वास्तव में यह संकट प्रकारांतर से मानव सभ्यता पर ही है। क्योंकि गौरैया उस जैव श्रंखला में एक कड़ी है जिसके हम भी एक घटक हैं। यदि एक कड़ी कमजोर होती या टूटती है तो पूरी श्रंखला का अस्तित्व संकटग्रस्त हो जाता है। इसी संकट से मुक्ति की युक्ति का नाम है विश्व गौरैया दिवस। बिहार और दिल्ली प्रदेश का राज्य पक्षी गौरैया आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। 

मैं गांव-देहात से जुड़ा व्यक्ति हूं। मैंने ग्रामीण और शहरी दोनों जीवन को बहुत करीब से भोगा, देखा और देख रहा हूं। इस आधार पर मैं कह सकता हूं कि यह संकट केवल शहरों तक ही सीमित नहीं है बल्कि सुदूर गांव, मजरों और प्राकृतिक अंचलों तक पहुंच गया है। मैं जब भी गांव जाता हूं तो पिछले 20-30 सालों के दृश्य अनायास मानस पटल पर अंकित होने लगते हैं। जब मैं बचपन में बुंदेलखण्ड के अपने गांव ‘बल्लान’ में हम उम्र साथियों के साथ खेत-खलिहान, बगीचों और तालाबों में आनंदमय जीवन जी रहा था तो यह गौरैया भी हमारी संगी-साथिन थी।

जब पूरा गांव सो रहा होता, तब भोर में ही गौरैया का झुंड चीं-चीं, चीं-चीं करता पूरे गांव में चक्कर लगा रहा होता जैसे कि आज किसी राजनीतिक सभा में आने वाले नेता का हेलीकॉप्टर पूरे क्षेत्र का चक्कर लगा देता है। चिड़ियों की चहचहाहट हमारे गांव की जैसे सामूहिक अलार्म घड़ी थी। तब मैं चारपाई पर लेटे या कभी-कभी बाबा की गोद में बैठ कर सीताराम का भजन करते देखता कि अम्मा दरवाजा बुहार गाय के गोबर से ओरिया डाल (घर के मुख्य द्वार पर गाय के गोबर से लीपना) मुट्ठी भर चावल के दाने रख देतीं। तुरन्त कुछ चिड़ियां खपरैल से उतर आतीं और दाना चुगने लगतीं। धुलने के लिए शाम के जूठे बर्तन निकाल आंगन के एक ओर बने नरदा (नाली, जूठे बर्तन धोने की जगह) के पास रख खजूर की पत्तियों से बने कूंचा (झाड़ू) से बखरी (आंगन) बटोरने लगतीं। मैं देखता कि चिड़ियों का एक समूह बर्तनों की सफाई में जुट जाता जैसे अम्मा के कामों में हाथ बंटा रही हों।

जब तक अम्मा बर्तन धोने के लिए आतीं तब तक चिड़ियों की यह पलटन बर्तनों में चिपके भात, दाल, सब्जी और आटा को साफ कर चुकी होती। तब दादी कुठली (अनाज रखने हेतु मिट्टी की बनी परम्परागत बखारी) से बांस की टोकरी में तीन-चार मुट्ठी चावल या धान लेकर आंगन के आधे हिस्से में बिखेर देतीं। तब चिड़ियों का बहुत बड़ा झुंड, जोकि बहुत देर से खपरैल और आंगन के जामुन के पेड़ में बैठा प्रतीक्षारत होता, एक साथ झप्प से दानों पर टूट पड़ता। पूरा आंगन मनोहारी संगीत के प्रभाती राग से सराबोर हो जाता। ऐसे ही किसी आंगन में घुटनों के बल रेंगने वाला शिशु उन्हीं चिड़ियों के बीच किलकारी मार दौड़ता रहता। तभी कहीं कोई चिड़िया शिशु के कंधे पर पल भर के लिए बैठ मानो गाल चूम आशीष दे दादी का आभार व्यक्त कर फिर आने का वादा कर उड़ जाती। तब गांव में बड़े-बड़े आंगन होते और आंगन में होते थे अमरूद, अनार, जामुन, नीम, कैथा के पेड और किसी-किसी आंगन में तो आम और महुआ भी।

तब इन पेड़ों पर गौरैया के घोसले लहराते रहते, खासकर कैथा के पेड़ में। खपरैल के नीचे वाले हिस्से में किसी पटिया-बल्ली और बांस के बीच बनी छोटी सी जगह में गौरैया अपने हुनर का कमाल दिखा अपना आशियाना बना लेती जो सालों-साल बना रहता। पहली बारिश बाद खपरैल फिर से छवाया जाता था ताकि बरसात में पानी न चूए। मजाल कि कोई छवैया मजदूर घोसलों को हटा सके। शायद यह गौरैया या समस्त प्राणियों के प्रति विश्वास एवं अपनेपन का एक सहज रिश्ता था। अपने घर में ऐसे दर्जनों घोंसले बिल्कुल हमारी पहुंच में होते। लेकिन मुझे अच्छी तरह याद है कि कभी किसी घोंसले का नुकसान या छेड़छाड़ किसी बच्चे द्वारा नहीं की गई, बड़ों द्वारा करने का तो सवाल ही नहीं था। यह एक प्रकार से गौरैया की मनुष्य के साथ पारिवारिक सदस्य होने की स्वीकृति थी।

जब मैं खेतों में अपने भैंस, गाय और बैलों को चरते हुए देखता तो उनकी पीठ पर गौरैया शान से सवारी करती रहती। मुफ्त सवारी के बदले में गौरैया यात्रा करते हुए जानवरों के नाक, कान, पूंछ और पूरी देह से बहुत महीन कीड़े खोज-खोज कर चट कर चमड़ी की सफाई कर देतीं। मैंने इस सफाई अभियान में अक्सर मैना को भी शामिल हो अपना योगदान देते देखा है। गाय जब आराम कर रही होती तब चिड़िया उसके कान का मैल साफ करते हुए जैसे कह रही होतीं तुम चिंता न करना सखी, सफाई के लिए हम हैं न, प्रायः कौए भी इस नेक कार्य में भागीदार बनते। और जब गाय स्वीकृति में कान हिलाती तो सारी चिड़ियां खिलखिलाकर फुर्र हो जातीं। अगर थोड़ी सी बात मैं गौरैया से हटकर अन्य पक्षियों की भी कर लूं तो कोई हर्जा न होगा। उस समय तोते, कठफोड़वा, बाज, मैना भी खूब आवाजाही करते थे।

मृत पशु की दावत उड़ाते सैकड़ों गिद्धों का झुंड देखकर बचपन में डरता भी था। पर अब ये दृश्य किसी फिल्म के फ्लैश बैक की तरह आकर रिश्तों की डोर के छूटे सिरे को अतीत से जोड़ ओझल हो जाते हैं, प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देते। संकट के कारणों से आप परिचित हैं, फिर भी स्मरण के लिए पुनः कुछ बिन्दुओं को रखना उचित प्रतीत होता है। इन कारणों में फसलों से अत्यधिक उत्पादन के लिए कीटनाशकों एवं उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग से चिड़ियों के लिए सहज उपलब्ध भोजन का विषाक्त हो जाना, कृषि के विस्तार के लिए खेती योग्य भूमि निकालने के लिए जंगलों, बगीचों को उजाड़ना एवं मकान बनाने के लिए गांवों के अंदर के पेड़ों का काटा जाना, खपरैल वाले कच्चे घरों की जगह पक्के मकानो का निर्माण, मोबाइल टावरों के बिछे जाल आदि ने गौरैया के प्राकृतिक पर्यावास, बसावट एवं भोजन-पोषण को खत्म किया, घोंसले बनाने के लिए उपयुक्त जगह न मिलने से असुरक्षित अंडों को सर्प, बाज, नेवला, सियार, लोमड़ी आदि द्वारा भक्षण कर जाना, रेडिएशन एवं तरंगों से प्रजनन एवं निषेचन प्रक्रिया के प्रभावित होने से गौरैया के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा हो गया है। इसीलिए ब्रिटेन स्थित ‘रॉयल सोसायटी ऑफ प्रोटेक्शन ऑफ बर्ड्स’ ने गौरैया को संकटग्रस्त घोषित कर ‘रेड लिस्ट’ में डाल बचाने के गंभीर प्रयास शुरू किए हैं।

अब जबकि मैं लेख के अंत की ओर बढ़ रहा हूं तो समाधान के तौर पर कुछ बाते रखना आवश्यक है। अमुक उपाय करना चाहिए के उपदेशात्मक प्रवचनों की बजाय अनुरोध स्वरूप अनुभूत बाते साझा करना समीचीन एवं न्यायोचित होगा। अतः मकान, पार्क, स्कूल, ऑफिस, जहां कहीं भी खाली जगह उपलब्ध हो कुछ पौधे जरूर लगाएं। यह कोशिश रहे कि केवल छायादार, शोभाकारी ही नहीं बल्कि फलदार पौधे भी लगायें। सम्भव हो तो अपने घरों में लकड़ी के घोसले लगायें। घरों में कोई एक स्थान निश्चित कर साल भर सुबह एक मुट्ठी चावल के दाने और ताजे पानी का प्रबन्ध कर गौरैया का स्वागत करें। सुख एवं खुशी मिलेगी, मुझे तो मिली है। मित्रो! अभी संभलने का समय है यदि हम चेत-संभल सके तो आगामी पीढ़ी के हाथों में गौरैया का सुखमय खिलखिलाता संसार सौंप सकेंगे। अन्यथा बहुत देर हो चुकी होगी और बच्चे पुस्तकों में गौरैया को विलुप्त पक्षियों के पाठ में पढ़ रहे होंगे।

प्रमोद दीक्षित मलय शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)
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