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गणेश शंकर विद्यार्थी: पत्रकारिता का गौरवमय किरीट

अंग्रेजी शासन से मुक्ति और स्वराज्य प्राप्ति के लिए 1857 से आरम्भ हुआ स्वाधीनता संघर्ष 1947 में पूर्ण हुआ। इस यात्रा में देश के विविध क्षेत्रों से हजारों नर-नारियों ने योगदान दिया है। अपना सर्वस्व समर्पण करके मां भारती के गौरव एवं गरिमा में वृद्धि की है। भारतीय राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में समाज जागरण करते हुए राष्ट्रीय एकात्मकता का भाव भरने के क्रम में पत्र-पत्रिकाओं की भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।‌ इस श्रंखला में कानपुर से प्रकाशित साप्ताहिक राष्ट्रीय समाचार पत्र ‘प्रताप’ का नाम सर्वप्रथम अंकित है जो अपने तेज-ओज, गाम्भीर्य और राष्ट्रवादी तेवर के कारण भारतीय जन मानस का कंठहार पत्र बन सतत नवल उत्साह का संचार कर ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध प्राण फूंकता रहा तो वहीं अंग्रेजों की आंखों में किरकिरी बन उनके हृदय को कचोटता भी रहा।

‘प्रताप’ के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी अपनी अग्निधर्मा लेखनी और उग्र राष्ट्रवादी लेखों के कारण अंग्रेजी सत्ता के कोप भाजन भी बने पर वह अपने साधना पथ से किंचित भी न डिगे, न रुके बल्कि कहीं अधिक प्रज्ज्वल प्रखर निर्भय होकर किसानों, मजदूरों और आमजन की कठिनाईयों को स्वर देते रहे, अंग्रेजी दमनकारी नीति का विरोध करते रहे। वह हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक थे। वे समान भाव से दोनों पक्षों की एकजुटता के लिए धरातल तैयार करते रहे। किंतु समय का कैसा विरोधाभास है कि पांथिक एकता, सामाजिक सद्भाव एवं सौहार्द, मानवीय मूल्यों के लिए पल-पल जीने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी 25 मार्च, 1931 को कानपुर के सम्प्रदायिक दंगे की भेंट चढ़ गये।   भारत माता के इस वीर सपूत का शव अस्पताल में चार दिन शवों के ढेर में पड़ा रहा और फूल गया। दैवयोग से, 29 मार्च को किसी ने विद्यार्थी जी के शव की शिनाख्त की तो तब अंतिम संस्कार सम्पन्न हुआ, तब पूरा देश शोक-सिंधु में डूबे गया।गणेश शंकर विद्यार्थी पत्रकारिता के गौरवमय किरीट हैं।

गणेश शंकर विद्यार्थी का जन्म  26 अक्टूबर, 1890 को अपने ननिहाल इलाहाबाद के अतरसुइया मोहल्ले में कायस्थ परिवार में हुआ था। पिता मुंशी जयनारायण श्रीवास्तव तत्कालीन मध्यभारत के मुंगावली में एक विद्यालय में शिक्षक थे और माता गोमती देवी  एक सामान्य गृहिणी। नाना सूरज प्रसाद श्रीवास्तव सहायक जेलर थे, इस कारण घर-परिवार में नियम-अनुशासन का सख्त वातावरण था, जिसका प्रभाव विद्यार्थी जी पर पड़ा। उनकी प्राथमिक शिक्षा मुंगावली और विदिशा में पिता की देखरेख में पूरी हुई। परिवार में आर्थिक कठिनाई के कारण संस्थागत पढ़ाई का क्रम खंडित हुआ और आपने हाईस्कूल की परीक्षा व्यक्तिगत परीक्षार्थी के रूप में उत्तीर्ण कर करेंसी ऑफिस, कानपुर में लिपिक पद पर काम कर परिवार के आर्थिक सुदृढीकरण के अवलम्ब-आधार बने।

फारसी और उर्दू के साथ अंग्रेजी पर भी समान अधिकार था, तभी  तो विक्टर ह्येगो के उपन्यास ‘नाइनटी थ्री’ का हिंदी अनुवाद करने में सफल हुए। अंग्रेजी सत्ता के विरोद्ध अपने स्वभाव के कारण करेंसी ऑफिस में अधिक समय तक कार्य न कर सके और नौकरी छोड़नी‌ पड़ी। पढ़ने-लिखने लिखने में रुचि थी ही। छात्र जीवन से ही तत्कालीन प्रमुख पत्रिकाओं ‘कर्मयोगी’ एवं ‘स्वराज्य’ से जुड़े रहे। इन पत्रों में आपकी रचनाएं भी छपीं तो प्रोत्साहन मिला। 16 वर्ष की अवस्था में ‘हमारी आत्मोत्सर्गता’ नामक पुस्तक लिखी। हीरे की चमक बिखर रही थी। आपके लेख पढ़कर पं. महावीर द्वावेदी बहुत प्रभावित हुए और ‘सरस्वती’ पत्रिका में उप संपादक पद पर काम करने का प्रस्ताव रखा। विद्यार्थी जी ‘सरस्वती’ में काम करने लगे। पं. महावीर द्विवेदी का सान्निध्य मिला तो कंचन कुंदन बन निखर गया।

किंतु विद्यार्थी जी का मन साहित्यिक पत्रिका में नहीं रमा क्योंकि उनमें राजनीति, राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन और सार्वजनिक जीवन के मुद्दों पर लिखने और अपने विचार समाज तक ले जाने की इच्छा-आकांक्षा बलवती हो रही थी। फलत: आप महामना मदनमोहन मालवीय के पत्र ‘अभ्युदय’ से जुड़ इलाहाबाद आ गये। पर मन में कसक बाकी थी, लगता था कि कुछ विशेष करना है जिसके लिए अपना प्रेस स्थापित कर एक पत्र निकालना होगा। यह स्वप्न विद्यार्थी जी को 1913 में कानपुर ले आया। समान विचार के साथी माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, कृष्णदत्त पालीवाल, देवव्रत शास्त्री, सुरेशचंद्र भट्टाचार्य एवं युगल किशोर सिंह का सहयोग सम्बल मिला और अक्टूबर 1913 में साप्ताहिक पत्र ‘प्रताप’ के विचार स्वप्न को साकार करने की रूपरेखा तैयार हुई और 9 नवम्बर, 1913 को ‘प्रताप’ का प्रवेशांक लोक सम्मुख प्रकाशित हुआ।

‘प्रताप’ की नीति के बारे में पहले अंक में ही विद्यार्थी जी ने अग्रलेख में लिखा,  “समस्त मानवजाति का कल्याण हमारा परमोद्देश्य है। हम अपने देश और समाज की सेवा के पवित्र काम का भार अपने ऊपर लेते हैं। किसी की प्रशंसा या अप्रशंसा, किसी की प्रसन्नता या अप्रसन्नता, किसी की घुड़की या धमकी हमें अपने कर्तव्य मार्ग से न विचलित कर सकेगी। सत्य और न्याय हमारे भीतरी पथ-प्रदर्शक होंगे। सम्प्रदायिक और व्यक्तिगत झगड़ों से ‘प्रताप’ स्वयं को सदा अलग रखने की कोशिश करेगा।”  कहना सर्वथा उचित होगा कि ‘प्रताप’ अपने इस उद्देश्य पथ पर ही अनवरत गतिशील रहा, कभी पथ से विचलित नहीं हुआ। हालांकि ‘प्रताप’ अंग्रेजी सत्ता की क्रोधाग्नि का शिकार हुआ। विद्यार्थी जी को तीन बार पत्रकारिता के कारण और दो बार राजनीतिक भाषण के कारण जेल जाना पड़ा। ‘प्रताप’ पर अर्थदण्ड भी लगा, प्रकाशन स्थगित हुआ पर ‘प्रताप’ पुनि-पुनि नवल प्रताप ग्रहण कर प्रकाशित होता रहा।

गणेश शंकर विद्यार्थी लेखनी के धनी तो थे ही, साथ ही वे क्रांति एवं अहिंसा के समन्वय सेतु भी थे।‌ वह लोकमान्य बालगंगाधर तिलक के राष्टीय विचार की नौका पर सवार थे तो महात्मा गांधी की अहिंसा की पतवार भी थामे थे। स्वतंत्रता आंदोलन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रखर प्रचंड स्तम्भ थे तो क्रांतिकारियों के सम्बल मार्गदर्शक भी। कौन नहीं जानता कि भगत सिंह ने कानपुर में ‘प्रताप’ में आश्रय ले विद्यार्थी जी का सान्निध्य प्राप्त किया था। चंद्रशेखर आजाद से भी भेंट-मुलाकात कर विद्यार्थी जी ने क्रांति पथ का ताव और आब देखा था। उनकी पहल पर ही श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ विरचित गीत ‘झंडा ऊंचा रहे हमारा, विजयी विश्व तिरंगा प्यारा’ का सामूहिक गायन जलियांवाला बाग बलिदान दिवस के अवसर पर 13 अप्रैल, 1924  को कानपुर में हुआ था। 

भारत सरकार ने विद्यार्थी जी की स्मृति में डाक टिकट जारी किया।‌ कानपुर और गोरखपुर में चौराहों के नाम और कानपुर हवाई अड्डा के नाम उन पर रखा गया। गणेश शंकर विद्यार्थी वास्तव में अपने आदर्शों एवं संकल्पों की सिद्धि के लिए जीते रहे और इस असार संसार से जाते-जाते भी मानवता का अमर संदेश दुनिया को दे गये। विद्यार्थी जी की जीवन गाथा हम सभी के लिए न केवल प्रेरक है अपितु जीने के उद्देश्य का मार्गदर्शन भी करती है। उनके विचार के दीपक कोटि-कोटि हृदयों में जलते रहेंगे। 

प्रमोद दीक्षित मलय शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)
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