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रंगमंच को संवारने के संकल्प का दिन

नाटक दर्शकों को प्रेम, रहस्य, रोमांच, हर्ष, खुशी, आत्मीयता और सौंदर्य की उस ऊंचाई पर ले जाता है जहां वे कल्पना लोक में विचरण कर रहे होते हैं जो खुरदुरे पठारी यथार्थ से परे एक अलग दुनिया होती है। नाटक के मंचन से उद्भूत रस प्रेक्षागृह में उपस्थित दर्शकों को आत्मानंद की प्राप्ति कराने में समर्थ होता है, इसीलिए नाट्य रस को परमानंद सहोदर कहा गया है। नाटक संस्कृत वांग्मय के शीर्ष आर्ष ग्रंथ वेदों की पंक्ति में पंचम वेद की संज्ञा से विभूषित हो लोक में समादृत हुआ है। ब्रह्मा जी ने ऋग्वेद से पाठ्य, सामवेद से गायन कला, यजुर्वेद से अभिनय और अथर्ववेद से रस लेकर नाट्यवेद की रचना की है। संस्कृत साहित्य में नाट्य लेखन एवं मंचन की समृद्ध परम्परा रही है जो इस्लाम के आगमन तक फलती-फूलती रही। पर इस्लामी आक्रमणों एवं राज्याश्रय न मिलने के कारण नाट्य-संस्कृति की यह पुण्यबेल निर्जीव-रसहीन हो मृतप्राय हो गयी। हालांकि 18वीं सदी से ब्रज, अवधी, छत्तीसगढ़ी में हिंदी नाटकों का लेखन मंचन गतिमान हुआ।

लेकिन 20वीं शती के उत्तरार्ध काल में संचार और तकनीकी के क्षेत्र में हो रहे नित नवल अनुसंधानों एवं सुविधाओं के कारण जन मनोरंजन के तमाम सुगम संसाधनों की उपलब्धता से रंगमंच पर दुष्प्रभाव पड़ा है। दर्शकों की अनुपलब्धता से नाट्य मंडलियां काम के अभाव मे बंद हुईं और रंगमंच को समर्पित संस्थान भी आभाहीन हुए। तो 1948 में पेरिस में स्थापित इंटरनेशनल थियेटर इन्स्टीट्यूट ने रंगमंच के प्रति जागरूकता के प्रसार, रंगमंचीय संस्कृति एवं मूल्यों से आमजन को परिचित कराने, नाटकों के आनंद को परस्पर साझा करने  और रंगमंच की पुनर्स्थापना की दृष्टि से 1961 में विश्व रंगमंच दिवस मनाने का संकल्प लिया और पहली बार 27 मार्च 1962 को यह दिवस मनाया गया। इसमें वैश्विक शांति के लिए रंगमंच एवं संस्कृति पर आधारित किसी प्रसिद्ध एवं समर्पित रंगमंचीय कला साधक के आमंत्रित संदेश का 50 भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित कर सभी देशों में प्रसारित किया जाता है ताकि लोग रंगमंच के महत्व से अवगत हों। पहला रंगमंच संदेश 1962 में फ्रांसीसी थिएटर कलाकार जॉन काक्ट्यू ने दिया था। भारत के किसी कला साधक को यह सम्मान पहली बार 2002 में गिरीश कर्नाड को मिला। प्रत्येक वर्ष एक थीम का निश्चय कर तदनुरूप आयोजन किये जाते हैं।‌ वर्ष 2025 की थीम है- रंगमंच और शांति की संस्कृति।

भारत में रंगमंच की समृद्ध एवं गौरवशाली परम्परा अति प्राचीन काल से ही रही है। सर्वप्रथम ऋग्वेद में यम और यमी तथा पुरुरवा एवं उर्वशी के बीच हुए संवाद के दृश्य दिखायी देते हैं। भरत मुनि का नाट्यशास्त्र रंगकर्म का सर्वोत्कृष्ट ग्रंथ है जिसमें नाट्य लेखन, पात्र चयन, अभिनय, मंचन, प्रेक्षागृह, रंगमंडप, नेपथ्य और रंगपीठ पर विशद विश्लेषण परक सामग्री है। साथ ही कथानक, संवाद कथन, ध्वनि एवं प्रकाश, साज-सज्जा, पात्र, रंग शिल्प, रस एवं दर्शक आदि पर भी विस्तार से विचार किया है। भारत के प्राचीन नाट्य मंचन स्थानों में रामगढ़ (छत्तीसगढ़), सीता गुफा, फुलमुई गुफा (नासिक, महाराष्ट्र) उल्लेखनीय है। ये सभी नाटक मंचन के स्थान अंशत: प्राकृतिक हैं पर पहाड़ काट कर मंचीय बनाये गये हैं। भारत के नाट्य मंचन स्थान गुफा जैसी बंद जगहों पर निर्मित किये गये जबकि पाश्चात्य देशों में नाटक खेलने हेतु खुले स्थानों को वरीयता दी गयी जहां दर्शकों के बैठने हेतु  सीढ़ीदार गोल चबूतरे बनाये जाते रहे हैं।

उसी आधार पर अब भारत में भी मुक्ताकाशी मंच बनाये जाने लगे हैं। इन पंक्तियों के लेखक को 2018 में भारत के प्राचीन नाट्य स्थल रामगढ़ को देखने का अवसर मिला था। अंबिकापुर जिले में स्थित यह स्थान रामगढ़ नामक पहाड़ी पर कालिदास द्वारा निर्मित किया गया है। पास ही विशाल हाथी गुफा भी है। रामगढ़ नाट्य मंच में सामने दर्शकों के बैठने हेतु विस्तृत शिला हैं। मंचन हेतु पहाड़ को काटकर एक मंच तैयार किया गया है जो लगभग 6 फीट ऊंचा है। मंच के बाईं और पात्रों की साज-सज्जा और पर्दा खींचने वाले के लिए जगह बनी है तो दायीं ओर नाटक के निर्देशक और नाटक से सम्बंधित कुछ अन्य व्यक्तियों तथा लेखक आदि के बैठने के लिए स्थान नियत है। यह गुफा प्राकृतिक नहीं मानव निर्मित है, ऐसा वहां देखने पर समझ में आता है। अब प्रत्येक वर्ष वहां कालिदास समारोह में तमाम नाट्य प्रस्तुतियों की पुष्पांजलि देकर महान नाटककार कालिदास के योगदान के प्रति श्रद्धा प्रकट की जाती है।

संस्कृत में बहुत सारे नाटक केवल मंचन की दृष्टि से ही लिखे गये। अभिज्ञान शाकुन्तलम्, वेणी संहार, मृच्छकटिकम्, स्वप्नवासवदत्तम्, उत्तररामचरितम्, मालविकाग्निमित्रम्, विक्रमोर्वशीयम, प्रतिमानाटकम और उरुभंग श्रेष्ठ नाटकों में गण्य हैं। दशरूपक और साहित्य दर्पण ग्रंथों में भी नाट्य विधा का सम्यक विवेचन दृष्टव्य है। हिंदी में नाटक भले ही गद्य की श्रेणी में शामिल है पर संस्कृत भाषा में नाटक को दृश्य काव्य के अंतर्गत रखा गया है। नाटक रस प्रधान होता है। काव्यात्मक सौंदर्य की विलक्षण रसपूर्ण सृष्टि की रचना ही नाटक का ध्येय है। काव्येषु नाटकम् रम्यम् कह कर नाटक के सौंदर्य का रेखांकन किया गया है। बौद्ध ग्रंथों में भी नाट्य परंपरा का उल्लेख मिलता है। भारत में मुस्लिम आक्रांताओं के कारण नाटक मंचन एवं लेखन को विराम लग गया। पर कालांतर में 18वीं शताब्दी में नाटक खेलने के उदाहरण मिलते हैं। संस्कृत की नाट्य धारा से प्रेरित होकर हिंदी में भी सुंदर मनोहरी आनंद प्रधान नाटकों की रचना हुई है जिसका श्रेय भारतेंदु हरिश्चंद्र को दिया जाता है। नाटक लेखन एवं मंचन को बढ़ावा देने में पारसी थियेटर की भूमिका की अनदेखी नहीं की जा सकती है।

वर्ष 1871 में स्थापित अल्फ्रेड नाटक मंडली को सही मायने में नाटकों के मंचन और जनसामान्य तक उसकी पहुंच एवं प्रसिद्धि दिलाने का श्रेय जाता है। इस मंडली द्वारा भारतेंदु हरिश्चंद्र और राधा कृष्ण दास के कई नाटकों का मंचन किया गया जिन्हें पर्याप्त सराहना मिली। अन्य नाटक मंडली और थिएटर की बात करूं तो मॉडर्न थिएटर कोलकाता, बलिया नाट्य समाज, बनारस थियेटर, आर्य नाट्य सभा प्रयाग और भारतीय कला मंदिर कानपुर का उल्लेख करना आवश्यक हो जाता है। वर्ष 1884 में नेशनल थियेटर कंपनी ने भारतेंदु के नाटक अंधेर नगरी का सर्वप्रथम मंचन किया था। अन्य नाटकों में सत्य हरिश्चंद्र चंद्रगुप्त, नीलदेव, स्कंद गुप्त, सुभद्रा हरण एवं ध्रुवस्वामिनी आदि का अंकन उचित होगा। ध्यातव्य है कि तत्कालीन नाटकों में स्त्री पात्रों का अभिनय भी पुरुष पात्रों द्वारा ही किया जाता था जिसे विराम दिया 1939 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में स्थापित विक्रम परिषद ने। पहली बार उसके द्वारा स्त्री पात्रों का अभिनय स्त्रियों के द्वारा ही कराने की पहल की गई जिसे अन्य मंडलियों ने भी स्वीकार कर आगे बढ़ाया। इस प्रवाह में लोकभाषा बोली में भी नाटकों की एक वेगवती धारा शामिल थी। नौटंकी, जात्रा, तमाशा, ख्याल, नाच,  बिदेसिया, यक्षगान, स्वांग, रासलीला और रामलीला आदि से लोकजीवन आनंदित हैं। 

वास्तव में नाट्य मंचन में संवाद संप्रेषण, भावाभिव्यंजना और रसास्वादन साथ-साथ चलते हैं। यहां सिनेमा की भांति रिटेक के लिए कोई जगह और अवसर नहीं होता। पात्र का सीधा संबंध दर्शकों से होता है। आज एक कला प्रेमी नागरिक के रूप में हमें यह संकल्प लेना आवश्यक है कि हम रंगमंच के महत्व को समझ उसकी वापसी हेतु संकल्पबद्ध हों। स्कूली स्तर पर भी रंगमंच को पाठ्यक्रम में शामिल कर सार्थक पहल सम्भव है।

प्रमोद दीक्षित मलय शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)
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