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धरती को प्यार, आत्मीयता और सम्मान दें

          • प्रमोद दीक्षित मलय

मानव जीवन में अगर कोई सम्बंध सर्वाधिक उदात्त, गरिमामय, पावन और प्रेमपूर्ण है तो वह है मां और पुत्र का सम्बंध। एक मां कभी भी अपनी संतान को भूखा-प्यासा, निर्बल और कष्ट का जीवन जीते नहीं देख सकती और ऐसा कोई पुत्र भी नहीं होगा जो मां की कराह सुन व्याकुल और व्यथित न हो। यही कारण है कि ऋषियों ने पृथ्वी की वन्दना माता के रूप में की। ‘माता भूमिः पुत्रोहं पृथिव्याः‘ अथर्ववेद का यह सूत्र वाक्य धरती और मानव के सम्बंधों की न केवल गरिमामय व्याख्या करता है बल्कि धरती के प्रति मानवीय कर्तव्यों का निर्धारण भी। न केवल मानव के जीवन यापन के लिए बल्कि पशु-पक्षियों सहित लाखों-करोड़ों छोटे-बड़े जीवों के लिए धरती ने उपहार दिये हैं। लेकिन आज वह धरती अपने कुपुत्रों की करनी से घायल हो रुदन कर रही है। धरती से अधिकाधिक दोहन कर लेने की होड़ ने मनुष्य को अंधा बना दिया है और वह अपने ही पैरों में स्वयं कुल्हाड़ी मार रहा है। धरती संकट में है, धरती कराह रही है पर हम मौन हैं, क्यों?

           मानव के अविवेकी और असंयमित आचरण से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। अन्तरराष्ट्रीय संस्था आईपीसीसी के एक अध्ययन के अनुसार, पिछली सदी में धरती का औसत तापमान 1.4 फारनेहाइट बढ़ा है। यह वृद्धि मौसम और जलवायु के विनाशकारी परिवर्तन का कारण बनी है। तीव्र औद्यौगिकीकरण, ग्रीन हाउस गैसों, जंगलों की कटान और भौतिकवादी भोगप्रधान जीवन शैली के कारण ध्रुवों और पहाड़ी चोटियों की बर्फ पिघल रही है। अंटार्कटिका क्षेत्र से प्रति वर्ष 148 अरब टन बर्फ पिघल रही है। इस कारण समुद्र का जल स्तर बढ़ रहा है। यह बढ़ता जल स्तर तटीय और द्वीपीय छोटे देशों को एक दिन लील लेगा। ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने के लिए दिसम्बर 1997 में क्योटो प्रोटोकाल लाया गया था जिसे 160 देशों ने स्वीकार करते हुए कमी करने का संकल्प लिया। लेकिन अकेले 80 प्रतिशत ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करने वाले अमेरिका ने इसे स्वीकार नहीं किया। सर्वसुख सम्पदा प्रदायिनी यह धरती एक तप्त भट्टी में तब्दील हो रही है।

यह प्लास्टिक युग है। भारतीय समाज अति आधुनिकता के व्यामोह में ‘यूज एण्ड थ्रो‘ जीवन शैली के भंवरजाल में फंसा प्लास्टिक कचरा के रूप में हजारों टन कूड़ा प्रतिदिन घरों से बाहर फेंक रहा है। इस प्लास्टिक में से अधिकांश रिसायकिल नहीं हो पाता। यह गलता नहीं है और अपने अवयवों में टूटने में 1000 साल लगाता हैं। एक आंकड़े के मुताबिक भारत में प्रतिवर्ष 50 मीट्रिक टन प्लास्टिक  का निर्माण होता है। विश्व में 10 करोड़ टन प्लास्टिक का उत्पादन अकेले अमेरिका प्रतिवर्ष करता है और एक करोड़ किलोग्राम प्लास्टिक कूडे़ का उत्सर्जन भी। वहीं इटली द्वारा सर्वाधिक प्लास्टिक थैलियों की खपत की जाती है जो एक खरब प्रतिवर्ष है। पॉलीथीन थैलियों को जलाने से निकली कार्बन और कार्बन मोनो ऑक्साइड, रिफ्रिजरेटर और शीत भंडारण केन्द्रों से उत्सर्जित क्लोरो फलोरो कार्बन से सूर्य की हानिकारक परावैगनी किरणों से पृथ्वी की रक्षा करने वाली ओजोन परत में बड़े-बड़े छेद हो गये है। वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा एक अनुमान के अनुसार 37.16 गीगा टन हो गई है। प्रति एकड़ पैदावार बढ़ाने के लिए रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अधाधुंध प्रयोग से मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरा शक्ति तो नष्ट हुई ही है बल्कि माटी भी जहरीली हो गई है। इस जहर के कारण मिट्टी को खाकर उसे खाद में बदलने वाले किसानों के मित्र केचुआ और अन्य छोटे कीट अब नहीं दिखते। दूध, अन्न, सब्जियां और भूगर्भ जल प्रदूषित हुआ है। परिणाम त्वचा रोग, टायफायड, मस्तिष्क ज्वर, फाइलेरिया, दमा, कैंसर जैसे रोग जडें जमा रहे हैं और महामारी जैसा रूप ले रहे हैं। कल-कारखानों से निकलने वाला दूषित जल बिना किसी ट्रीटमेंट के सीधे नदियों में डाला जा रहा है। यमुना आज दिल्ली-आगरा में गंदे नाले का रूप ले चुकी है। गंगा का जल अपना औषधीय गुण खो चुका है। गंगाजल पीने और नहाने लायक नहीं बचा। गोमती अस्तित्व बचाये रखने को जूझ रही है। यही हाल कमोबेश अन्य नदियों का भी है। वरुणा और असी नदियों के चतुर्दिक बसी होने के कारण काशी नगरी वाराणसी कहलाई लेकिन आज दोनोें नदियां शहर का मल-मूत्र और कचरा ढोने को विवश हैं। नदियां कारखानों का अपशिष्ट बहाने के माध्यम बन कर रह गई हैं।

तथाकथित विकास के नाम पर बडें बांध बनाकर नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को बांधा गया। बड़े बांधों के बनने से जैव विविधता खत्म हुई है। पहाड़ के सीने में उग आए कंक्रीट के जंगल ने प्राकृतिक परिवेश पर आघात किया है। धरती को बचाये रखने के लिए ही सितम्बर 1969 में सिएटल में अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन ने 1970 के बसन्त में पर्यावरण को लेकर राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन की घोषणा की ताकि लोग पर्यावरण की हो रही क्षति को समझ सकें। 1990 में पहली बार अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर इसे मनाने का निश्चय किया जिसमें 141 देशों के 20 करोड़ लोगों की सहभागिता रही। हालांकि, 21 मार्च 1970 को संघ के तत्कालीन महासचिव यू थॉट ने ‘पृथ्वी दिवस‘ को अन्तरराष्ट्रीय समारोह स्वीकार किया था। 1992 में रियो डी जिनेरियों में संयुक्त राष्ट पृथ्वी सम्मेलन हुआ। ग्लोबल वार्मिंग के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए स्वच्छ ऊर्जा के प्रयोग को बढावा देने का संकल्प लिया गया। 2009 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस मनाने का का निर्णय लिया। प्रत्येक वर्ष वैश्विक आयोजन की एक थीम तय की जाती है। वर्ष 2025 की थीम है – हमारी शक्ति, हमारा ग्रह। कार्यक्रमों का मेजबान आयोजन देश दक्षिण कोरिया है। चीन, पाकिस्तान, भारत और अमेरिका सहित कई देशों ने पृथ्वी दिवस के सन्दर्भ में पर्यावरण के महत्व को स्वीकारते हुए विभिन्न मूल्य वर्ग के डाक टिकट जारी किए हैं। यदि हम धरती को बचाना चाहते हैं और चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी के हाथों में एक हरी-भरी सदानीरा और सुवासित वसुन्धरा सौपें तोे हमें अपनी दैनन्दिन जीवनचर्या पूर्णरूपेण बदलनी होगी। हमें प्रकृति की ओर लौटना होगा। बाजार से सामान लाने के लिए घर से जूट या कपड़े के बने थैले उपयोग में लाएं। अनाज भण्डारण के लिए प्लास्टिक बोरियों की बजाय जूट के बोरे इस्तेमाल करें। रोजमर्रा के काम जैसे किराना, शाक-भाजी की खरीददारी में कागज के लिफाफों का प्रयोग करें जो किसी को रोजगार देगा और हमें संतुष्टि। किसानों को रासायनिक उर्वरक और कीटनाशको की बजाय जैविका खाद और इको फ्रेंडली देशी कीटनाशकों के इस्तेमाल के लिए प्रेरित-प्रोत्साहित करें। पहल खुद से शुरु करनी होगी। विश्वास करिए, एक चलना आरम्भ करेगा तो साथ में लोग जुड़ते चलें जायेंगे। केवल एक दिन पृथ्वी दिवस मनाये जाने भर से परिवर्तन होन वाला नहीं है। हमें हर दिन पृथ्वी दिवस मनाना होगा और प्रकृति के साथ चलना होगा, जीना होगा। तभी यह धरा बचेगी और हम भी ।

प्रमोद दीक्षित मलय शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)
प्रमोद दीक्षित मलय शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)

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