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भारत ने वैश्विक परिदृश्य में अंतरिक्ष शक्ति के रूप में अपनी बढ़ती प्रमुखता की पुष्टि की: अंतरिक्ष राज्य मंत्री

केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), पृथ्वी विज्ञान और पीएमओ, परमाणु ऊर्जा विभाग, अंतरिक्ष विभाग, कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन राज्य मंत्री, डॉ. जितेंद्र सिंह ने दिल्ली स्थित भारत मंडपम में वैश्विक अंतरिक्ष अन्वेषण सम्मेलन (जीएलईएक्स 2025) को संबोधित करते हुए वैश्विक परिदृश्य में अंतरिक्ष शक्ति के रूप में भारत की बढ़ती प्रमुखता की पुष्टि की।

“नए संसारों तक पहुंचना: एक अंतरिक्ष अन्वेषण पुनर्जागरण” विषय पर आयोजित इस उच्च स्तरीय शिखर सम्मेलन में 35 से अधिक देशों और अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों की भागीदारी के साथ दुनिया भर के अंतरिक्ष जगत के नेत्तृवकर्ताओं, अंतरिक्ष यात्रियों और वैज्ञानिकों ने हिस्सा लिया और इससे अंतरिक्ष कूटनीति और नवाचार में भारत की अग्रणी भूमिका को मजबूती मिली।

अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष यात्री महासंघ (आईएएफ), भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और एस्ट्रोनॉटिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया (एएसआई) द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित इस तीन दिवसीय शिखर सम्मेलन में 15 महत्वपूर्ण विषयगत क्षेत्रों में 10 समानांतर तकनीकी सत्रों में 240 से अधिक इंटरैक्टिव प्रस्तुतियां आयोजित की जा रही हैं। इस कार्यक्रम में डॉ. जितेंद्र सिंह द्वारा एक गतिशील अंतरिक्ष प्रदर्शनी का उद्घाटन भी किया गया, जिसमें भारतीय अंतरिक्ष स्टार्टअप, अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसियों और इसरो की नवीनतम उपलब्धियों के काम को प्रदर्शित करने वाले 22 स्टॉल शामिल थे।

विशेष सत्र में बोलते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने अंतरिक्ष अन्वेषण में अनुयायी से वैश्विक प्रवर्तक बनने के लिए भारत के परिवर्तन को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, “भारत अब अंतरिक्ष में अग्रणी कुछ देशों के साथ एक समान भागीदार के रूप में सहयोग कर रहा है। यह हमारी वैज्ञानिक क्षमता, दूरदर्शी नेतृत्व और शांतिपूर्ण अंतरिक्ष सहयोग के प्रति प्रतिबद्धता का प्रमाण है।” उन्होंने कहा कि भारत की अंतरिक्ष यात्रा, जो मामूली शुरुआत से आरंभ हुई थी, विकासशील देशों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने जीएलईएक्स 2025 को एक ऐसे मंच के रूप में वर्णित किया, जो दो मोर्चों पर भारत के विजन को आगे बढ़ाता है — “भारत के लिए ए” और “दुनिया के लिए बी”।  इस पर विस्तार से बताते हुए उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन अंतरिक्ष अनुप्रयोगों के जरिए अपने लोगों की सेवा करने की भारत की आकांक्षा को दर्शाता है,  साथ ही विश्व बंधु भारत की भावना को भी अपनाता है — एक विश्वसनीय वैश्विक भागीदार जो प्रभुत्व नहीं, सहयोग के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने जोर देकर कहा, “हम यहां एक बड़े भाई के रूप में कार्य करने के लिए नहीं हैं, बल्कि समान भाइयों के रूप में, हमारे ग्रह के साझा लाभ के लिए शेष मानवता के साथ मिलकर काम कर रहे हैं।”

मंत्री महोदय ने अंतरिक्ष क्षेत्र के लोकतंत्रिकरण के लिए सरकार की पहलों पर प्रकाश डाला, निजी उद्यम और सार्वजनिक-निजी भागीदारी को प्रोत्साहित किया। उन्होंने कहा, “भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र को खोलने से नवाचार में पहले से ही तेजी आई है, पिछले दो वर्षों में ही 190 से अधिक स्टार्टअप उभरे हैं और यह इकोसिसस्टम गहन अंतरिक्ष मिशनों, उपग्रह प्रक्षेपण और वाणिज्यिक अंतरिक्ष अनुप्रयोगों में भारत की महत्वाकांक्षाओं को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण था।”

उपस्थित अंतर्राष्ट्रीय गणमान्य व्यक्तियों में जोसेफ एशबैकर (यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी), काजुयोशी कावासाकी (जापान), जिल स्मिथ (यूएसए), वू वीरेन (चीन) और सलेम अल मर्री (यूएई) शामिल थे, जो इस कार्यक्रम के सही मायने में वैश्विक चरित्र को दर्शाते हैं। इसरो के अध्यक्ष वी. नारायणन ने अंतरग्रहीय अन्वेषण को आगे बढ़ाने और सामाजिक लाभ के लिए अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी को सुलभ बनाने के संगठन के विजन को दोहराया।

जनका के उत्साह बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में सम्मेलन ने  दुनिया भर के लगभग 10 अंतरिक्ष यात्रियों की विशेषता वाला एक अंतरिक्ष यात्री आउटरीच कार्यक्रम भी शुरू किया। लाइनअप में हज़ा अलमंसूरी (यूएई), अल्पर गेज़ेरावसी (तुर्किये), माइकल लोपेज़-एलेग्रिया (यूएसए/स्पेन) और भारतीय अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा और अंगद प्रताप शामिल थे, जिन्होंने अंतरिक्ष विज्ञान में रुचि जगाने के लिए छात्रों और युवा पेशेवरों के साथ बातचीत की।

जब भारत अपने गगनयान मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन और भविष्य के चंद्र और ग्रह अन्वेषणों की तैयारी कर रहा है, तब ग्लेक्स 2025 देश को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष सहयोग के केंद्र और युवा लोगों के लिए आकांक्षा के प्रतीक दोनों के रूप में स्थापित करता है। यह शिखर सम्मेलन न केवल भारत की अंतरिक्ष कहानी में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्शाता है, बल्कि शांतिपूर्ण और समावेशी अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए एक व्यापक वैश्विक प्रतिबद्धता का भी संकेत देता है।

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