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भारत ने 2030 तक 300 बिलियन डॉलर की जैव अर्थव्यवस्था का लक्ष्य रखा: डॉ. जितेंद्र सिंह ने विश्व जैव उत्पाद दिवस पर विजन का अनावरण किया

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज भारत के जैव प्रौद्योगिकी मिशन में व्यापक सार्वजनिक समझ और समावेशी भागीदारी का आह्वान करते हुए कहा कि देश की जैव अर्थव्यवस्था में हर भारतीय एक हितधारक है। विश्व जैव उत्पाद दिवस – द बायोई3 वे के राष्ट्रव्यापी समारोह के दौरान बोलते हुए, मंत्री ने 2030 तक 300 बिलियन डॉलर की जैव अर्थव्यवस्था को साकार करने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई।

जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) और इसकी एजेंसियों बीआईआरएसी और आईब्रिक+ द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में एक नए राष्ट्रीय प्रयोग- ‘शहरों में आवाज़ें: एक समन्वित राष्ट्रीय प्रति घंटा संवाद श्रृंखला’ को दर्शाया गया। आठ घंटे से अधिक समय तक, भारतीय शहरों में चुनिंदा संस्थानों ने समुद्री बायोमास, औद्योगिक मूल्य निर्धारण, वन संसाधनों और कृषि-अवशेष नवाचारों पर थीम-आधारित चर्चाओं की मेजबानी की, जो भारत की जैव उत्पाद क्षमताओं की क्षेत्रीय विविधता को दर्शाती हैं।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने  इस प्रारूप को “सुंदर हाइब्रिड मॉडल” कहते हुए, विकेंद्रीकृत और समावेशी आउटरीच की प्रशंसा की। उन्होंने कहा, “यह एक विज्ञान कार्यक्रम से कहीं बढ़कर है। यह एक आउटरीच आंदोलन है।”  उन्होंने कहा कि मिशन को टिकाऊ बनाने के लिए छात्रों, स्टार्टअप और उद्योग का नेतृत्व करने वालों को शामिल करना आवश्यक था। उन्होंने कहा, “स्टार्टअप शुरू करना आसान है, लेकिन इसे चालू रखना मुश्किल है।”  उन्होंने बायोटेक उपक्रमों के लिए शुरुआती उद्योग भागीदारी और वित्तीय सहायता की आवश्यकता के बारे में भी बताया।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने इस बात पर प्रकाश डाला कि भारत का जैव प्रौद्योगिकी तंत्र एक दशक पहले लगभग 50 स्टार्टअप से बढ़कर आज लगभग 11,000 हो गया है। नीतियों के समर्थन और संस्थागत भागीदारी से यह छलांग संभव हुई है। हाल ही में लॉन्च की गई बायोई3 नीति का उल्लेख करते हुए, डॉ. सिंह ने कहा कि यह पर्यावरणीय स्थिरता, आर्थिक विकास और समानता के साथ जैव अर्थव्यवस्था लक्ष्यों को संरेखित करके भारत को टिकाऊ जैव विनिर्माण में अग्रणी बनाने के लिए आधार तैयार करती है।

डॉ. सिंह ने कहा, “जैव उत्पाद अब प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रह गए हैं। बायोडिग्रेडेबल पैकेजिंग से लेकर पर्यावरण के अनुकूल व्यक्तिगत देखभाल तक, ग्रामीण रोजगार से लेकर हरित नौकरियों तक, वे आजीविका के बारे में हैं।” उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि भविष्य की औद्योगिक क्रांति जैव अर्थव्यवस्था द्वारा संचालित होगी और उनका मानना ​​है कि भारत ने इसमें अग्रणी भूमिका निभाई है।

डॉ. सिंह ने बायोटेक में युवा विद्वानों के सामने आने वाली चुनौतियों को स्वीकार किया। साथ ही  माता-पिता की अपेक्षाओं और करियर विकल्पों में व्यक्तिगत योग्यता के बीच मेल नहीं होने की ओर इशारा किया। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 को “गेम-चेंजर” करार दिया, जो छात्रों को लचीलेपन के साथ रुचि के विषयों को आगे बढ़ाने की अनुमति देगा। उन्होंने कहा, “हम एक नई पीढ़ी को वास्तविक योग्यता और सीखने की क्षमता के साथ देख रहे हैं।”

डॉ. जितेंद्र सिंह ने भारत की पिछली नीतिगत प्राथमिकताओं, खासकर कृषि में असमानता की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। इसके बारे में उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक रूप से यह पश्चिमी मॉडलों से प्रभावित था। उन्होंने भारत के प्राकृतिक संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों की अप्रयुक्त क्षमता पर जोर देते हुए कहा, “विदेशी शोधकर्ता भारत में उस चीज के लिए आते हैं जो उनके पास नहीं है, जैसे हमारे संसाधन और हमारी विविधता। हमें पहले उनका महत्व समझना सीखना चाहिए।”

जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव और बीआईआरएसी के अध्यक्ष डॉ. राजेश एस. गोखले ने बायोई3 नीति को क्रियान्वित करने के लिए उठाए जा रहे कदमों की रूपरेखा प्रस्तुत की। इनमें पायलट विनिर्माण, क्षेत्र-विशिष्ट नवाचार मिशनों के लिए समर्थन और अनुसंधान से लेकर बाजार तक पाइपलाइन को मजबूत करना शामिल है। उन्होंने स्केलेबल बायोटेक समाधानों के लिए शिक्षाविदों, स्टार्टअप्स और उद्योगों के बीच सहयोग को उत्प्रेरित करने में डीबीटी की भूमिका के बारे में बताया।

डॉ. सिंह ने आम नागरिकों तक बायोटेक की प्रासंगिकता को पहुंचाने के लिए सफलता की कहानियों, स्थानीय भाषाओं और संबंधित प्रारूपों का उपयोग करते हुए सोशल मीडिया पर मजबूत पहुंच बनाने का भी आग्रह किया। उन्होंने कहा, “अगर हम युवा प्रतिभाओं को आकर्षित करना चाहते हैं, तो हमें बायोटेक्नोलॉजी को केवल शिक्षा के साथ ही नहीं, बल्कि लाभप्रदता और आजीविका से भी जोड़ना होगा।”

दिन भर चलने वाले इस कार्यक्रम ने जैव प्रौद्योगिकी की शहरी प्रयोगशालाओं से परे खेतों, समुद्रों, जंगलों और उद्योगों तक पहुंच की याद भी दिलाई। डॉ. जितेंद्र सिंह ने कार्यक्रम के भावी संस्करणों में किसानों, मछुआरों और गैर-वैज्ञानिक हितधारकों की आवाज़ें शामिल करने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा, “उन्हें हमें बताना चाहिए कि उन्हें विज्ञान से क्या चाहिए और विज्ञान को उनके लिए क्या प्रदान करना चाहिए।”

भारत हरित, नवाचार-संचालित अर्थव्यवस्था के लिए खुद को तैयार कर रहा है और आज के कार्यक्रम ने विज्ञान संचार, नीति और सार्वजनिक भागीदारी के बीच के अंतर को दर्शाया है तथा इसके मूल में एक व्यापक संदेश निहित है- “जैव प्रौद्योगिकी केवल वैज्ञानिकों के लिए नहीं है” यह सभी के लिए है।

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