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न्यायालय में निर्णायक मोड़ लेता श्रीकृष्ण जन्मभूमि मसला

मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह मस्जिद को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को श्री कृष्ण जन्मभूमि परिसर में स्थित शाही ईदगाह मस्जिद को ‘विवादित संरचना’ घोषित करने की हिंदू पक्ष की याचिका को खारिज कर दिया। याचिका में अदालती रिकॉर्ड और आगे की सभी कार्यवाहियों में मस्जिद को आधिकारिक रूप से विवादित स्थल के रूप में दर्ज करने की मांग की गई थी। अदालत ने मौखिक रूप से याचिका खारिज करते हुए कहा कि इस संबंध में हिंदू पक्ष द्वारा दायर आवेदन को “इस चरण में” खारिज किया जा रहा है। इस फैसले को लंबे समय से चली आ रही कानूनी लड़ाई में मुस्लिम पक्षकार भले ही राहतकारी माने, लेकिन न्यायिक दृष्टिकोण और सांस्कृतिक अस्मिता के संघर्ष में श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह भूमि विवाद पर जो भी फैसला अंतिम रूप से आएगा, वह बहुत प्रभावी होगा, न्यायसंगत होगा। अतः ऐसे किसी पुख्ता फैसले तक पहुंचते हुए पूरी सावधानी एवं धैर्य से आगे बढ़ना चाहिए। इस फैसले से इस विवाद में एक नया रुख सामने आया है, जो महत्वपूर्ण और विचारणीय है।

याचिका में यह मांग की ‘शाही ईदगाह मस्जिद’ शब्द की जगह ‘विवादित ढांचा’ शब्द का इस्तेमाल किया जाए, अगर यह शाब्दिक बदलाव किया जाता, तो एक तरह से यह इस विवाद पर निर्णायक फैसले जैसा होता। जिससे अनावश्यक विवाद या अड़चन की संभावनाएं पनपती। यह विवाद राजनीति मोड़ भी ले सकता था, निश्चित ही अगर राजनीति होगी, तो अंतिम फैसले में अनावश्यक रूप से समय लगेगा। साथ ही, अशांति की आशंका भी बढ़ेगी। इसलिये अदालत के फैसले को सकारात्मक नजरिये से देखा जाना चाहिए। नए नामकरण की यह कोशिश उच्च न्यायालय में अगर नाकाम हुई है, तो कोई अचरज नहीं, ना ही किसी पक्ष की जीत और किसी पक्ष की हार है। इतने संवेदनशील मसले में यह नामकरण पूरे मुकदमे को प्रभावित करता, अतः अदालत ने समझदारीपूर्ण सही फैसला किया है। ‘श्रीकृष्ण जन्मभूमि’ का स्थान न केवल करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है, बल्कि भारतीय संस्कृति और इतिहास का अमिट प्रतीक भी है। परंतु, इसी पवित्र स्थल पर स्थित शाही ईदगाह मस्जिद के साथ एक लंबे समय से विवाद चला आ रहा है जो अब न्यायालय की चौखट पर निर्णायक मोड़ लेता दिखाई दे रहा है।

जन्मभूमि पक्ष के याचिकाकर्ताओं का यह दावा है कि शाही ईदगाह मस्जिद भगवान श्रीकृष्ण के जन्मस्थान पर स्थित है, अतः जन्मभूमि पक्ष को भूमि पर कब्जा दिया जाए। मस्जिद के ढांचे को हटाया जाए, मूल मंदिर का निर्माण हो, वहां मुस्लिम मजहबी गतिविधियों पर रोक लगाई जाए। इन्हीं मांगों के साथ जन्मभूमि पक्ष की ओर से करीब 18 मुकदमे दायर हैं। इनकी सुनवाई यथावत जारी रहेगी। नामकरण संबंधी आवेदन के खारिज होने का कोई असर मूल मुकदमों पर नहीं पड़ेगा। अब दोनों ही पक्षों को पूरे संयम का परिचय देना चाहिए। अदालत का ताजा रुख न किसी के लिए बड़ी हार है और न किसी के लिए बड़ी जीत। महत्वपूर्ण बात यह है कि जन्मभूमि के पक्ष में दायर याचिकाओं को अदालत ने सुनने लायक माना है।

पहले इन याचिकाओं को ईदगाह पक्ष ने चुनौती दी थी, पर अदालत ने चुनौतियों को खारिज कर दिया था। पिछले वर्ष 1 अगस्त को उच्च न्यायालय ने वक्फ अधिनियम, पूजा स्थल अधिनियम, 1991 और अन्य कानूनों के आधार पर ईदगाह पक्ष की आपत्तियों को खारिज करते हुए जन्मभूमि पक्ष द्वारा दायर याचिकाओं को सुनवाई योग्य माना था। अब जब सुनवाई आगे बढ़ गई है, तब ऐसी सावधानी के साथ आगे बढ़ना चाहिए कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुस्लिम कब्जे से मुक्त हो और वहां मन्दिर के निर्माण का स्वप्न आकार ले।

हिंदू याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि मस्जिद की दीवारों पर हिंदू देवी-देवताओं के प्रतीक और रूपांकन अभी भी दिखाई देते हैं। उन्होंने आगे तर्क दिया कि केवल अवैध रूप से भूमि पर कब्जा करने से स्वामित्व स्थापित नहीं होता है और उन्होंने अयोध्या विवाद के साथ समानताएं बताईं। अब जब नामकरण या नाम परिवर्तन की कोशिशों पर अदालत ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है, तब जन्मभूमि पक्ष को छोटे-छोटे फैसले कराने की कोशिश करने के बजाय बड़े फैसले तक पहुंचने की तैयारी एवं जल्दी दिखानी चाहिए, यह विवाद जितनी जल्दी सुलझ जाए, उतना अच्छा है। श्रीराम मन्दिर-अयोध्या की तरह श्रीकृष्ण जन्मभूमि को मुक्त कराकर वहां भव्य मन्दिर निर्माण की ओर सारा ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।

देर भले ही लगे लेकिन अदालत का फैसला श्रीकृष्ण जन्मभूमि के पक्ष में आना है, क्योंकि इस विवाद में जन्मभूमि पक्ष में पर्याप्त दस्तावेज या सुबूत मौजूद हैं, जिनका अदालत में परीक्षण होना है। निस्संदेह, पूरे परीक्षण और विचार के बाद ही कोई फैसला आएगा। लेकिन इस फैसले की दिशाएं मथुरा को पुराणों, महाकाव्यों और ऐतिहासिक अभिलेखों में भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली के रूप में वर्णित उद्धरणों एवं साक्ष्यों से स्पष्ट है। 17वीं शताब्दी में मुगल शासक औरंगज़ेब के शासनकाल में श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर बने मंदिर को ध्वस्त करके वहां शाही ईदगाह मस्जिद का निर्माण कराया गया। इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के अनुसार, यह मस्जिद मंदिर को ध्वस्त करने उसके अवशेषों पर ही बनाई गई थी।

श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट के सदस्य गोपेश्वरनाथ चतुर्वेदी ने बताया कि श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ ने 1968 में शाही मस्जिद ईदगाह कमेटी के साथ दस बिंदुओं पर बिना किसी अधिकार के समझौता किया था। 13.37 एकड़ भूमि श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट के नाम पर है। जब भूमि श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ के नाम पर थी ही नहीं तो उसके द्वारा समझौता कैसे किया जा सकता है? 2020 में श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति याचिका के माध्यम से फिर से यह मुद्दा न्यायालय में आया। याचिका में यह दावा किया गया कि 13.37 एकड़ भूमि भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली है और वहां मौजूद ईदगाह मस्जिद अवैध है। साथ ही, 1951 का समझौता भी अवैध, असंवैधानिक और शून्य घोषित किए जाने की मांग की गई। 2023 से इलाहाबाद उच्च न्यायालय और मथुरा की जिला अदालतों ने इस मामले को गंभीरता से लेना शुरू किया। अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को भूमि की वैज्ञानिक जांच की अनुमति दी, जैसा श्रीरामजन्मभूमि मामले में हुआ था। अदालत ने 1951 के समझौते की वैधता पर सवाल उठाए हैं क्योंकि कटरा केशवदेव ट्रस्ट को जन्मभूमि का संप्रभु प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता था।

जन्मभूमि पक्ष की याचिकाओं को प्रारंभिक दौर में ही खारिज करने से इनकार किया गया और मुकदमे की सुनवाई की अनुमति दी गई। करोड़ों हिंदुओं की आस्था एवं ऐतिहासिकता है कि वर्तमान ईदगाह मस्जिद के नीचे श्रीकृष्ण का वास्तविक जन्मस्थान है। पुरातात्विक साक्ष्य भी मंदिर के अवशेषों की पुष्टि करते हैं। औरंगज़ेब द्वारा मंदिर तोड़ने और मस्जिद बनवाने का स्पष्ट उल्लेख फारसी शिलालेखों व इतिहासकारों की रचनाओं में भी मिलता है। पूजा स्थल अधिनियम-1991 का कानून 15 अगस्त 1947 की स्थिति को बनाए रखने की बात करता है, परंतु श्रीकृष्ण जन्मभूमि एक जीवित और सतत पूजा स्थल है, और इसमें अपवाद की आवश्यकता है जैसा अयोध्या मामले में देखा गया। यह विवाद केवल एक कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना और ऐतिहासिक न्याय की मांग भी है। यह मसला न्यायपालिका से निष्पक्ष न्याय की अपेक्षा इसलिये भी करता है कि यह अधिसंख्य जनभावनाओं, ऐतिहासिक तथ्यों और धार्मिक अस्मिता से जुड़ा हुआ है। श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह विवाद अब केवल इतिहास का विषय नहीं, बल्कि न्याय और आस्था के संतुलन की कसौटी बन चुका है। जैसे अयोध्या में शताब्दियों के संघर्ष के बाद न्याय की विजय हुई, वैसे ही मथुरा की श्रीकृष्ण जन्मभूमि को भी न्याय की प्रतीक्षा है। न्यायालय का नया दृष्टिकोण एक आशा की किरण बनकर उभरा है, जो भविष्य में ऐतिहासिक भूलों को सुधारने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

ललित गर्ग
ललित गर्ग
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