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नरियरा की समृद्ध संस्कृति में कला और संगीत का बहुत बड़ा हाथ रहा

बिलासपुर के समीप स्थित ग्राम नरियरा का सांस्कृतिक और कला संगीत के क्षेत्र में बड़ा समृद्ध इतिहास रहा है। इस गांव में अनेक सिद्ध हस्त और प्रसिद्ध कलाकारों ने जन्म लिया, पर दुर्भाग्य से जिनको वैसी प्रसिद्धि और शोहरत नहीं मिल पाई, जैसी उन्हें मिलनी चाहिए थी। चूंकि उन दिनों नरियरा एक छोटा सा और अछूता सा गांव था। यहां पहुंचने के लिए ना तो समुचित सड़क थी और ना ही गांव का समुचित विकास हुआ था। अब यह तुलना तो आप सब स्वयं ही करेंगे कि अगर आज के जमाने में यही कलाकार रहते तो दुनिया में इनकी प्रसिद्धि और शोहरत शायद इनके कदम चूमती। 

खैर चलिए आगे बढते हैं, उन दिनों छत्तीसगढ़ के वृंदावन के नाम से प्रसिद्ध ग्राम नरियरा को धर्म, रासलीला, नाटक  गीत संगीत के क्षेत्र में प्रसिद्धि दिलाने में स्व कौशल सिंह जिन्हें ग्राम में (मंझला) गोटिया के नाम से जाना जाता था, इनका बहुत बड़ा योगदान रहा। इनका ही परिश्रम और प्रेरणा थी की संगीत रासलीला की शुरुआत ग्राम नरियरा में श्री राधाबल्लभ मंदिर प्रांगण पर पहली बार मंचन प्रारंभ हुआ। प्रारंभ हुआ तो उसकी भव्यता और दिव्यता फिर लोगों की अपार संख्या ने इनके इनकी कला और कार्यक्रम की ख्याति दूर-दूर तक फैला दिया। इन कार्यक्रमों में कौशल सिंह के द्वारा हारमोनियम मृदंग वादन किया जाता था। अपने तीसरे सुपुत्र विश्वेश्वर सिंह का बचपन से ही संगीत के प्रति रुचि देखकर पिता कौशल सिंह ने इन्हें संगीत की प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा के लिए नासिक के स्व विष्णु दिगंबर पलुस्कर जी से शिक्षा प्राप्त करने भेजा। फिर संगीत की आगे की शिक्षा बनारस इलाहाबाद में तबला वादन ज्ञान प्राप्त किया। 

उन दिनो नरियरा में रासलीला पर ब्रजभाषा में श्री कृष्ण की लीला से संबंधित भजन का मंचन किया जाता था। कौसल सिंह बहुत ही सरल स्वभाव के व्यक्ति होने के कारण वे संगीत एवं कला का प्रचार एवं समय-समय पर आसपास में कार्यक्रमों में जाकर अपने हुनर से श्रोताओं का मन मोह लेते थे।  

नरियरा रासलीला को देखकर गांधी नेहरू ने भी की प्रसंशा

एक अवसर ऐसा भी आया जब ये त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन के कार्यक्रम में महात्मा गांधी पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसे महान देशभक्तों के सामने इन्होंने अपनी कला का बेहतरीन प्रदर्शन किया। ठाकुर स्व छेदीलाल बलिस्टर जो की कार्यक्रम के संचालन समिति के अध्यक्ष थे, उनके कहने पर बाजा मास्टर स्व विशेषण सिंह तबला में संगत करने के लिए स्व श्री भान सिंह मुनमुला एवं इसराज पर संगत स्व सुखसागर सिंह एवं साथियों के साथ मंच पर स्वागत गीत एवं वंदे मातरम गीत का गायन किया गया। जिस पर  गांधी व नेहरू सहित वहां उपस्थित सभी दर्शक मंत्र मुक्त हो गए। 

मेघ मल्हार गायन की प्रस्तुति पर झमाझम हुई वर्षा

इसी प्रकार से इन्हें सारंगढ़ में श्रोताओं के द्वारा राग मेघ मल्हार पर गाने के लिए कहा गया। मां सरस्वती की ऐसी कृपा हुई की देखते ही देखते गीत के साथ ऐसी वर्षा हुई जिसे आज भी वहां के कुछ बुजुर्ग है जो याद करते हैं। अपने सरल सादगी भरे जीवन में इन्होंने सिर्फ पूरा जीवन संगीत को ही समर्पित कर दिया। उनके तीसरे नंबर के सुपुत्र स्व श्याम शरण सिंह को संगीत में लगन होने के कारण तबला वादन में बचपन से ही अपने पिता से संगीत की शिक्षा प्राप्त हुई। तबला वादन की शिक्षा भोपाल में इस्माइल दद्दू खान साहब से शिक्षा प्राप्त की। समय-समय पर भोपाल से आने पर पिता पुत्र की संगत से सभी झूम उठते थे। इन्होंने स्व श्री विशेश्वर सिंह के साथ श्री राधाबल्लभ मंदिर परिसर में खैरागढ़ रायगढ़ में संगीत कला के अनेक प्रस्तुतियां दीं, जिसमें कथक नृत्य स्व कल्याण दास जी रामदास जी स्व वेदमनी स्व रामकृष्ण चंदेश्वरी आकाशवाणी भोपाल के लतीफ खान साहब भोपाल स्व दादू सिंह स्व महेंद्र प्रताप सिंह पखावत बांसुरी पर स्व रामेश्वर धार दीवान अफ़रीद सारंगी पर स्व भारत प्रसाद नरियरा जैसे नामीगिरामी  कलाकारों के साथ हारमोनियम बजाकर शास्त्री संगीत भजन सुगम संगीत का संगत करते थे।     

 इनकी कला का ऐसा जादू लोगों में बसा हुआ है कि आज भी स्व विशेश्वर सिंह के द्वारा स्वरबद्ध किये हुए भजन एवं गीत गाए जाते हैं। वर्तमान में उनके शिष्यों में ग्राम के धनीराम विश्वकर्मा जीवित हैं जो उन्हीं  के द्वारा सिखाए गए राग रागिनियो पर संगीत की प्रस्तुतियां देते हैं। अब वर्तमान में इनके नाइट जो इनके विरासत को संभाल रहे हैं वह संजय सिंह भी तबला और अन्य वाद्य वृंद में बहुत पारंगत है। वे अपनी पूर्वजों की विरासत को सहेजने बचाने का पूरा प्रयास कर रहे हैं। संजय सिंह जी ने अपने तबला वादन व संगीत कार्यक्रमों का भोपाल आकाशवाणी, बिलासपुर आकाशवाणी से कई बार कार्यक्रम प्रस्तुत किया हुआ है।

इसी परिपेक्ष में आपको बताता चलूँ कि छत्तीसगढ़ के ख्यातिलब्ध साहित्यकार और कला संगीत प्रेमी भारत सरकार द्वारा पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित विभूति स्व श्याम नारायण चतुर्वेदी जी का बहुत गहरा ताल्लुक रहा है। स्वर्गीय श्याम नारायण चतुर्वेदी जी से मेरे भी बहुत अच्छे ताल्लुकात रहे। उन्होंने साहित्य के साथ-साथ पत्रकारिता में भी कार्य किया हुआ था। इस दौरान मेरी भेंट अक्सर उनसे हुआ करती थी।ऐसे अवसरों पर उनसे साहित्यिक पत्रकारिता के संदर्भ में चर्चाएं भी होती थी।

स्व चतुर्वेदी जी की ये बड़ी खासियत थी कि वह कभी हिंदी में नहीं बात करते थे, हमेशा केवल और केवल छत्तीसगढ़ी में ही बातें किया करते थे। स्व चतुर्वेदी जी का मेरे दादा स्व विजय सिंह बैस से भी काफी अच्छे ताल्लुकात रहे। पत्रकारिता के दौरान एक बार श्याम नारायण चतुर्वेदी जी के साथ जब मैं नागपुर से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक द हितवाद का बिलासपुर में सिटी रिपोर्टर था, तब हितवाद के स्थापना समारोह में मुझे उनके साथ रायपुर जाने का अवसर मिला। कमांडर जीप में एक साथ हम बैठे हुए थे। जिसमें उन्होंने राजनीति और पत्रकारिता के परिप्रेक्ष्य में बहुत गंभीर और व्यापक चर्चाएं की थी। मैंने यहाँ उनकी चर्चा इसलिए छेड़ी की नरियरा की कला संगीत यात्रा में श्री स्वर्गीय चतुर्वेदी जी का भी बहुत बड़ा योगदान रहा है। मैं समझता हूं आगे उन्हीं की जुबानी वर्णन सुनाना ज्यादा उचित होगा।

पद्मश्री स्व रामलाल चतुर्वेदी के संस्मरण से

नरियरा की रासलीला का अपना अनूठा इतिहास रहा है। बीसवीं सदी के दूसरे दशक से इसकी शुरूआत का पता चलता है। श्री प्यारेलाल सनाढ्य बहुत पहले यहा रासलीला किया करते थे। उसके बाद के यहां मालगुजार श्री कौशल सिंह जो मंझला गौटिया के नाम से क्षेत्र में‌ जाने जाते थे, ने इनको अपने मन माफिक  संगीत कला के समारोह को करने का अवसर दिया। वे कृष्ण के परम भक्त थे। भक्ति पद गाते-गाते भावातिरेक में रोने लगते थे। यहां की रासलीला को वे वृन्दावन की तरह ही करते थे। एक बार उन्होंने बताया था कि सडक-सफाई करने वाले मेहतरों के झगडे़ को सुनकर वे श्रीभाषा का ज्ञान बढ़ाते थे। विद्वजनों से रासलीला की गुटका भी विनय प्राप्त हुआ था। 

नरियरा की रामलीला माघ सुदी एकादशी से होकर पन्द्रह दिनों तक होती थी। इस लीला को देखने रायपुर से लीला प्रेमियों की जमात आती थी। साधुओं की मंडली आती थी। सब सतीषा में ठहरते थे। पहले दूसरे के हाथ का पकाया भोजन लोग नहीं चाहते थे तो सवा डेढ़ सौ चूल्हा जलता था। चूल्हा बनवाकर रखा जाता था। ताकि देव स्वरूप अतिथियों को कोई असुविधा न हो। मंगला गौटिया ने राधा कृष्ण तथा बलराम जी का मंदिर बनवाया एवं उनकी अपलक दर्शनीय मूर्ति स्थापित की। मंदिर के प्रतिध्वनिवर्धक मंडप में श्रावणमासी झूला लीला का आयोजन हुआ करता था। 

सन् 1940 तथा 41 में मुझे श्रीकृष्ण के अभिनय का सुअवसर प्राप्त हुआ। 66-67 वर्ष पहले की बात है। सावन में प्रायः रात को वर्षा होते रहती थी, वह दृश्य चल चित्र की तरह मानस पटल पर आज भी उभर जाता है। बारिस में झड़ी में मेध मल्हार देस, सिंधुरा आदि शास्त्रीय रागो में जमुना कदम डार…. झूलत श्याम श्यामा संग….. बदरवा बरसन को आये….. आदि अन्य पदों की स्वर लड़ी में सारंगी, तबला हारमोनियम मंजीरा एवं पखावज के ध्वनि समूह में मेघराज में स्फुट गर्जन ठर्जन के बीच राधा कृष्ण के सखिनन संग नृत्य करते पगबंधी की कड़ी के स्वर-सामंजस्य से जो कर्णप्रिय लोकोतर आनंद मिलता था जो अनिर्वचनीय, अविस्मरणीय है। 

आपको यह जानकर सुखद आश्चर्य होगा कि वहां दर्शकों के बैठने की चुस्त दुरूस्त छायादार व्यवस्था आज से 70 बरस पहले छत्तीसगढ़ में कदाचित कहीं कोई नरियरा जैसा रंगमंच रहा होगा, जहां दर्शकों के बैठने की स्थायी निरापद छायादार व्यवस्था रही हो, जिसमें महिलाओं के लिये अलग पर्याप्त स्थान सुरक्षित था। बात तब की है जब यह गांव सड़क मार्ग से जुड़ा नहीं था। मंदिर का निर्माण 1920 में हुआ। मंझला गौटिया ने 91 एकड़ जमीन देकर राधाकृष्ण मंदिर का ट्रस्ट बना दिया। मंदिर की संपदा में अकलतरा में दुकान और बनाहिल राइस मिल में से हिस्सेदारी रही है। श्री सम्पन्न मंदिर न जाने कितने आगतों का आवभगत करता था। नरियरा के निवासी लीला के लिये लगान का चतुर्थाशं प्रतिवर्ष दिया करते थे। लीला के समय गांव की बेटियां लिवाकर तीजा मे तेवहार की तरह लाई जाती थी। नातेदार सगे संबंधी आते. दिन भर आने जाने वालों की हलचल, तालाबों के घाटों में बतकही का गलबजार, शाम रात सारा आलम लीला स्थल में सिमट आता था। भक्ति की भावना प्रबल थी। 

जब मैं वहां कृष्ण बना, तब मेरी मां लीला देखने आई थी। जब वह तालाब में नहाने जाती तब महिलायें भगवान के दाई आये हैं’ कहकर एक दूसरे को बताती, चरण स्पर्श करती थी। भगवान के प्रति 62 साल पहले कैसी भावना थी, उसकी यह एक झलक है। लीला के व्यास होते थे, भक्त प्रवर मंझिला गौटिया कौशल सिंह (पखावज) हारमोनियम पर प्रभु प्रदत्त कंठ स्वर धनी प्रसिद्ध संगीतज्ञ ठाकुर बिसेसर सिंह, जिन्होंने नासिक जाकर पंडित बिष्णु दिगंबर पलुस्कर के भतीजे श्री चिन्तामन राब से गायन बादन की शिक्षा ली थी और उनने पलुस्कर जी की प्रातः कालीन प्रार्थना “रचा प्रभु तूने यह ब्रम्हांड सारा” को लीला का मंगलाचरण बनाया था। तबला वादक पं. गोकुल प्रसाद दुबे एवं भारत प्रसाद सारंगी वादक थे। बाद में वहां कुछेक लीला मंडलियाँ बनी जो घूम घूम कर लीला किया करती थी। वैसा ही बृन्दावनी पद्धति उन सबकी थी।

 सामान्यतः देवकी वसुदेव विवाह, कृष्ण जन्म, बाल लीला पूतना, अघासुर, बकासुर आदि राक्षसों के साथ कंस वध तो होता ही था, उसके सिवाय चन्द्र प्रस्ताव, यमलार्जुन माखनचोरी, गोचारन,लीला, चीरहरण, जोगन लीला, प्रथम स्नेह लीला भी की जाती थी। श्लोक भी होते, गीत गोविन्द के पद भी गाये जाते थे। नरियरा की लीला की अपनी खास विशेषता थी। एक तो वह मात्र मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि भक्ति भाव विस्तार का अनुष्ठान थी। लीला में प्रयुक्त पद शास्त्रीय राग रागिनियों में निबद्ध, बृज की मधुर भाषा और भगवान की मनुष्यों के द्वारा की जाने वाली लीला में किशोर कलाकारों के माध्यम से प्रदर्शित हाव भाव अनिर्वचनीय आनंद का अनुभव कराने वाला होता था। 

नरियरा की लीला में अभिनय करने वालों की श्रृंखला में सर्वश्री जनकराम सैदा, कपिल महाराज अमोरा, गोकुल प्रसाद दुबे, राजाराम कुंजराम नरियरा, रामवल्लभ दास, प्रभुदयाल, मदन लाल, वैष्णव, श्यामलाल चतुर्वेदी कोटमी, तथा दादू सिंह (गीद) जिन्होंने ‘रहस’ को अनुष्ठानिक उंचाई दी और प्रान्त प्रसिद्ध बनाया। इसके सिवाय अन्य अनेक कलाकार रहे। यहां लीला का अंतिम प्रदर्शन विक्रम संवत 2000 सन् 1944 में रतनपुर में आयोजित विष्णु महायज्ञ के अवसर पर हुआ। नरियरा की मंडली ने स्वयं अपना समस्त व्यय वहन किया था। नरियरा मंडली के सिरजनहार कृष्ण भक्त मंझिला गौटिया ने बृन्दावन में प्राण त्याग किया था। उनकी इच्छी थी कि उनके शव को बृन्दावन की गली में भूलुंठित किया जाय। शायद कृष्ण के चरण रज का स्पर्श हो सके। आज्ञाकारी पुत्रों ने निभाया भी। धन्य है कि नरियरा की लीला और उसके सर्जक अनन्य कृष्ण भक्त ठाकुर कौशल सिंह। अंत में कवि शुकलाल प्रसाद पाण्डेय के छत्तीसगढ़ गौराख में लिखित कुछ पंक्तियों से आलेख का समापन कर रहा हूं।

ब्रज की सी यदि रास देखना हो प्यारों।
 ले नरियर नरियरा ग्राम को शीघ्र सिधारो ॥
 यदि लखना हो सुहृद ! आपको राघव लीला।
 अकलतरा को चलो, करो मत मन को ढीला ॥ 
शिवरीनारायण को जाइये, लखना हो नाटक सुघर। 
बस यहीं कहीं मिल जायेगे, जन नाटक के सूत्रधर ॥

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
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