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डाक सेवा का महत्व, इतिहास एवं भविष्य का पथ

-विश्व डाक दिवस-

पत्र या चिट्ठी कागज में लिखित शब्दों का अंबार भर नहीं हैं, अपितु भावनाओं के प्रत्यक्ष प्रकटीकरण का आगार हैं। पत्र हृदय की धीर-पीर भावनाओं का ज्वार सहेजे उर सरिता के तटबंध  हैं। पत्र मानव मन की मुक्त मूक अभिव्यक्ति हैं। पत्र अनंत आकाश में उड़ने की अभिलाषा हैं। पत्र मानवीय मर्यादा के प्रकाश स्तंभ हैं तो प्रेरणा के व्योम-वितान भी। पत्र प्रेम, माधुर्य एवं विश्वास के सुखद अनुबंध हैं तो घृणा, कटुता एवं अविश्वास के दुखद सम्बंध भी। पत्र विजय की ओजस्वी फहरती पताका हैं तो पराजय का कांतिहीन दुखद संधि परिचय भी। पत्र वात्सल्य, ममता एवं मनुहार का मृदुल नवनीत हैं तो निर्ममता, डांट, फटकार का कर्कश गीत भी। पत्र उत्साह, उल्लास, उमंग, आशा, मित्रता एवं प्रसन्नता के प्रमुदित बिम्ब हैं तो निरुत्साह, निराशा, शत्रुता एवं अप्रसन्नता के प्रतिबिम्ब भी। सुख:दुख के साझीदार पत्र मानवीय संवेग, संवेदना, सहकार, समुन्नति, सत्कार, संधि एवं समरसता के समृद्ध कोश हैं। निश्चित रूप से पत्र आत्मीय सघन अनुभूतियों के सहज संवाहक हैं।

विश्व डाक दिवस

ये पत्र गंतव्य तक पहुंचाने का कार्य कभी प्रशिक्षित पक्षी, हरकारे, विशेष दूत, सैनिक करते थे तो वर्तमान में डाक विभाग। जीवन में पत्रों के महत्व, सूचनाओं के आदान-प्रदान, पत्रों की सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक एवं आर्थिक पक्षों में भागीदारी, भूमिका एवं योगदान से व्यक्तियों को परिचित कराने की दृष्टि से प्रत्येक वर्ष 9 अक्टूबर को यूनीवर्सल पोस्टर यूनियन द्वारा विश्व डाक दिवस का आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर डाक विभाग द्वारा डाक टिकट प्रदर्शनी, डाक इतिहास वृत्तचित्र, पत्र लेखन, पोस्टर डिजायन प्रतियोगिताएं एवं गोष्ठियां आयोजित कर विभाग द्वारा डाक प्रेषण एवं वितरण के साथ संचालित अन्य सुविधाओं यथा बीमा, बैंकिंग, व्यापार आदि योजनाओं का प्रचार-प्रसार किया जाता है ताकि आमजन योजनाओं का लाभ उठा सकें।

दुनिया में डाक सेवा को सहज-सुलभ, पारदर्शी, नवाचारी एवं समावेशी बनाने की दृष्टि से विश्व के 22 देशों ने बर्न, स्विट्जरलैंड में 9 अक्टूबर, 1874 को एक समझौते एवं संधि पत्र पर हस्ताक्षर कर जनरल पोस्टल यूनियन का गठन किया था; जो 1 जुलाई, 1875 से अस्तित्व में आया। आगे 1 अप्रैल, 1879 को जनरल पोस्टल यूनियन का नाम परिवर्तित कर यूनीवर्सल पोस्टल यूनियन (यूपीयू) कर दिया गया। वर्ष 1969 को टोक्यो, जापान में आयोजित यूनीवर्सल पोस्टल यूनियन की बैठक में भारतीय प्रतिनिधि आनंद मोहन नरूला ने 7 अक्टूबर को विश्व डाक दिवस के रूप में मनाने का प्रस्ताव रखा जिसे स्वीकार कर उसी वर्ष से आयोजन आरम्भ कर दिए गये जो वर्तमान में लगभग दो सौ देशों में थीम आधारित कार्यक्रम सम्पन्न होते हैं। वर्ष 2025 की थीम है- स्थानीय सेवा, वैश्विक पहुंच। उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ ने 1 जुलाई, 1948 को यूनीवर्सल पोस्टल यूनियन को राष्ट्रसंघ की एक विशेष एजेंसी के रूप में मान्यता दी है।

भारत 1 जुलाई, 1876 को यूनीवर्सल पोस्टल यूनियन का सदस्य बना। भारत में डाक सेवा के विकास एवं विस्तार पर दृष्टिपात करें तो भारत में आधुनिक डाक व्यवस्था का आरम्भ वर्ष 1766 में राबर्ट क्लाइव द्वारा हुआ और वारेन हेस्टिंग्स ने 1774 में कलकत्ता में पहला डाकघर स्थापित किया। कालांतर में लार्ड डलहौजी के प्रयत्नों से भारत में डाक विभाग की स्थापना 1 अक्टूबर, 1854 को हुई और उसी वर्ष महारानी विक्टोरिया पर केंद्रित चिपकाने वाला एक डाक टिकट पूरे देश के लिए जारी किया गया, हालांकि उसके दो वर्ष पहले 1852 में सिंध राज्य के आयुक्त सर बर्टेले फ्रेरे द्वारा जारी टिकट ‘सिंध डाक’ किसी पत्र पर पहली बार डाक टिकट के रूप में चिपकाया जा चुका था।

स्मरणीय है, विश्व का पहला डाक टिकट ‘पेनी ब्लैक’ 1 मई, 1840 को जारी हुआ था। भारत का डाक विभाग चिट्ठी-पत्र, अखबार, पुस्तकें एवं पत्रिकाएं, वस्तुएं, धन आदि एक स्थान से दूसरे स्थानों तक सामान्य डाक, बुक पोस्ट, पार्सल और रजिस्टर्ड सेवा माध्यम से सुविधाजनक और सुरक्षित ढंग से पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। भारत की सीमा के बाहर पहला डाकघर वर्ष 1983 में अंटार्कटिका महाद्वीप में दक्षिण गंगोत्री में स्थापित किया गया और 1986 में स्पीड सेवा आरम्भ हुई। भारत के डाक इतिहास की संक्षिप्त चर्चा करूं तो 1786 में मद्रास में पहला प्रधान डाकघर खोला गया। वर्ष 1863 में रेल डाक सेवा, 1877 में वीपीपी पार्सल और 1879 में पोस्टकार्ड सेवा तथा वर्ष 1880 में धन भेजने हेतु मनीआर्डर सेवा प्रारंभ हुई थी। हवाई डाक सेवा 1911 में आरम्भ हुई जब इलाहाबाद से नैनी के लिए हवाई डाक पत्र भेजा गया। 1935 में इंडियन पोस्टल आर्डर और 1984 में डाक जीवन बीमा सेवा शुरू हुई। पत्रों को सरलता से सम्बंधित व्यक्ति तक पहुंचाने हेतु 15 अगस्त, 1972 को छह अंकों पर आधारित पिनकोड व्यवस्था का सूत्रपात हुआ, जिसका पहला अंक 1 से 8 तक में कोई एक होता है जो डाक जोन का संकेत करता है। भारत में 9 डाक जोन हैं, 8 सामान्य और 1 सेना के लिए।

डाक विभाग सेवा के बदले प्राप्त मूल्य को डाक टिकटों के माध्यम से स्वीकार करता है। डाक टिकट दो प्रकार के होते हैं- सामान्य एवं स्मारक। सामान्य टिकटों का प्रयोग पत्र आदि में तथा स्मारक टिकट स्मृति एवं डाक टिकट संग्रह के लिए होते हैं जो विशेष अवसरों पर मुद्रित किये जाते हैं। सामान्य पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय पत्र और लिफाफा का न्यूनतम मूल्य डाक टिकट के रूप में अंकित होता है। अन्य सेवाओं के लिए अतिरिक्त डाक टिकट लगाने होते हैं जो विभिन्न मूल्यवर्ग के होते हैं। आपको जानकार आश्चर्य होगा कि भारत के डाक विभाग ने खुशबू वाले डाक टिकट भी जारी किये हैं जिनमें 13 दिसंबर, 2006 को चंदन, 7 फरवरी, 2007 को गुलाब और 26 अप्रैल, 2008 को जूही के फूलों की सुगंध वाले डाक टिकट निर्गत हुए। 1 अक्टूबर, 2004 को भारतीय डाक सेवा के गौरवमय 150 वर्ष पूर्ण हुए थे। 

वर्तमान समय डिजिटल क्रांति का है। हर हाथ में सूचना सम्प्रेषण के सशक्त टूल्स उपलब्ध हैं जो अति शीघ्र संदेश, फोटो, पुस्तक एवं पत्र-पत्रिकाओं के पीडीएफ, रुपए आदि सम्बंधित व्यक्तियों तक पहुंचा देते हैं। पर कागज पर लिखे शब्दों की अनुभूति, दृश्य, स्पर्श किसी अन्य माध्य से सम्भव नहीं। आज की पीढ़ी तो पत्र लिखना ही भूल गयी है। वह डाकिया की राह देखती आंखों की व्याकुलता, खुशी और उल्लास को कभी अनुभव नहीं कर पाएगी। प्रिय पाठको! विश्व डाक दिवस के अवसर क्यों न हम अपने किसी रिश्तेदार, परिवार-जन या संगी-साथी को पत्र लिखने का संकल्प लें जिसके अक्षर-अक्षर में आत्मीयता, मधुरता, प्रीति एवं प्रतीति का जीवनरस घुला हो। 

प्रमोद दीक्षित मलय शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)
प्रमोद दीक्षित मलय शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)
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