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कहानी को जीवन संदर्भों से जोड़ना उचित-महेश पुनेठा

शैक्षिक संवाद मंच का मासिक पुस्तक संवाद सम्पन्न

बांदा: शैक्षिक संवाद मंच उ.प्र. द्वारा गत दिवस आयोजित आनलाइन पुस्तक संवाद-16 अंतर्गत शिक्षक एवं शिक्षिकाओं द्वारा गिजुभाई बधेका की कहानियों पर विचार प्रस्तुति पश्चात् कार्यक्रम के मुख्य अतिथि शिक्षाविद् महेशचंद्र पुनेठा, उत्तराखंड ने कहानियों को सीख तक सीमित न रखते हुए जीवन के विविध संदर्भों से जोड़ने की पैरवी करते हुए कहा कि कहानियों का विशिष्ट संदेश के साथ जीवन के विविध संदर्भों एवं आयामों की दृष्टि से देखना उचित होगा। यह कहानी का अर्थ विस्तार करता है। किसी कहानी में सीख ढूंढने की बजाय उसकी तत्कालीन एवं वर्तमान भूमिका के संदर्भों को समझना होगा।

पुस्तक संवाद में विशिष्ट अतिथि आलोक कुमार मिश्रा, नई दिल्ली रहे तथा अध्यक्षता शैक्षिक संवाद मंच के संस्थापक प्रमोद दीक्षित मलय, बांदा ने की।‌ पुस्तक संवाद-16 की प्रस्तावना रखते हुए संचालन का दायित्व मंच के संयोजक दुर्गेश्वर राय, गोरखपुर ने निर्वहन किया। 25 शिक्षक एवं शिक्षिकाओं ने गिजुभाई बधेका की 25 कहानियों पर अपनी बात रखी। इस अवसर पर राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षिका आसिया फारूकी ने बच्चों के साथ कक्षा शिक्षण में कहानियों की आवश्यकता एवं उपयोगिता पर बल दिया।

उक्त जानकारी देते हुए शैक्षिक संवाद मंच उ.प्र. के संस्थापक शिक्षक साहित्यकार प्रमोद दीक्षित मलय ने बताया कि स्वप्रेरित रचनाधर्मी बेसिक शिक्षकों के स्वैच्छिक समूह शैक्षिक संवाद मंच मासिक पुस्तक संवाद का आयोजन कर किसी पुस्तक पर समीक्षात्मक  टिप्पणी के साथ ही उसके अन्यान्य पक्षों पर आधारित परिचर्चा करते हैं। नवम्बर माह में गिजुभाई बधेका की बाल कहानियों की तीन पुस्तकों बर्फीली बूंद, बेदम बेदुमा और नकल बिन अकल से 25 कहानियों को चुन शिक्षकों को एक सवाल के साथ आवंटित किया गया था। कार्यक्रम में शिक्षक एवं शिक्षिकाओं ने अपनी कहानी का सारांश संदर्भित प्रश्न से जोड़कर अपने विचार रखे।

मुख्य अतिथि के रूप में महेशचंद्र पुनेठा ने आगे कहा कि इन कहानियों का प्रयोग हिंदी के साथ गणित, विज्ञान, सामाजिक विषय सहित अन्य विषयों में किया जाना चाहिए, इससे बच्चों में अवधारणाओं की स्पष्टता और समझ बनेगी। विशिष्ट अतिथि एससीईआरटी नई दिल्ली आलोक कुमार मिश्रा ने कहा कि कहानियों का समूह वाचन बहुदृष्टि देता है। शिक्षक द्वारा सीख बताने से बेहतर है कि कहानियां पढ़कर बच्चे अपनी अर्थ व्युत्पत्ति स्वयं करें। कक्षा में कहानीका संदर्भ, सवाल और संवाद बदल कर कार्य करने से कल्पना शक्ति विकसित होती है। कहानी से अधिक कहानी पर हुई बातचीत महत्वपूर्ण होती है।

पुस्तक संवाद- 16 अंतर्गत प्रतीक्षा त्रिपाठी, वैशाली मिश्रा , डॉ. त्रिलोक चंद (कानपुर देहात), सीमा मिश्रा, आशीष त्रिपाठी (फतेहपुर), विजय प्रकाश जैन (राजस्थान), डॉ.श्रवण कुमार गुप्त, विन्ध्येश्वरी प्रसाद विन्ध्य, डॉ. अरविंद कुमार द्विवेदी (वाराणसी), मीनाक्षी सिंह (मऊ), दाऊ दयाल वर्मा (इटावा), नीलम रानी सक्सैना (रामपुर),  कनक (लखनऊ), दीप्ति राय, मनीषा श्रीवास्तव, दुर्गेश्वर राय (गोरखपुर), अनीता मिश्रा, कुसुम कुमारी (बलरामपुर), प्रीति भारती (उन्नाव), ज्योति जैन (आगरा), वत्सला (कानपुर), गुंजन भदौरिया (कन्नौज), नंदकिशोर अहिरवार (महोबा), अर्चना गुप्ता (बाँदा), विजय शंकर यादव (अम्बेडकर नगर) ने आवंटित कहानियों पर अपने विचार व्यक्त किए। अगला पुस्तक संवाद प्रमोद दीक्षित मलय संपादित ‘दिवास्वप्न संवाद’ पर केंद्रित होगा। प्रमोद दीक्षित मलय

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