9 नवंबर — राष्ट्रीय विधिक सेवा दिवस
न्याय किसी भी लोकतांत्रिक समाज की आधारशिला है। लेकिन न्याय का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होता है, जब समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को भी अपने अधिकारों की रक्षा करने और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने का अवसर मिले। यदि आर्थिक तंगी, अशिक्षा, सामाजिक पिछड़ेपन या कानूनी जानकारी के अभाव में कोई व्यक्ति न्याय पाने से वंचित रह जाए, तो समानता का संवैधानिक आदर्श अधूरा रह जाता है।
इसी भावना को सशक्त बनाने के लिए भारत में प्रतिवर्ष 9 नवंबर को राष्ट्रीय विधिक सेवा दिवस मनाया जाता है। यह दिवस विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के 9 नवंबर 1995 से प्रभावी होने की स्मृति में मनाया जाता है। इसका उद्देश्य जरूरतमंद लोगों को निःशुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध कराने तथा आम नागरिकों को उनके अधिकारों और कानूनी सेवाओं के प्रति जागरूक करना है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी देता है। वहीं अनुच्छेद 39-क राज्य को यह सुनिश्चित करने की दिशा देता है कि आर्थिक या अन्य अक्षमताओं के कारण किसी नागरिक को न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न होना पड़े। इसके लिए निःशुल्क विधिक सहायता की व्यवस्था महत्वपूर्ण है।
न्याय केवल अदालत में मुकदमा लड़ने तक सीमित नहीं है। किसी व्यक्ति को अपने अधिकार समझने, कानूनी सलाह प्राप्त करने, आवश्यक आवेदन तैयार कराने और उपयुक्त मंच तक पहुँचने में सहायता मिलना भी विधिक सेवा का हिस्सा है। इसी उद्देश्य से राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA), राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण तथा तालुका विधिक सेवा समितियाँ कार्य करती हैं।
विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम की धारा 12 के अंतर्गत निर्धारित श्रेणियों के पात्र व्यक्ति निःशुल्क कानूनी सहायता प्राप्त कर सकते हैं। इनमें महिलाएँ और बच्चे, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के सदस्य, मानव तस्करी या बेगार के पीड़ित, दिव्यांग व्यक्ति, औद्योगिक कामगार, अभिरक्षा में रखे गए व्यक्ति तथा निर्धारित आय-सीमा के अंतर्गत आने वाले पात्र लोग शामिल हैं। कुछ विशेष परिस्थितियों में आपदा, हिंसा या अन्य गंभीर संकट से प्रभावित व्यक्तियों को भी सहायता मिल सकती है। पात्रता संबंधित कानूनी प्रावधानों के अनुसार तय होती है।

निःशुल्क विधिक सहायता में पात्रता और मामले की परिस्थितियों के अनुसार अधिवक्ता की सेवाएँ, कानूनी दस्तावेज तैयार करने में मदद, अपील संबंधी कार्यवाही तथा आवश्यक प्रक्रियागत खर्चों में सहायता शामिल हो सकती है। यह सुविधा केवल आपराधिक मामलों तक सीमित नहीं है; पात्र व्यक्ति दीवानी और अन्य कानूनी मामलों में भी सहायता माँग सकते हैं।
यदि किसी व्यक्ति को कानूनी सहायता की आवश्यकता है, तो वह अपने जिले के न्यायालय परिसर में स्थित ‘जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA)’ या संबंधित तालुका न्यायालय में स्थित ‘तालुका विधिक सेवा समिति (TLSC)’ से संपर्क कर सकता है। राज्य या उच्च न्यायालय स्तर पर भी संबंधित विधिक सेवा संस्थाएँ उपलब्ध हैं। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण की आधिकारिक वेबसाइट ‘https://nalsa.gov.in/’ पर आवेदन और सहायता संबंधी जानकारी प्राप्त की जा सकती है। आवेदन प्रक्रिया के लिए निर्धारित पात्रता और आवश्यक दस्तावेजों की जानकारी संबंधित प्राधिकरण से लेना उचित है।
निःशुल्क कानूनी सहायता के लिए आवेदन जमा करने का कोई शुल्क नहीं है। जो व्यक्ति पढ़ने-लिखने में असमर्थ हैं, वे भी संबंधित प्राधिकरण या विधिक सहायता स्वयंसेवक की मदद से आवेदन कर सकते हैं। यह व्यवस्था इस विचार पर आधारित है कि जानकारी और आर्थिक संसाधनों का अभाव न्याय पाने में बाधा नहीं बनना चाहिए।
विधिक सेवा व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पक्ष लोक अदालतें भी हैं। इनके माध्यम से समझौते योग्य मामलों का समाधान पक्षकारों की सहमति से किया जा सकता है। इससे समय और खर्च बचाने में मदद मिल सकती है तथा विवादों के समाधान का सरल विकल्प उपलब्ध होता है। हालाँकि प्रत्येक मामला लोक अदालत में निपटाने योग्य नहीं होता; संबंधित कानूनी शर्तें लागू होती हैं। लोक अदालतों और विधिक जागरूकता शिविरों का उद्देश्य केवल लंबित मामलों का निपटारा करना नहीं, बल्कि लोगों को विवाद बढ़ने से पहले उचित कानूनी सलाह और समाधान के विकल्पों से परिचित कराना भी है।
समाज में आज भी अनेक लोग अपने अधिकारों, सरकारी सहायता योजनाओं, श्रम संबंधी सुरक्षा, घरेलू हिंसा से संरक्षण, संपत्ति संबंधी विवादों और उपभोक्ता अधिकारों के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं रखते। कानूनी जानकारी का अभाव कई बार उन्हें शोषण और अन्याय के प्रति असहाय बना देता है।
विद्यालयों, महाविद्यालयों, ग्राम पंचायतों, सामाजिक संस्थाओं और मीडिया को कानूनी जागरूकता के प्रसार में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। सरल भाषा में कानून की जानकारी, स्थानीय स्तर पर सहायता शिविर और जरूरतमंदों तक संस्थागत सेवाओं की पहुँच इस दिशा में उपयोगी कदम हैं। राष्ट्रीय विधिक सेवा दिवस हमें याद दिलाता है कि न्याय की सार्थकता केवल कानून की पुस्तकों में नहीं, बल्कि आम नागरिक के जीवन में दिखाई देनी चाहिए। न्याय व्यवस्था तभी अधिक मानवीय और विश्वसनीय बनेगी, जब कोई व्यक्ति केवल धन की कमी या जानकारी के अभाव में अपने अधिकारों से वंचित न हो।
न्याय का द्वार सबके लिए खुला रहे, यही संविधान की आत्मा और लोकतंत्र की वास्तविक पहचान है।
न्याय मिले हर जन को,
अधिकारों का मान रहे,
निर्बल के भी साथ खड़ा,
कानून का विधान रहे।
धन के कारण कोई भी
न्याय से वंचित न हो,
समता, गरिमा, न्याय से
भारत का उत्थान रहे।।

वरिष्ठ पत्रकार / साहित्यकार / अधिवक्ता, एवीके न्यूज सर्विस