एक और वर्ष इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुका है। वर्ष 2025 केवल कैलेंडर का एक अंक नहीं था, बल्कि वह घटनाओं, चेतावनियों, उपलब्धियों और विडंबनाओं का ऐसा संगम रहा, जिसने समाज, राजनीति और विकास की हमारी समूची अवधारणाओं को कठघरे में खड़ा किया। नये वर्ष में प्रवेश करते समय यह केवल उल्लास, संकल्प और शुभकामनाओं का क्षण नहीं है, बल्कि गहरे आत्ममंथन का अवसर भी है। सवाल यह नहीं कि नया साल हमें क्या देगा, सवाल यह है कि बीते वर्ष ने हमें क्या सिखाया और हम उन सीखों को अपने जीवन, नीतियों और प्राथमिकताओं में कितना उतार पाए। हर नया वर्ष अपने साथ उम्मीदों की नई रोशनी लेकर आता है, लेकिन वह बीते वर्ष की छायाओं से मुक्त नहीं होता। उन छायाओं को समझना और उनसे सबक लेना ही नये वर्ष की सच्ची शुरुआत है।
वर्ष 2025 की ओर दृष्टि डालें तो यह स्पष्ट होता है कि भारत और विश्व दोनों स्तरों पर विकास और संकट साथ-साथ चले। एक ओर भारत ने डिजिटल अर्थव्यवस्था, अंतरिक्ष विज्ञान, बुनियादी ढांचे और वैश्विक मंच पर अपनी उपस्थिति को मजबूत किया, वहीं दूसरी ओर पहलगाम की आतंकी घटना, पर्यावरणीय आपदाएं, महंगाई, बेरोज़गारी, शिक्षा और चिकित्सा की बढ़ती लागत, सामाजिक विषमता और राजनीतिक अविश्वास जैसे प्रश्न और भी गहरे होते चले गए। ये वे अनुत्तरित सवाल हैं, जिनके समाधान के बिना नये भारत और सशक्त भारत की संकल्पना अधूरी ही रहेगी। जाते हुए वर्ष के आंकडों एवं घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि केवल आर्थिक आंकड़ों की चमक से किसी राष्ट्र की वास्तविक स्थिति नहीं आंकी जा सकती, उसके लिए आम जनजीवन की सच्चाइयों को समझना जरूरी है।
पहलगाम की आतंकी घटना ने एक बार फिर आतंकवाद के भयावह चेहरे को उजागर किया, लेकिन उसके बाद ऑपरेशन सिंदूर की सफलता ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत अब केवल पीड़ित नहीं, बल्कि निर्णायक और साहसी प्रतिकार करने वाला राष्ट्र है। इस सटीक कार्रवाई ने पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद की पोल खोलते हुए दुनिया को यह संदेश दिया कि भारत अपनी सुरक्षा, संप्रभुता और नागरिकों के जीवन के साथ कोई समझौता नहीं करेगा। आतंक के विरुद्ध भारत की यह नीति-न तो उकसावे में आना, न ही चुप रहना, एक परिपक्व, सक्षम और आत्मविश्वासी राष्ट्र की पहचान बन चुकी है, जिसने सीमा पार बैठे आतंकी संरक्षकों को गहरा और ठोस जवाब दिया है। इसी परिप्रेक्ष्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राएं और उनकी वैश्विक नेतृत्व-छवि भारत के उभार को नई ऊंचाइयों तक ले जाती दिखती हैं। कूटनीति, निवेश, तकनीक और आपूर्ति-श्रृंखलाओं में भारत की भूमिका सुदृढ़ हुई है, जिससे देश के भीतर विश्वास और आशाओं का संचार हुआ है। स्थिर शासन, सुधारों की निरंतरता और वैश्विक साझेदारियों के बल पर भारत का तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ना अब एक दूर का स्वप्न नहीं, बल्कि साकार होता परिदृश्य प्रतीत होता है। आतंकवाद के विरुद्ध कठोर रुख, नक्सलवादमुक्त भारत और अर्थव्यवस्था में आत्मनिर्भर, नवोन्मेषी गति-इन तीनों ने मिलकर भारत को विश्व मंच पर निर्णायक शक्ति के रूप में स्थापित किया है।
पर्यावरण वर्ष 2025 की सबसे बड़ी चेतावनी बनकर सामने आया। जलवायु परिवर्तन अब केवल वैज्ञानिक रिपोर्टों या अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का विषय नहीं रहा, बल्कि वह आम आदमी के जीवन का कठोर यथार्थ बन चुका है। हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन, उत्तर भारत में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी, महानगरों में दमघोंटू प्रदूषण और तटीय इलाकों में चक्रवातों की बढ़ती तीव्रता-ये सभी घटनाएं एक ही संकट की अलग-अलग अभिव्यक्तियां हैं। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, केरल, पूर्वाेत्तर और अन्य राज्यों में आई प्राकृतिक आपदाओं ने यह दिखा दिया कि प्रकृति से खिलवाड़ का मूल्य सबसे पहले गरीब और वंचित चुकाते हैं। विकास की अंधी दौड़ में जब पहाड़ों को काटा जाता है, नदियों को बांधा जाता है और जंगलों को उजाड़ा जाता है, तो उसका परिणाम विनाश के रूप में सामने आता है। नये वर्ष में यह सवाल हमारे सामने खड़ा है कि क्या विकास का अर्थ केवल सड़कें, पुल, सुरंगें और ऊंची इमारतें है, या वह जीवन, प्रकृति और भविष्य की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है। जब तक पर्यावरणीय संतुलन को विकास नीति के केंद्र में नहीं रखा जाएगा, तब तक हर नया साल नई आपदाओं की आहट लेकर आता रहेगा। वर्ष 2025 ने हमें यह सोचने को विवश किया है कि प्रकृति के साथ सामंजस्य ही स्थायी विकास का एकमात्र रास्ता है।

