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पिपरावा अवशेषों की स्वदेश वापसी: स्वामित्व नहीं, साझा वैश्विक जिम्मेदारी का उद्घोष

नई दिल्ली स्थित राय पिथोरा सांस्कृतिक परिसर में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा पवित्र पिपरावा अवशेषों की भव्य अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी का उद्घाटन केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं था, बल्कि यह भारत की उस सभ्यतागत चेतना का सार्वजनिक पुनर्पाठ था, जिसमें धरोहर को अधिकार नहीं, दायित्व के रूप में देखा जाता है। इस अवसर पर आयोजित “बौद्ध दर्शन” विषयक पैनल चर्चा ने इस ऐतिहासिक क्षण को वैचारिक गहराई प्रदान की और बौद्ध परंपरा की समकालीन प्रासंगिकता को बहुआयामी दृष्टि से रेखांकित किया।

बौद्ध दर्शन पर विद्वानों का मंथन

इस पैनल चर्चा की अध्यक्षता बिहार के नालंदा स्थित नव नालंदा महाविहार (मानित विश्वविद्यालय) के कुलपति प्रोफेसर सिद्धार्थ सिंह ने की। चर्चा में देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से जुड़े प्रख्यात विद्वानों की भागीदारी रही, जिनमें बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ के पूर्व रजिस्ट्रार प्रोफेसर नलिन कुमार शास्त्री, दिल्ली विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग के प्रोफेसर बाला गणपति, बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आनंद सिंह, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के प्रोफेसर रजनीश मिश्रा तथा कलकत्ता विश्वविद्यालय के बौद्ध अध्ययन विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर उज्ज्वल कुमार प्रमुख रूप से शामिल थे।

संवाद, करुणा और नैतिक आचरण की परंपरा

अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रोफेसर सिद्धार्थ सिंह ने स्पष्ट किया कि महात्मा बुद्ध की शिक्षाएं किसी भी प्रकार के बल, दबाव या संस्थागत प्रभुत्व के माध्यम से नहीं फैलीं, बल्कि संवाद, नैतिक आचरण और व्यक्तिगत उदाहरण के कारण विश्वभर में स्वीकार की गईं। उन्होंने रेखांकित किया कि बौद्ध धर्म का मूल उद्देश्य धर्म परिवर्तन नहीं, बल्कि मानव मन की शुद्धि और दुखों के निवारण का मार्ग प्रशस्त करना है। उन्होंने यह भी कहा कि बुद्ध के अवशेष केवल ऐतिहासिक स्मृति नहीं हैं, बल्कि वे समकालीन अनुयायियों को ऐतिहासिक बुद्ध से जोड़ने वाली जीवंत कड़ी हैं। पिपरावा अवशेषों की स्वदेश वापसी को उन्होंने स्वामित्व के दावे के बजाय साझा जिम्मेदारी और वैश्विक नैतिक उत्तरदायित्व का प्रतीक बताया।

शांति और समावेशी विकास में बौद्ध विचार

प्रोफेसर नलिन कुमार शास्त्री ने पिपरावा अवशेषों की वापसी को बौद्ध दर्शन की नई प्रासंगिकता से जोड़ा। उनके अनुसार, यह वापसी शांति, सामाजिक समरसता और एकीकृत राष्ट्रीय विकास के मार्गदर्शक के रूप में बौद्ध विचारधारा की भूमिका को पुनर्स्थापित करती है। उन्होंने कहा कि बौद्ध दर्शन प्राचीन ज्ञान को आज की चुनौतियों जैसे नैतिक शासन, पर्यावरणीय स्थायित्व और मानसिक स्वास्थ्य से जोड़ने की क्षमता रखता है। अनात्ता, ब्रह्मविहार और प्रतीत्यसमुत्पाद जैसी शिक्षाएं न केवल आध्यात्मिक, बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व की भी आधारशिला हैं। इस संदर्भ में उन्होंने भारत को धम्म की मातृभूमि के रूप में वैश्विक मंच पर पुनः स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया।

अवशेष, प्रतीक और पवित्र भूगोल

प्रोफेसर आनंद सिंह ने बुद्ध और उनके शिष्यों के अवशेषों को धम्म के प्रतीकात्मक स्वरूप के रूप में व्याख्यायित किया। उन्होंने कहा कि ये अवशेष महात्मा बुद्ध की जीवंत उपस्थिति और उनकी शिक्षाओं दोनों को समाहित करते हैं।
उनके अनुसार, अवशेषों की उपासना ने स्तूपों और चैत्यों के माध्यम से बौद्ध धर्म के पवित्र भूगोल के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह प्रक्रिया स्थानीय सांस्कृतिक तत्वों को आत्मसात करते हुए भी बौद्ध दर्शन के मूल दार्शनिक मूल्यों से कोई समझौता नहीं करती, चाहे वह आदिबुद्ध की अवधारणा हो या मातृ देवी से जुड़े प्रतीक।

वैश्विक स्वीकृति और भारत की सभ्यतागत भूमिका

प्रोफेसर बाला गणपति ने बौद्ध धर्म की वैश्विक स्वीकृति के पीछे उसकी दार्शनिक गहराई और नैतिक सार्वभौमिकता को प्रमुख कारण बताया। उन्होंने पिपरावा अवशेषों को बुद्ध के संदेश का जीवंत प्रमाण कहा और भारत की उस सभ्यतागत भूमिका को रेखांकित किया, जिसने करुणा, सहअस्तित्व और अहिंसा के मूल्यों को विश्व को दिया। उनके अनुसार, आज की खंडित और तनावग्रस्त दुनिया में बौद्ध दर्शन शांति, सहअस्तित्व और नैतिक स्पष्टता के लिए एक व्यावहारिक और मानवीय ढांचा प्रदान करता है।

भारतीय दर्शन की साझा बौद्धिक परंपरा

प्रोफेसर रजनीश मिश्रा ने बौद्ध और शास्त्रीय भारतीय दर्शन के बीच गहन दार्शनिक और पाठ्यगत निरंतरताओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने श्रमणिक और ब्राह्मणवादी परंपराओं के साझा बौद्धिक परिवेश को रेखांकित करते हुए बताया कि वाराणसी जैसे ऐतिहासिक केंद्र संवाद, वाद-विवाद और दार्शनिक परिष्कार के महत्वपूर्ण स्थल रहे हैं। यह साझा परंपरा भारतीय चिंतन की समावेशी और संवादात्मक प्रकृति को दर्शाती है।

स्तूप और चैत्य की अवधारणा

प्रोफेसर उज्ज्वल कुमार ने अपने वक्तव्य में यह स्पष्ट किया कि बुद्ध ने अपने प्रथम उपदेश के लिए सारनाथ का चयन जानबूझकर किया था। उन्होंने स्तूप और चैत्य के बीच के सैद्धांतिक अंतर को विस्तार से समझाया। उनके अनुसार, स्तूप वह स्थान है जहां अवशेष प्रतिष्ठित होते हैं, जबकि चैत्य बुद्ध की पवित्र स्मृति का प्रतीक होता है। दोनों ही बौद्ध नैतिक और भक्तिमय जीवन में केंद्रीय स्थान रखते हैं।

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