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वेनेज़ुएला संकटः अमेरिकी निरंकुशता और वैश्विक कानूनों का हनन

वेनेज़ुएला पर अमेरिकी सैन्य कार्रवाई और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था वास्तव में नियम-कानूनों से संचालित होती है या फिर ताकतवर राष्ट्रों की इच्छा ही वैश्विक न्याय का नया मानदंड बन चुकी है। निश्चित तौर पर वेनेज़ुएला पर अमेरिकी हमला महाशक्तियों की निरंकुशता कोे दर्शा ही रहा है, यह वैश्विक कानूनों का अतिक्रमण भी है, जो अमेरिकी दादागिरी का त्रासद एवं विडम्बनापूर्ण संकेत है, वह केवल लैटिन अमेरिका तक सीमित घटना नहीं है, बल्कि समूची दुनिया के लिये एक खतरनाक मिसाल है। अमेरिका ने जिस तरह से वेनेज़ुएला में सैन्य कार्रवाई करके वहां के राष्ट्रपति को गिरफ्तार किया है, उससे जुड़े कूटनीतिक, राजनीतिक और अन्तराष्ट्रीय कानून संबंधी सवाल जो खडे़ हुए ही हैं, पर अमेरिका को हस्तक्षेप का अवसर देने के लिये मादुरो की नीतियां भी चर्चा में आई हैं। वेनेज़ुएला पर अमेरिकी हमले की वजहें हो सकती है, लेकिन ट्रंप को यह तो सुनिश्चित करना ही होगा कि यह राष्ट्र अस्थिरता का अड्डा न बन जाये।

वेनेज़ुएला संकटः अमेरिकी निरंकुशता और वैश्विक कानूनों का हनन

अमेरिका और उसके राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप स्वयं को वैश्विक शांति का मसीहा घोषित करते नहीं थकते, लेकिन उनकी नीतियां और कार्रवाइयाँ बार-बार युद्ध, हस्तक्षेप और सत्ता परिवर्तन की मानसिकता को उजागर करती हैं। यह वही अमेरिका है जो एक ओर लोकतंत्र, मानवाधिकार और संप्रभुता की दुहाई देता है, तो दूसरी ओर एक संप्रभु राष्ट्र पर आक्रमण और उसके राष्ट्रपति को गिरफ्तार करके अमेरिका ले जाना अंतर्राष्ट्रीय दादागिरी का दुर्लभ उदाहरण है। उससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि ट्रंप ने ऐलान किया है कि सत्ता परिवर्तन होने तक वाशिंगटन इस लैटिन अमेरिकी देश का संचालन करेगा। यह एक खतरनाक परंपरा है, जिसकी पुनरावृत्ति अमेरिकी महाद्वीप से बाहर होने की आशंका भी बलवती हो सकती है।

इसमें दो राय नहीं कि निकोलस मादुरो के पतन के बाद वेनेज़ुएला में मिश्रित प्रतिक्रिया होगी। अंतर्राष्ट्रीय साजिशों से मादुरो को लगातार खलनायक बनाने की कोशिशों में एक वैश्विक तंत्र लगा हुआ था। इस तरह की दोहरी नीतियां केवल विडंबनापूर्ण नहीं, बल्कि वैश्विक शांति के लिये घातक है। वेनेज़ुएला संकट को केवल मादुरो बनाम अमेरिका के टकराव के रूप में देखना वास्तविकता को सरलीकृत करना होगा। इसमें संदेह नहीं कि मादुरो सरकार पर आर्थिक कुप्रबंधन, दमनकारी नीतियों, चुनावी अनियमितताओं और मानवाधिकार हनन जैसे गंभीर आरोप रहे हैं। लाखों वेनेज़ुएलावासी देश छोड़ने को मजबूर हुए, अर्थव्यवस्था चरमरा गई और जनता त्रस्त हुई। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि किसी देश की आंतरिक विफलताओं को आधार बनाकर बाहरी सैन्य हस्तक्षेप को वैध ठहराना अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की आत्मा के विरुद्ध है। यदि यही मापदंड हो, तो दुनिया के अनेक देशों में बाहरी हस्तक्षेप का अंतहीन सिलसिला शुरू हो सकता है।

दरअसल, वैश्विक कूटनीति के जानकारों का मानना है कि वेनेज़ुएला के मामले में अमेरिका की असली चिंता न लोकतंत्र है और न ही मानवाधिकार, बल्कि वहां के विशाल तेल भंडार हैं। वेनेज़ुएला विश्व के सबसे बड़े तेल भंडारों में से एक पर बैठा देश है और ऊर्जा संसाधनों पर नियंत्रण की अमेरिकी भूख कोई नई बात नहीं है। इराक, लीबिया और अफगानिस्तान इसके उदाहरण हैं, जहां ‘लोकतंत्र स्थापना’ के नाम पर हस्तक्षेप हुआ, लेकिन परिणामस्वरूप अस्थिरता, गृहयुद्ध और मानवीय संकट ही पैदा हुआ। ट्रंप का यह बयान कि मादुरो को पकड़ने के अभियान का खर्च वेनेज़ुएला के तेल राजस्व से वसूला जाएगा, इस पूरे घटनाक्रम की मंशा को बेनकाब करता है। यह कथन स्पष्ट करता है कि यह कार्रवाई न्याय या नैतिकता से नहीं, बल्कि संसाधनों पर नियंत्रण की साम्राज्यवादी सोच से प्रेरित है। किसी देश के प्राकृतिक संसाधनों पर इस तरह दावा करना उपनिवेशवादी मानसिकता का आधुनिक संस्करण है।

इस अमेरिकी कार्रवाई के भू-राजनीतिक परिणाम भी गहरे और दूरगामी होंगे। रूस और चीन ने इसे नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था के लिये गंभीर खतरा बताया है। मादुरो के आलोचक रहे कुछ अमेरिकी सहयोगी देश भी अब खुलकर चिंता जता रहे हैं। यह संकट वैश्विक ध्रूवीकरण को और तेज कर सकता है। विशेष रूप से चीन को इस घटनाक्रम से अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं, विशेषकर ताइवान पर अमेरिकी आलोचना को कमजोर करने का अवसर मिल सकता है। यदि अमेरिका स्वयं संप्रभुता का उल्लंघन करता है, तो वह दूसरों को किस नैतिक आधार पर संयम की सलाह देगा? वेनेज़ुएला संकट का एक और चिंताजनक पहलू वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला प्रभाव है। तेल उत्पादन और आपूर्ति में किसी भी प्रकार की अनिश्चितता का सीधा असर अंतर्राष्ट्रीय बाजारों पर पड़ता है। तेल कीमतों में उछाल पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं को झकझोर सकता है, विशेषकर विकासशील देशों को। भारत जैसे देशों के लिये यह स्थिति अत्यंत संवेदनशील है, जहां ऊर्जा आयात पर निर्भरता अधिक है। यही कारण है कि भारत ने इस घटनाक्रम पर संतुलित रुख अपनाते हुए चिंता व्यक्त की है और दोनों पक्षों से संवाद व कूटनीतिक समाधान की वकालत की है।

भारत का यह दृष्टिकोण न केवल व्यावहारिक है, बल्कि नैतिक रूप से भी अधिक जिम्मेदार है। युद्ध और हस्तक्षेप किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकते। इतिहास गवाह है कि इराक और अफगानिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप के बाद अमेरिका को अंततः अपमानजनक विदाई का सामना करना पड़ा, लेकिन वे देश आज भी स्थिरता और शांति से कोसों दूर हैं। युद्ध शुरू करना भले आसान हो, लेकिन शांति और सुशासन स्थापित करना अत्यंत कठिन होता है-यह सत्य अमेरिका बार-बार भूलता रहा है। ट्रंप प्रशासन की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह स्वयं को शांति का अग्रदूत बताता है, लेकिन उसकी हर बड़ी विदेश नीति पहल टकराव और दबाव की राजनीति पर आधारित दिखती है। यह दोहरी मानसिकता न केवल अमेरिका की विश्वसनीयता को कमजोर करती है, बल्कि संयुक्त राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की प्रासंगिकता पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है। यदि शक्तिशाली राष्ट्र अपने हितों के अनुसार नियम तोड़ने लगें, तो वैश्विक व्यवस्था अराजकता की ओर बढ़ेगी।

वेनेज़ुएला का संकट पूरी दुनिया के लिये एक चेतावनी है। यह बताता है कि आज भी शक्ति-राजनीति मानवता, शांति और कानून से ऊपर रखी जा रही है। जरूरत इस बात की है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय एकजुट होकर इस तरह के एकतरफा हस्तक्षेपों का विरोध करे और संवाद, कूटनीति तथा बहुपक्षीय समाधान को प्राथमिकता दे। किसी भी देश में सत्ता परिवर्तन का निर्णय वहां की जनता को करना चाहिए, न कि विदेशी सेनाओं को। अंततः, अमेरिका को यह समझना होगा कि किसी ‘निरंकुश शासक’ को हटाना शायद सैन्य शक्ति से संभव हो जाए, लेकिन किसी देश को स्थायी शांति, स्थिरता और समृद्धि देना केवल टैंकों और बमों से नहीं हो सकता। इसके लिये धैर्य, संवेदनशीलता और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के प्रति सम्मान आवश्यक है। यदि अमेरिका वास्तव में वैश्विक शांति का पक्षधर है, तो उसे अपनी दोहरी नीति त्यागनी होगी। अन्यथा, वेनेज़ुएला जैसी घटनाएँ बार-बार दोहराई जाएंगी और दुनिया एक और अस्थिर, असुरक्षित भविष्य की ओर बढ़ती जाएगी।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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