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विकसित भारत की उड़ान: बजट 2026 के आर्थिक संकल्प

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत नवीन केंद्रीय बजट को यदि समग्र दृष्टि से देखा जाए तो यह केवल एक वार्षिक वित्तीय दस्तावेज नहीं, बल्कि ‘विकसित भारत 2047’ के स्वप्न की ठोस आधारशिला के रूप में सामने आता है। यह बजट उस रिफॉर्म एक्सप्रेस की तरह है जो बीते वर्षों में चली आर्थिक सुधारों की पटरियों पर तेज़ गति से दौड़ते हुए अब भारत को उच्च विकास, समावेशन और आत्मनिर्भरता की नई ऊँचाइयों की ओर ले जाने का दावा करता है। तुलनात्मक, विवेचनात्मक और समीक्षात्मक दृष्टि से यह बजट पूर्ववर्ती बजटों की निरंतरता को बनाए रखते हुए कई नए आयाम भी जोड़ता है, जो इसे ऐतिहासिक और भविष्यगामी बनाते हैं।
पिछले कुछ वर्षों के बजटों की तुलना में यह बजट अधिक आत्मविश्वास के साथ सामने आता है। महामारी, वैश्विक आर्थिक अस्थिरता, भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला की चुनौतियों के बीच भारत ने जिस आर्थिक मजबूती का प्रदर्शन किया है, उसका आत्मविश्वास इस बजट में स्पष्ट झलकता है। जहां पूर्व बजटों में संकट प्रबंधन और अर्थव्यवस्था को संभालने पर अधिक जोर था, वहीं यह बजट विकास की ऊंची उड़ान के लिए रनवे तैयार करता दिखता है। ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ का मंत्र यहां नारे से आगे बढ़कर नीतिगत संरचना का रूप लेता है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में बजट की दृष्टि विशेष रूप से विवेचनात्मक है। चिकित्सा अवसंरचना के विस्तार, मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाने, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने और डिजिटल हेल्थ के माध्यम से गांव-गांव तक चिकित्सा सुविधाएं पहुँचाने की दिशा में किए गए प्रावधान यह संकेत देते हैं कि सरकार स्वास्थ्य को केवल खर्च नहीं, बल्कि मानव पूंजी में निवेश मान रही है। यदि पिछले दशक के बजटों से तुलना की जाए तो स्वास्थ्य पर आवंटन और दृष्टिकोण दोनों में गुणात्मक परिवर्तन दिखाई देता है। यह बदलाव भारत को न केवल स्वस्थ समाज की ओर ले जाने वाला है, बल्कि उत्पादकता और आर्थिक वृद्धि को भी दीर्घकाल में मजबूती देगा।
शिक्षा के क्षेत्र में भी बजट की आत्मा दूरदर्शी है। नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन, कौशल विकास, डिजिटल शिक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और उभरती तकनीकों से जुड़ी शिक्षा पर बल यह दर्शाता है कि सरकार भविष्य के भारत के लिए आज के युवाओं को तैयार करना चाहती है। पूर्ववर्ती बजटों में शिक्षा पर खर्च की चर्चा होती थी, लेकिन इस बजट में शिक्षा को रोजगार और नवाचार से जोड़ने की स्पष्ट रणनीति दिखाई देती है। यह एक ऐसा बिंदु है जहाँ यह बजट तुलनात्मक रूप से अधिक परिपक्व और व्यावहारिक प्रतीत होता है।

विकास की दृष्टि से यह बजट ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर प्लस समावेशन’ का मॉडल प्रस्तुत करता है। रेलवे कॉरिडोरों के विकास, लॉजिस्टिक्स को सशक्त बनाने, सड़क, बंदरगाह और शहरी अवसंरचना में निवेश को जिस तरह प्राथमिकता दी गई है, वह भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का मजबूत हिस्सा बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। सात रेलवे कॉरिडोर विकसित करने की घोषणा केवल परिवहन सुविधा का विस्तार नहीं, बल्कि औद्योगिक विकास, रोजगार सृजन और क्षेत्रीय संतुलन का माध्यम भी है। यदि इसे पिछले बजटों से जोड़कर देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि सरकार अब बुनियादी ढांचे को विकास का इंजन मानकर लगातार गति दे रही है।

ग्रामीण भारत के संदर्भ में यह बजट विशेष उल्लेख के योग्य है। कृषि, ग्रामीण अवसंरचना, सिंचाई, किसान कल्याण और ग्रामीण उद्यमिता से जुड़े प्रावधान यह संकेत देते हैं कि गांव को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की मंशा केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं है। मेडिकल सुविधाओं, शिक्षा और डिजिटल कनेक्टिविटी के विस्तार से ग्रामीण भारत में जीवन की गुणवत्ता सुधरने की संभावना बढ़ती है। यह आत्मनिर्भर भारत की उस परिकल्पना को साकार करता है जिसमें गांव मजबूत होंगे तो देश स्वतः मजबूत होगा।

नारी शक्ति के सशक्तिकरण के संदर्भ में भी बजट का दृष्टिकोण तुलनात्मक रूप से व्यापक है। महिला स्वयं सहायता समूहों, महिला उद्यमिता, स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़े विशेष प्रावधान यह दर्शाते हैं कि महिलाओं को केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि विकास की भागीदार के रूप में देखा जा रहा है। गरीबों और वंचित वर्गों के लिए लक्षित योजनाएं इस बजट को सामाजिक न्याय की दृष्टि से भी संतुलित बनाती हैं। समीक्षात्मक रूप से देखा जाए तो यह बजट कल्याण और विकास के बीच संतुलन साधने का प्रयास करता है, जो किसी भी दीर्घकालिक आर्थिक नीति की अनिवार्य शर्त है।

युवाओं के लिए यह बजट विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। स्टार्टअप, नवाचार, स्किल इंडिया, रोजगार सृजन और नई तकनीकों में निवेश युवाओं की आकांक्षाओं को संबोधित करता है। यदि इसे आगामी विधानसभा चुनाव वाले राज्यों के संदर्भ में देखा जाए तो यह भी स्पष्ट होता है कि बजट में क्षेत्रीय संतुलन और राजनीतिक यथार्थ का भी ध्यान रखा गया है। हालांकि आलोचक इसे चुनावी बजट कह सकते हैं, लेकिन विवेचनात्मक दृष्टि से यह कहना अधिक उचित होगा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में बजट का जन-आकांक्षाओं से जुड़ा होना स्वाभाविक है, बशर्ते वह दीर्घकालिक विकास को बाधित न करे। इस बजट में दीर्घकालिक दृष्टि और तात्कालिक आवश्यकताओं के बीच संतुलन दिखाई देता है।

समीक्षात्मक रूप से यह स्वीकार करना होगा कि किसी भी बजट की सफलता केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन से तय होती है। संसाधनों की उपलब्धता, राज्यों के साथ समन्वय और पारदर्शी प्रशासन इस बजट की वास्तविक परीक्षा होंगे। फिर भी, तुलनात्मक दृष्टि से यह बजट भारत की आर्थिक यात्रा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव प्रतीत होता है।

अंततः यह कहा जा सकता है कि निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत यह बजट भारत के विकास की ऊंची उड़ान का मजबूत आधार है। यह वर्तमान की चुनौतियों को स्वीकार करते हुए भविष्य की संभावनाओं के लिए रास्ता तैयार करता है। स्वास्थ्य, शिक्षा, अवसंरचना, ग्रामीण विकास, नारी शक्ति और युवाओं को केंद्र में रखकर यह बजट ‘विकसित भारत 2047’ की दिशा में एक सशक्त कदम है। यदि इसे निरंतर सुधार, जवाबदेही और समावेशी क्रियान्वयन का साथ मिला, तो यह बजट इतिहास में केवल एक दस्तावेज नहीं, बल्कि भारत के उज्ज्वल भविष्य की नींव के रूप में याद किया जाएगा।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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