दीपों की जगमगाहट के बीच सुरक्षित, स्वच्छ और पर्यावरण के अनुकूल दीपोत्सव मनाने का संदेश
साल भर अगर किसी एक त्योहार का सबसे बेताबी से इंतजार रहता है, तो वह निस्संदेह दीपावली है। 8 नवंबर, रविवार को इस बार घरों-आंगनों में उजालों का यह पर्व दस्तक देगा। दीवाली महज दीये जलाने या मुंह मीठा कराने भर की रस्म नहीं है। असल में यह मन के भीतर जमे अंधेरे को बुहारकर वहां नई उम्मीदों की रोशनी भरने का एक खूबसूरत बहाना है। त्योहार के आने की भनक कई दिन पहले ही हवाओं में तैरने लगती है। बाजार की चहल-पहल, घरों में पुताई की महक और साफ-सफाई की भागदौड़ चीख-चीख कर बताती है कि दीवाली आ चुकी है।
यह सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि रिश्तों को फिर से सींचने का मौका है। रोजी-रोटी के चक्कर में दूर बैठे अपने भी इस दिन घर लौटने की हर मुमकिन जद्दोजहद करते हैं। पुराने गिले-शिकवे भूलकर एक-दूसरे को गले लगाना ही इस त्योहार की असली रूह है। बच्चों की तो बात ही निराली है। नए कपड़े, स्कूल से मिली छुट्टियां और जगमगाते घर उनकी खुशी को सातवें आसमान पर पहुंचा देते हैं। लेकिन जरा सोचिए, यह जश्न तभी तो मुकम्मल होगा न, जब हम इसे पूरी जिम्मेदारी और सुरक्षा के साथ मनाएंगे।

दीपों का प्रकाश और हमारी जड़ें हमारी भारतीय परंपराओं में त्योहारों की जड़ें बहुत भीतर तक धंसी हैं। दीपोत्सव असल मायने में निराशा के अंधकार पर ज्ञान और आशा की जीत का प्रतीक है। कहा जाता है कि वनवास के बाद जब श्रीराम अयोध्या लौटे, तो अवधवासियों ने घी के दीये जलाकर अपनी खुशी जाहिर की थी। बस, वही उल्लास आज तक हमारी रगों में दौड़ रहा है। हालांकि, अलग-अलग प्रांतों में इसे मनाने के पीछे कई और भी दिलचस्प लोक-मान्यताएं जुड़ी हुई हैं।
इस दिन मुख्य रूप से मां लक्ष्मी और गजानन की आराधना होती है। यह आम धारणा है कि सुख और समृद्धि उसी दरवाजे से भीतर आती है, जहां साफ-सफाई और पवित्रता का वास हो। इसीलिए तो लोग हफ्तों पहले से घर का कोना-कोना चमकाने में जुट जाते हैं। देहरी पर सजी रंगोली, मुंडेर पर टिमटिमाते दीये और गेंदे के फूलों की महक घर को एक अलग ही नूर से भर देती है। दीवाली हमें यह भी याद दिलाती है कि सच्ची अमीरी बैंक बैलेंस में नहीं, बल्कि अपनों के प्यार और आपसी भाईचारे में बसती है।
सजावट और साफ-सफाई का पारंपरिक उल्लास उत्तर भारत से लेकर सुदूर देहातों तक, इस त्योहार की तैयारियों का अपना एक अलग ही देसी स्वाद है। शहरों में भले ही आज चाइनीज झालरों या आधुनिक लाइटों का चलन बढ़ गया हो, लेकिन गांवों में आज भी घरों को मिट्टी से लीपने का रिवाज जिंदा है। घर की महिलाएं बड़े जतन से कुम्हार के बनाए मिट्टी के दीयों को पानी में भिगोकर, सुखाकर उनमें तेल-बाती लगाती हैं। सच कहूं तो मिट्टी के ये दीये सिर्फ रोशनी नहीं देते, बल्कि उन गरीब कुम्हारों के घर का चूल्हा भी जलाते हैं। इनकी खरीदारी करना उनके पसीने और कला को हमारा एक छोटा सा सलाम है।
यम दीप और छोटी दीवाली मुख्य पर्व से ठीक एक शाम पहले हम नरक चतुर्दशी या छोटी दीवाली मनाते हैं। शाम घिरते ही यमराज के नाम का एक दीया घर के बाहर रखने की पुरानी रीत है। इसके पीछे अपने परिवार की सलामती और अकाल मृत्यु से बचाव की गहरी भावना छिपी है।
दीवाली वाली शाम गोधूलि बेला में ही पूजा-पाठ की तैयारियां जोर पकड़ने लगती हैं। नए कपड़ों में सजे परिवार के लोग जब लक्ष्मी-गणेश पूजन के बाद अपनी छतों, मुंडेरों और देहरी पर दीयों की कतारें सजाते हैं, तो आस-पास का पूरा माहौल एक अजीब से रूहानी सुकून और उत्सव के रंग में सराबोर हो जाता है।
आतिशबाजी: सावधानी हटी, दुर्घटना घटी अब बात करते हैं आतिशबाजी की। दीवाली का नाम सुनते ही बच्चों के पैर पटाखों की तरफ थिरकने लगते हैं। पर हमें यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि इन पटाखों का जहरीला धुआं और कान फोड़ू आवाज हमारी आबोहवा के लिए एक बड़ा खतरा हैं। इस धुएं से अस्थमा के मरीजों की सांसें उखड़ने लगती हैं और तेज धमाकों से बुजुर्गों से लेकर बेजुबान जानवरों तक की जान आफत में आ जाती है।
अगर घर के बच्चे पटाखे जला ही रहे हैं, तो किसी समझदार बड़े का उनके पास खड़ा होना बेहद जरूरी है। पटाखे हमेशा किसी खुली जगह पर चलाएं। ढीले-ढाले या सिंथेटिक कपड़ों की जगह सूती कपड़े पहनना अक्लमंदी है। अगर कोई पटाखा न चले और फुस्स हो जाए, तो उसके पास जाकर दोबारा तीली दिखाने की भूल न करें। थोड़ी देर बाद उस पर पानी उड़ेल दें। एहतियात के तौर पर पानी से भरी एक बाल्टी और फर्स्ट-एड का सामान हमेशा आस-पास रखना चाहिए।
सांस के मरीजों के लिए चुनौती आजकल वैसे ही हवा में इतना जहर घुला है, उस पर दीवाली का धुआं अस्थमा और एलर्जी के मरीजों की मुश्किलें और बढ़ा देता है। सीने में जकड़न, खांसी और आंखों से पानी गिरना बहुत आम बात हो जाती है। ऐसे माहौल में बेहतर यही है कि बच्चों और बुजुर्गों को घर के भीतर ही रखा जाए। जो लोग इनहेलर या किसी नियमित दवा के सहारे हैं, वे उसे अपने पास ही रखें और जरा सी भी दिक्कत होने पर बिना देरी किए डॉक्टर को दिखाएं।
आंखों और कानों का रखें ख्याल पटाखों की अचानक उठी चिंगारी आंखों को ऐसा नुकसान पहुंचा सकती है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। अगर गलती से आंख में कुछ गिर जाए, तो उसे हाथों से रगड़ने की बेवकूफी न करें, सीधे किसी नेत्र रोग विशेषज्ञ के पास भागें। तेज धमाके कानों की सुनने की ताकत भी छीन सकते हैं, इसलिए बहुत ज्यादा शोर-शराबे वाली जगह से दूरी बनाए रखना ही मुनासिब है।

