टूटी हुई ज़िंदगी का साया

कनक ने मानो बचपन देखा ही नहीं था। घर की जिम्मेदारी के बोझ ने उसको उम्र से कहीं अधिक समझदार बना दिया था। उम्र बढ़ने के साथ उसके कंधों पर जिम्मेदारियाँ ऐसे उतरती गईं, जैसे किसी ने बिना पूछे ही उसे जीवन की सबसे कठिन भूमिका सौंप दी हो।

कहानी: टूटी हुई ज़िंदगी का साया

माँ सरल थीं—संस्कारों और लोकलाज में पगी हुई, दुनियादारी के छलों से अनजान सी। पिता जनक, एक निजी विद्यालय में मामूली कर्मचारी, जीवन भर अनुशासन और ईमानदारी का पाठ पढ़ाते रहे, पर घर के भीतर दोनों बेटों को अनुशासन व मेहनत का पाठ पढ़ाने में विफल रहे।

बहन की शादी के बाद घर जैसे अचानक सूना नहीं, बल्कि एकतरफा हो गया—जहाँ सबकी अपेक्षाएँ थीं, पर सुनने वाला कोई नहीं।

“कनक, तू समझदार है… तू संभाल लेगी,”

पिता का यह वाक्य आशीर्वाद नहीं, जीवन-भर की सज़ा बन गया।

कनक मुस्कुरा देती, पर रात को तकिए के नीचे दबे आँसू किसी को दिखाई नहीं देते। शिवा उसके जीवन का वह अध्याय था, जिसमें पहली बार कनक ने अपने लिए कुछ सोचा था।

छत पर बैठकर सपनों की बातें, किताबों के बीच छिपे पत्र, और भविष्य की योजनाएँ—सब कुछ बहुत सादा, बहुत सच्चा।

“मैं तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा, कनक,”

शिवा ने एक दिन कहा था। कनक ने पहली बार विश्वास किया था। पर विश्वास हमेशा उम्र से बड़ा होता है, और समाज हमेशा स्त्री से कठोर।

“इतनी तेज लड़की?
और ऊपर से परिवार की जिम्मेदारियाँ?
नहीं शिवा, यह रिश्ता हमें मंज़ूर नहीं।”

शिवा की माँ के शब्द लोहे जैसे थे—ठंडे, कठोर और अंतिम।

कनक ने प्रतीक्षा की।
दिन, महीने, साल।

हर त्योहार पर वह एक नई उम्मीद पहन लेती, और हर बार उसे उतारकर संदूक में रख देती।

जब शिवा की शादी की खबर आई, कनक ने कोई सवाल नहीं किया।
सिर्फ आईने में खुद से कहा—

“शायद मैं ही गलत थी… ज्यादा चाह लिया।”

कनक की शादी जैसे किसी ने जल्दबाज़ी में किया गया निर्णय था—न उसका मन पूछा गया, न उसका अतीत।

पति मौन था—अजीब, अस्थिर, और भीतर से खोया हुआ।

एक महीने में ही वह रिश्ता बिखर गया।

“तुम्हें सब समझ आता है, कनक,”

ससुराल वालों ने कहा,

“पर हमारा बेटा… वो ठीक नहीं है।”

कनक फिर समझदार बन गई।
वापस लौट आई—और इस बार सम्मान भी पीछे छूट गया।

पिता जनक की बीमारी ने कनक के भीतर बची-खुची शक्ति भी निचोड़ ली।

अस्पताल की गलियाँ, डॉक्टरों की ठंडी भाषा, दवाइयों की लंबी पर्चियाँ—
कनक ने सब सहा।

“बेटी… थक मत जाना,”

पिता ने अंतिम दिनों में कहा।

पर पिता नहीं जानते थे—
थकान कब की स्थायी हो चुकी थी।

उनके जाने के बाद,
भाइयों की ज़रूरतें,
मकान, पढ़ाई, शादी—
सब कनक की ज़िम्मेदारी बन गए।

और जब सब पूरा हो गया—

“अब तुम्हें अलग रहना चाहिए,”

घर ने कहा।

कमल बाबू उसे बचपन से जानते थे। लेखक थे—संवेदनशील, अकेले, और जीवन को शब्दों में समझने वाले। मानो मौन प्रेम की परछाई जैसे।

“कनक, तुम्हें हमेशा दूसरों के लिए ही क्यों जीना पड़ता है?”

उन्होंने एक दिन पूछा।

कनक मुस्कुरा दी—

“क्योंकि मेरे हिस्से का ‘मैं’ कभी लिखा ही नहीं गया।”

जब कमल बाबू ने प्रेम का प्रस्ताव रखा,
तो वह प्रेम नहीं था—
वह जीवन का सहारा था।

पर कनक तब तक बहुत देर से टूट चुकी थी।

“कमल बाबू,” उसने कहा,
“अब प्रेम भी मुझे डराता है।
मैं कहीं फिर खुद को न खो दूँ।”

अंत : जब स्मृतियाँ बोलने लगती हैं

समय बीतता गया।
कनक अब अक्सर खुद से बातें करने लगी।

कभी शिवा से,
कभी माँ से,
कभी उस कनक से—
जो कभी हुआ करती थी।

पुराने पार्क में बैठकर वह पत्तों से पूछती—

“क्या मैंने सच में कुछ गलत किया था?”

कमल बाबू दूर से उसे देखते।
एक दिन पास आए—

“कनक… चलो, घर चलते हैं।”

कनक हँस पड़ी—
हँसी में दरार थी।

“कौन-सा घर, कमल बाबू?
जिसने मुझे अपनाया, उसने निकाल दिया।
जिससे प्यार किया, उसने ठुकरा दिया।
और जिसे समझा, उसे मैं समझ ही नहीं पाई।”

उसने अपनी डायरी खोली—
पन्ने खाली नहीं थे,
पर शब्द अब बिखर चुके थे।

“देखिए,” उसने कहा,
“अब अक्षर भी मुझसे भागने लगे हैं।”

कमल बाबू की आँखें भर आईं।

कनक अचानक चुप हो गई।
उसकी दृष्टि कहीं बहुत दूर टिक गई—
जैसे कोई अदृश्य दृश्य देख रही हो।

“शिवा आ रहा है…”
“माँ बुला रही है…
सब कह रहे हैं—कनक, अब आराम कर लो।”

कमल बाबू ने उसका हाथ पकड़ा,
पर वह स्पर्श तक नहीं पहुँचा।

कनक अब इस संसार में थी ही नहीं—
वह स्मृतियों, पीड़ा और अपूर्ण प्रेम के बीच
कहीं खो चुकी थी।

कनक नहीं मरी—
वह जीवित रहते हुए टूट गई।

उसका शरीर चलता रहा,
पर मन समय से बहुत आगे निकल गया।

कमल बाबू समझ गए—
कुछ प्रेम बचा नहीं सकते,
केवल इतिहास बनकर रह जाते हैं।

और कनक—
जो जीवन भर सबका भार उठाती रही—
अंततः अपने ही मन के भार तले
चुपचाप ढह गई।

टूटी हुई ज़िंदगी का साया
अब केवल स्मृतियों में नहीं,
एक जीवित स्त्री की आँखों में ठहर गया था।

डॉ. पंकज भारद्वाज
डॉ. पंकज भारद्वाज

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