सीएसआईआर-एनआईएससीपीआर ने मानव-केंद्रित कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ऊर्जा सुरक्षा पर अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की

सीएसआईआर-राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं नीति अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर-एनआईएससीपीआर) ने भारत-एआई इम्पैक्ट समिट 2026 के आधिकारिक पूर्व-शिखर कार्यक्रम के रूप में पूसा स्थित विवेकानंद हॉल में “मानव-केंद्रित एआई और सतत विकास: ऊर्जा सुरक्षा के लिए समग्र मार्ग” विषय पर एक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया। दिन भर चली इस संगोष्ठी में भारत और विदेश के प्रतिष्ठित विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और नीति निर्माताओं ने मानव-केंद्रित कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से सुरक्षित, समावेशी और टिकाऊ ऊर्जा भविष्य की दिशा में संभावनाओं और चुनौतियों पर गंभीर विचार-विमर्श किया।

उद्घाटन सत्र में सीएसआईआर-एनआईएससीपीआर की निदेशक डॉ. गीता वानी रायसम ने स्वागत भाषण देते हुए संगोष्ठी की पृष्ठभूमि प्रस्तुत की। उन्होंने सुरक्षित और विश्वसनीय एआई ढांचे की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि सरकार द्वारा इसी महीने आयोजित किए जाने वाले भारत-एआई इम्पैक्ट समिट 2026 से पहले यह कार्यक्रम व्यापक परामर्श की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उनके अनुसार संगोष्ठी का उद्देश्य ऐसे ठोस विचार और व्यावहारिक समाधान सामने लाना है, जो सरकार को सतत विकास और ऊर्जा सुरक्षा के लिए मानव-केंद्रित, सुरक्षित और भरोसेमंद एआई नीति निर्माण में सहायता प्रदान कर सकें।

मुख्य अतिथि के रूप में भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के पूर्व अध्यक्ष और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर के इंस्टीट्यूट चेयर प्रोफेसर डॉ. आशुतोष शर्मा ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता की द्वैध प्रकृति पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि एआई प्रौद्योगिकियों में अपार संभावनाएं हैं, लेकिन इनके साथ जोखिम भी जुड़े हुए हैं, इसलिए समाज में मानव-केंद्रित एआई पर गहन और समयबद्ध चर्चा आवश्यक है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि एआई को मानव का प्रतिस्थापन नहीं, बल्कि सहायक के रूप में कार्य करना चाहिए, जिससे उन लक्ष्यों को प्राप्त करने के नए अवसर मिल सकें जो अब तक कठिन रहे हैं।

रूसी विज्ञान अकादमी के विज्ञान और प्रौद्योगिकी इतिहास संस्थान की निदेशक डॉ. नादिया अशेउलोवा ने अपने संबोधन में भारतीय दार्शनिक परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि चेतना और बुद्धि के विविध आयामों के प्रति भारत का ऐतिहासिक दृष्टिकोण आज मानव-केंद्रित एआई पर चिंतन के लिए एक समृद्ध आधार प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि भारत और रूस दोनों ही नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों की ओर संक्रमण के दौरान जटिल तकनीकी, सामाजिक और संस्थागत चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। उनके अनुसार वास्तविक लक्ष्य केवल अधिक शक्तिशाली एआई प्रणालियां विकसित करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि ये प्रणालियां बुद्धि के लोकतंत्रीकरण को बढ़ावा दें और व्यापक जनसंख्या को रचनात्मक तथा बौद्धिक भागीदारी के अवसर प्रदान करें।

नीति आयोग के वरिष्ठ सलाहकार डॉ. विवेक सिंह ने विशिष्ट अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए कहा कि बड़े भाषा मॉडलों को आधार देने वाले डीप लर्निंग मॉडल का उदय एक महत्वपूर्ण और स्वागत योग्य विकास है, क्योंकि ये तकनीकें तेजी से जीवन और शासन के विभिन्न क्षेत्रों में समाहित हो रही हैं। उन्होंने भारत-केंद्रित डेटा की विशिष्टता पर जोर देते हुए कहा कि इसे एआई प्रणालियों में प्रभावी ढंग से एकीकृत करना आवश्यक है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत ने एआई के प्रति संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है, जिसमें नवाचार को प्रोत्साहन देने के साथ सामाजिक हितों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है। कौशल विकास और उन्नत प्रशिक्षण के माध्यम से एआई के साथ कार्य करने में सक्षम मानव संसाधन तैयार होंगे, जिससे उत्पादक और सार्थक रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे। सत्र का समापन डॉ. कस्तूरी मंडल द्वारा औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।

“ऊर्जा सुरक्षा और सतत विकास के लिए एआई-संचालित मार्ग” विषय पर आयोजित मुख्य सत्र में नैतिक, समावेशी और जन-केंद्रित एआई प्रतिमानों के साथ ऊर्जा संक्रमण पर वैश्विक दृष्टिकोणों पर चर्चा की गई। बीआईटी मेसरा के कुलपति प्रोफेसर इंद्रनील मन्ना की अध्यक्षता में हुए इस सत्र में भारतीय राष्ट्रीय इंजीनियरिंग अकादमी के उपाध्यक्ष प्रोफेसर उदय बी. देसाई, सीएसआईआर-सीईसीआरआई कराईकुडी के निदेशक डॉ. के. रामेशा और उज्बेकिस्तान के ताशकेंट स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर एंड्री वी. रेजायेव ने ऊर्जा प्रणालियों में एआई की तकनीकी सीमाओं, प्रणालीगत चुनौतियों और सहयोग की संभावनाओं पर अपने विचार रखे। वक्ताओं ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि ऊर्जा क्षेत्र में एआई का प्रभावी उपयोग बहु-क्षेत्रीय सहयोग और मजबूत अनुसंधान ढांचे पर निर्भर करेगा।

दोपहर के तकनीकी सत्र “कृत्रिम बुद्धिमत्ता: समानता, अखंडता और समावेशिता” की अध्यक्षता जेएनयू के प्रोफेसर अनिर्बन चक्रबोर्ती ने की। इस सत्र में अंतरविषयक अनुसंधान, डेटा-आधारित निर्णय प्रक्रिया और जिम्मेदार नवाचार ढांचे पर विशेष जोर दिया गया, ताकि एआई प्रौद्योगिकियां समाज और सतत विकास में वास्तविक योगदान दे सकें। सीएसआईआर-एनआईएससीपीआर के डॉ. विपिन कुमार ने ऊर्जा सुरक्षा के संदर्भ में एआई के अवसरों और चुनौतियों का उल्लेख करते हुए विश्वसनीय डेटा पारिस्थितिकी तंत्र और नीति-अनुरूप नवाचार की आवश्यकता बताई।

साइंस यूरोप की डॉ. लिडिया बोरेल ने एआई-संचालित स्थिरता के लिए मजबूत अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और खुले विज्ञान की प्रथाओं को अनिवार्य बताया। ईज़ीगॉव के श्री अमित शुक्ला ने शासन और सार्वजनिक सेवा वितरण में एआई की भूमिका पर चर्चा करते हुए कहा कि यह तकनीक समावेशी विकास को गति दे सकती है। वहीं, सेंट पीटर्सबर्ग स्टेट यूनिवर्सिटी की अनास्तासिया ए. इवानोवा ने एआई के युग में चिकित्सा विशेषज्ञता के लोकतंत्रीकरण की आवश्यकता पर बल दिया, जबकि जेएनयू की प्रोफेसर रीता सोनी ने एआई से संबंधित कानूनी और बौद्धिक संपदा अधिकार ढांचे पर अपने विचार साझा किए।

“मानव-केंद्रित एआई और सतत विकास” विषय पर दूसरे तकनीकी सत्र की अध्यक्षता प्रोफेसर आंद्रेई वी. रेजायेव ने की, जिसमें नैतिक दुविधाओं, ऊर्जा संक्रमण और प्रणालीगत जोखिमों पर व्यापक चर्चा हुई। सेंट पीटर्सबर्ग स्टेट यूनिवर्सिटी की डॉ. नतालिया ट्रेगुबोवा ने सतत विकास को आगे बढ़ाने में मानव-केंद्रित एआई के प्रमुख आयामों और उससे जुड़ी नैतिक चुनौतियों पर प्रकाश डाला। आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर रमेश नारायणन ने उभरते प्रौद्योगिकी प्रतिमानों के संदर्भ में ऊर्जा संक्रमण की जटिलताओं का विश्लेषण किया।

सीएसआईआर-एनआईएससीपीआर के डॉ. अविनाश क्षितिज ने ऊर्जा सुरक्षा पर एआई के दोहरे प्रभाव का उल्लेख करते हुए कहा कि जहां यह अनुकूलन और नवाचार के नए अवसर प्रदान करता है, वहीं ऊर्जा मांग, बुनियादी ढांचे की क्षमता और नीतिगत तैयारियों से जुड़े जोखिमों पर भी गंभीरता से विचार करना होगा। श्री मुकेश पुंड ने उभरते एआई प्रतिमानों को रेखांकित करते हुए बताया कि अगली पीढ़ी की प्रौद्योगिकियां, अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र और डेटा-संचालित नवाचार कृत्रिम बुद्धिमत्ता के भविष्य को आकार दे रहे हैं।

“ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में एआई के मार्ग: अवसर और चुनौतियां” विषय पर आयोजित उच्च स्तरीय पैनल चर्चा की अध्यक्षता डॉ. अखिलेश गुप्ता ने की। सह-अध्यक्ष के रूप में डॉ. नरेश कुमार और संचालक के रूप में डॉ. अलेक्जेंडर एम. स्टेपनोव उपस्थित रहे। पैनल में डॉ. चारू वर्मा, डॉ. अमित कुमार, श्री आशुतोष मौर्य, डॉ. वेंकट रामा रेड्डी कुंतला, डॉ. वैलेंटीन एस. स्टारिकोव, डॉ. पावेल पी. लिसित्सिन, प्रोफेसर अनिर्बन चक्रबोर्ती और डॉ. विनायक सहित अनेक विशेषज्ञों ने भाग लिया। चर्चा के दौरान नीति निर्माण, तकनीकी क्षमता, संस्थागत तत्परता और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर बहुविषयक दृष्टिकोण सामने आए। विशेषज्ञों ने जिम्मेदार तैनाती, अंतरविषयक अनुसंधान और बहु-हितधारक सहभागिता को टिकाऊ ऊर्जा परिवर्तन के लिए आवश्यक बताया।

समापन सत्र की अध्यक्षता डॉ. नतालिया ट्रेगुबोवा ने की, जिसमें दिन भर की चर्चाओं से प्राप्त प्रमुख निष्कर्षों को प्रस्तुत किया गया। डॉ. कस्तूरी मंडल ने मुख्य अंतर्दृष्टियों और अनुशंसाओं का सारांश रखा, जिसके बाद निदेशक ने अपने समापन संबोधन में सतत विकास और ऊर्जा सुरक्षा के लिए मानव-केंद्रित एआई तथा विज्ञान-आधारित नीति को आगे बढ़ाने के प्रति संस्थान की निरंतर प्रतिबद्धता दोहराई।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »