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रिश्तों को फिर से रंगने का पर्व है होली

04 मार्च होली के अवसर पर

फाल्गुन की बयार जब हवा में घुलती है तो केवल अबीर-गुलाल ही नहीं उड़ते, मन के भीतर जमी परतें भी हल्की होने लगती हैं। होली को अक्सर हम रंग खेलने, पकवान बनाने और हुड़दंग तक सीमित कर देते हैं, जबकि यह पर्व हमारे सामाजिक और पारिवारिक जीवन की गहराइयों से जुड़ा हुआ है। यह केवल चेहरे रंगने का अवसर नहीं, बल्कि संबंधों में आई कड़वाहट को धोकर उन्हें फिर से प्रेम के रंग में रंगने का सुअवसर है। भारतीय संस्कृति में होली का उल्लेख प्राचीन काल से मिलता है। पौराणिक कथा के अनुसार भक्त प्रह्लाद की भक्ति और सत्य की विजय के प्रतीक रूप में होलिका दहन किया जाता है। यह कथा हमें याद दिलाती है कि अहंकार और द्वेष का अंत निश्चित है, जबकि विश्वास और प्रेम की जीत होती है। अगले दिन रंगों की होली मानो उसी विजय का उत्सव है एक नई शुरुआत का संकेत। होली की यही विशेषता इसे अन्य पर्वों से अलग बनाती है। दीपावली में हम दीप जलाकर अंधकार दूर करते हैं, रक्षाबंधन पर रक्षा का वचन देते हैं, लेकिन होली पर हम स्वयं आगे बढ़कर दूसरे के मन तक पहुँचने की कोशिश करते हैं। इस दिन सामाजिक औपचारिकताएँ कुछ हद तक ढीली पड़ जाती हैं। जिनसे साल भर बातचीत नहीं होती, उनके दरवाजे भी खुल जाते हैं। लोग कहते हैं “बुरा न मानो होली है।” इस एक वाक्य में छिपा संदेश है कि मन की मैल छोड़ दीजिए, जीवन छोटा है, रिश्ते बड़े हैं। आज के समय में जब भागदौड़ और प्रतिस्पर्धा ने रिश्तों को नाजुक बना दिया है, छोटी-छोटी बातों पर मनमुटाव होना सामान्य हो गया है। परिवारों में भाई-भाई के बीच, मित्रों में, पड़ोसियों में, यहाँ तक कि सहकर्मियों के बीच भी गलतफहमियाँ पनप जाती हैं। कई बार बात इतनी बढ़ जाती है कि संवाद पूरी तरह बंद हो जाता है। मन की गाँठें जितनी देर तक बँधी रहती हैं, उतनी ही कसती जाती हैं।

ऐसे में होली हमें एक सामाजिक बहाना देती है माफी माँगने का, माफ करने का और आगे बढ़ने का। रंगों का भी अपना मनोविज्ञान है। लाल रंग ऊर्जा और प्रेम का प्रतीक है, पीला स्नेह और विश्वास का, हरा आशा का, नीला गहराई और स्थिरता का। जब हम किसी को रंग लगाते हैं, तो अनजाने में ही हम उसे सकारात्मक भावनाओं से सराबोर करने की कोशिश करते हैं। गले मिलना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक स्पर्श है जो दूरी को कम करता है। कई बार एक सच्चा आलिंगन उन शब्दों से अधिक प्रभावी होता है, जिन्हें हम वर्षों से कह नहीं पाए। होली हमें यह भी सिखाती है कि संबंधों में अहंकार सबसे बड़ा शत्रु है। “पहले वह आए”, “पहले वह माफी माँगे” इसी प्रतीक्षा में अनेक रिश्ते टूट जाते हैं। लेकिन यदि कोई एक कदम आगे बढ़ जाए, तो दूरी मिट सकती है। होली ऐसा अवसर है जब हम अपने मन के भीतर झाँककर पूछ सकते हैं क्या यह दूरी वास्तव में इतनी बड़ी है कि उसे पाटा न जा सके? क्या एक रंग की चुटकी से, एक मुस्कान से, एक सच्चे ‘माफ कीजिए’ से सब कुछ सुधर नहीं सकता? सामाजिक दृष्टि से भी होली का महत्व अत्यंत व्यापक है। गाँवों और कस्बों में लोग टोली बनाकर एक-दूसरे के घर जाते हैं। शहरों की कालोनियों में सामूहिक होली मिलन कार्यक्रम होते हैं। ये आयोजन केवल मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता के लिए होते हैं। अलग-अलग वर्ग, आयु और विचारधाराओं के लोग एक ही रंग में रंगकर समानता का अनुभव करते हैं। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि हमारी पहचान केवल जाति, धर्म, पद या प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि मानवता से है। हालाँकि, बदलते समय के साथ होली के स्वरूप में कुछ विकृतियाँ भी आई हैं अत्यधिक शराब सेवन, जबरन रंग लगाना, पानी की बर्बादी या पर्यावरण को हानि पहुँचाने वाले रासायनिक रंगों का उपयोग। ये प्रवृत्तियाँ होली की मूल भावना के विपरीत हैं। यदि हम सच में इस पर्व को रिश्तों की मरम्मत का माध्यम बनाना चाहते हैं, तो हमें इसे मर्यादा और संवेदनशीलता के साथ मनाना होगा। किसी की इच्छा के विरुद्ध रंग लगाना या अभद्र व्यवहार करना संबंधों को सुधारने के बजाय और बिगाड़ सकता है। इस वर्ष जब होली का पर्व आए, तो हम केवल नए कपड़े और पिचकारी ही न खरीदें, बल्कि अपने भीतर की कठोरता को भी छोड़ने का संकल्प लें। जिनसे महीनों या वर्षों से बात नहीं हुई, उन्हें एक संदेश भेजें “आइए, इस बार होली पर गिले-शिकवे भुला दें।”

यदि संभव हो तो स्वयं उनके घर जाएँ, दरवाजा खटखटाएँ और मुस्कुराते हुए कहें “हैप्पी होली!” यकीन मानिए, कई बार सामने वाला भी उसी क्षण की प्रतीक्षा में होता है, बस पहल करने का साहस नहीं जुटा पाता।परिवारों में यह पर्व बच्चों के लिए भी सीख का अवसर हो सकता है। उन्हें बताइए कि रंग केवल बाहरी नहीं, भीतरी भी होते हैं। उन्हें सिखाइए कि मित्रता निभाने के लिए कभी-कभी झुकना पड़ता है। यदि बचपन से ही वे यह सीख लें कि मन की कड़वाहट को समय रहते धो देना चाहिए, तो भविष्य के रिश्ते अधिक मजबूत बनेंगे। अंततः, होली हमें जीवन का एक बड़ा दर्शन देती है सब कुछ अस्थायी है, रंग भी और रंजिशें भी। जो स्थायी है, वह है प्रेम और अपनापन। जब हम किसी के चेहरे पर रंग लगाते हैं, तो वास्तव में हम उसके जीवन में अपनी उपस्थिति का रंग भरते हैं। यह रंग यदि सच्चे मन से लगाया जाए, तो दो दिन में फीका नहीं पड़ता, बल्कि स्मृतियों में लंबे समय तक चमकता रहता है आइए, इस बार होली को केवल उत्सव नहीं, अवसर बनाएं। अवसर मन की गाँठें खोलने का, संबंधों को फिर से सँवारने का और जीवन को प्रेम के रंगों से सराबोर करने का। क्योंकि अंततः, होली केवल रंग खेलने का पर्व नहीं रिश्तों को फिर से रंगने का पर्व है।

डा. पंकज भारद्वाज 
डा. पंकज भारद्वाज 
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