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भारतीय त्योहार होली : रंग, राग और रस की अद्भुत परंपरा

04 मार्च होली के अवसर पर

भारत की सांस्कृतिक विरासत में यदि कोई ऐसा पर्व है जो समूचे समाज को रंग, उमंग और अनंत उल्लास से सराबोर कर देता है, तो वह है होली रंग रंगीली मस्ती और पारंपरिक त्योहार। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह उत्सव केवल रंग खेलने का दिन नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, आध्यात्मिक संदेश, कृषि-चक्र की पूर्णता और लोकजीवन की मस्ती का विराट उत्सव है।​

होली भारतीय जीवन-दर्शन की उस सहजता का प्रतीक है, जहाँ जीवन के सारे भेदभाव रंगों में घुलकर एकाकार हो जाते हैं।होली का मूल आधार होली के साथ जुड़ी प्रह्लाद- होलिका कथा है। असुर राज हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद को ईश्वर-भक्ति से रोकने के लिए अनेक यातनाएँ दीं। अंततः बहन होलिका को अग्नि में बैठाकर उसे जलाने का प्रयास किया गया, किंतु दैवी कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका भस्म हो गई। यह प्रसंग अधर्म पर धर्म की विजय तथा अहंकार पर भक्ति की जीत का शाश्वत संदेश देता है।

होली का एक अत्यंत रसमय स्वरूप श्रीकृष्ण और राधा रानी से भी जुड़ा है।वृंदावन और बरसाना की लट्ठमार होली विश्वप्रसिद्ध है। यहाँ की फाग, रसिया और रंगोत्सव में प्रेम, चंचलता और भक्ति का अनोखा संगम दिखाई देता है।ब्रज की फाग में गूंजते रहते हैं गीत, जैसे –

भारतीय साहित्य में होली का वर्णन अत्यंत समृद्ध है।सूरदास ने ब्रज की होली को भक्ति-रस में पिरोया।कबीर ने रंग को आत्मिक अनुभूति से जोड़ा – “मन लागो मेरो यार फकीरी में…”!!  रामधारी सिंह दिनकर ने भारतीय संस्कृति की ऊर्जा को अपने काव्य में प्रखर रूप दिया।होली का रंग केवल बाहरी नहीं, बल्कि मन के भीतर छिपी उदासी को भी धो देता है।

होली का संबंध केवल परंपरा से नहीं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था से भी है।रंग और पिचकारी का व्यापार मिठाई (गुझिया, मालपुआ) की बिक्री वस्त्र बाजार में चहल-पहल पर्यटन स्थलों पर भीड़ यह पर्व छोटे व्यापारियों के लिए विशेष अवसर लेकर आता है। ग्रामीण बाजारों में भी उत्सव से पूर्व आर्थिक सक्रियता बढ़ जाती है।

फाल्गुन की मादक बयार, आम्र-मंजरियों की सुगंध और कोयल की कूक के साथ होली का उल्लास प्रकृति में भी दिखाई देता है।छत्तीसगढ़ी फाग में अक्सर ऐसे बोल सुनाई देते हैं—“फागुन आय रे, रंग बरसाए रे…”ढोलक, झांझ, मंजीरा और लोकनृत्य ये सब मिलकर जीवन को रसपूर्ण बना देते हैं।

आधुनिक संदर्भ में होली आज के समय में होली का स्वरूप कुछ बदला है।रासायनिक रंगों का उपयोग,जल की अत्यधिक बर्बादी

शोर-प्रदूषण । इसलिए आवश्यकता है कि हम पर्यावरण-संरक्षण को ध्यान में रखते हुए प्राकृतिक रंगों से, सीमित जल प्रयोग के साथ और सौहार्दपूर्ण वातावरण में होली मनाएँ। 

होली हमें सिखाती है,मन के वैर-भाव को जलाना रिश्तों में रंग भरना समाज में समरसता बढ़ाना जीवन को उत्सव की तरह जीना

यह पर्व बताता है कि जीवन क्षणभंगुर है, इसलिए उसे प्रेम, हँसी और अपनत्व से सजाना ही सच्चा उत्सव का एक अभिन्न परिचायक है। होली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। इसमें धर्म, दर्शन, लोकजीवन, कृषि, अर्थव्यवस्था और साहित्य सभी का समन्वय है।जब फागुन की हवा में रंग उड़ते हैं और ढोलक की थाप पर कदम थिरकते हैं, तब प्रतीत होता है कि समूचा भारत एक ही रंग में रंग गया है।प्रेम और उल्लास के रंग में।आइए, इस होली पर हम बाहरी रंगों के साथ-साथ अपने अंतर्मन को भी प्रेम, सद्भाव और भाईचारे के रंग से रंग दें। रंगों के इस महापर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।  

     

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