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न्यायधानी बिलासपुर में दिखने लगा पेयजल संकट नगर वासी हुए परेशान

ठंड के मौसम की जैसी जैसे बिदाई हो रही है ठीक उसी रफ्तार से गर्मी ने भी अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं। इसका आलम यह है कि फरवरी माह अभी आधा ही बीता है कि शहर में पेयजल संकट की आहट दिखने लगी है। शहर के अनेक मोहल्लों में पेयजल की किल्लत से नागरिक परेशान होने लगे हैं। वैसे भी शहर में हर साल गर्मी के मौसम में जलसंकट गहराता जाता रहा है। पिछले वर्ष 30 से 40 बोरवेल सूख गए थे, जिसके चलते शहर की आधी आबादी को टैंकरों के भरोसे पानी लेना पड़ा। नगर निगम के पास 52 पानी टैंक और 988 पंप होने के बावजूद गर्मी में नियमित जलापूर्ति सुनिश्चित नहीं हो पाती।तालापारा, मगरपारा, चिंगराजपारा, जरहाभाठा, हेमूनगर और देवरीखुर्द जैसे इलाकों में हर साल गंभीर पेयजल संकट खड़ा हो जाता है।

शहर का जलस्तर सेमी क्रिटिकल जोन में

विशेषज्ञों के अनुसार बिलासपुर जिला क्रिटिकल व शहर सेमी-क्रिटिकल भूजल जोन में आता है। शहर में प्रभावी रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम के अभाव में हर मानसून लाखों लीटर बारिश का पानी नालों में बह जाता है, जिससे भूजल स्तर लगातार गिर रहा है। 11 सदस्यीय निगरानी समिति बनी, अमल कमजोर भूजल संरक्षण के लिए पिछले वर्ष शासन ने 11 सदस्यीय निगरानी समिति गठित की थी, जिसे रेन वाटर हार्वेस्टिंग के नियमों के पालन की जिम्मेदारी दी गई थी। हालांकि जमीनी स्तर पर इसका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो सका। पिछले पांच वर्षों में बेहतराई, खमतराई और मोपका क्षेत्रों में भूजल स्तर करीब 3 मीटर तक गिरा है, जबकि सरकंडा क्षेत्र में लगभग 2 मीटर की गिरावट दर्ज की गई है। इससे जल रिचार्ज की आवश्यकता और बढ़ गई है।

इंजेक्शन वेल तकनीक से होगा भूजल रिचार्ज

गिरते भूजल स्तर को देखते हुए नगर निगम पहली बार इंजेक्शन वेल (वी-टेक्नोलॉजी यूनिट) तकनीक लागू करने जा रहा है। पं. दीनदयाल उपाध्याय भूजल संवर्धन मिशन (शहरी) योजना के तहत बिलासपुर नगर निगम को 20 इंजेक्शन वेल की मंजूरी मिली है।गूगल मैपिंग और सर्वे में शहर के 27 जलभराव बिंदुओं की पहचान की गई थी, जिनमें से 20 स्थानों पर इंजेक्शन वेल लगाए जाएंगे। प्रत्येक यूनिट के लिए 6.22 लाख रुपए स्वीकृत हुए हैं। कुल 1.24 करोड़ रुपए की लागत से यह परियोजना लागू होगी। प्रदेशभर में 302 इंजेक्शन वेल स्वीकृत किए गए हैं, जिनमें बिलासपुर को 20 और रायपुर नगर निगम को 30 यूनिट मिले हैं।

क्या है इंजेक्शन वेल?

पिटः बारिश का पानी इकट्ठा करने के लिए गहरा गड्डा फिल्टर सिस्टमः पानी को साफ कर जमीन में जाने योग्य बनाता है।

पाइपः फिल्टर से जुड़कर पानी को नीचे पहुंचाता है वेल (बोर): साफ पानी को भूजल स्तर में समाहितो करता है। निगम के अनुसार, मेंटेनेंस और फिल्टर चोक होने पर मरम्मत की जिम्मेदारी नगर निगम की होगी। शुरुआती रखरखाव एजेंसी करेगी, बाद में निगम की टीम संभालेगी। रेन वाटर हार्वेस्टिंग की स्थिति चिंताजनक 1600 वर्गफीट से अधिक क्षेत्रफल वाले भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग अनिवार्य है, लेकिन शहर के लगभग 50 हजार भवनों में से केवल 3234 में ही यह सिस्टम स्थापित है। इसका सीधा असर भूजल स्तर पर पड़ रहा है।

इंजेक्शन वॉल का लाभ मानसून के बाद: तब तक नगरवासी करें क्या..?

इस गर्मी फिर बढ़ेगी परेशानी निगम अधिकारियों के अनुसार इंजेक्शन वेल का काम गर्मी में शुरू होगा, लेकिन इसका लाभ मानसून के बाद ही मिल सकेगा। आउटर क्षेत्र में 28 करोड़ रुपए की लागत से प्रस्तावित पाइपलाइन और पानी टंकी निर्माण कार्य भी गर्मी तक पूरा नहीं होगा। सिरगिट्टी में 10 करोड़ की लागत से अमृत मिशन विस्तार कार्य भी अधूरा रहेगा। ऐसे में संकेत स्पष्ट हैं कि इस गर्मी भी शहरवासियों को टैंकर के सहारे रहना पड़ सकता है। मगरपारा, तालापारा, जरहाभाठा और चिंगराजपारा जैसे क्षेत्रों में फिर से पेयजल संकट गहराने की आशंका जताई जा रही है।

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