NEW English Version

शिक्षा में एक नये युग एवं शैक्षिक क्रांति की आहट

– ललित गर्ग –

आज पूरी दुनिया शिक्षा के एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां ज्ञान का विस्तार तो अभूतपूर्व हुआ है, लेकिन जीवन मूल्यों का क्षरण भी उतनी ही तेजी से दिखाई देता है। विज्ञान और तकनीक ने मानव जीवन को सुविधासंपन्न बनाया है, लेकिन मानसिक तनाव, हिंसा, प्रतिस्पर्धा, नैतिक संकट और मानवीय संवेदनाओं के क्षय जैसी चुनौतियां भी बढ़ी हैं। शिक्षा के क्षेत्र में यह प्रश्न लगातार गूंज रहा है कि क्या वर्तमान शिक्षा व्यवस्था वास्तव में मनुष्य का निर्माण कर रही है या केवल पेशेवर और उपभोक्तावादी समाज का निर्माण कर रही है? ऐसे समय में जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा द्वारा प्रारंभ की गई आचार्य महाश्रमण इंटरनेशनल स्कूल की योजना एक नई आशा, नई दृष्टि और नए शैक्षणिक दर्शन के रूप में सामने आई है। यह केवल विद्यालयों की स्थापना की योजना नहीं है, बल्कि शिक्षा को उसके मूल उद्देश्य से जोड़ने का एक महाअभियान है। महासभा ने देशभर में लगभग सौ विद्यालयों की स्थापना का लक्ष्य निर्धारित किया है। वर्तमान में राजस्थान के श्रीडूंगरगढ़, गंगाशहर और नोखा तथा गुजरात के भुज में विद्यालयों का निर्माण और शैक्षणिक गतिविधियां तीव्र गति से संचालित हैं। इन विद्यालयों की स्थापना के पीछे केवल आधुनिक शिक्षण संस्थान खड़े करने की भावना नहीं है, बल्कि ऐसी शिक्षा संस्कृति विकसित करने का संकल्प है जो ज्ञान के साथ संस्कार, विज्ञान के साथ विवेक और सफलता के साथ संवेदनशीलता का समन्वय स्थापित कर सके।
तेरापंथ धर्मसंघ की शिक्षा-दृष्टि सदैव व्यापक, मानवीय और दूरदर्शी रही है। इस परंपरा में शिक्षा को केवल रोजगार प्राप्ति का माध्यम नहीं माना गया, बल्कि व्यक्ति के समग्र विकास का आधार समझा गया है। तेरापंथ के आचार्यों ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को भीतर से समृद्ध बनाना है। यदि शिक्षा केवल बुद्धि को विकसित करे और हृदय को उपेक्षित छोड़ दे, तो वह अधूरी शिक्षा है। यदि वह ज्ञान तो दे लेकिन चरित्र न बनाए, तो वह समाज के लिए संकट भी उत्पन्न कर सकती है। आचार्य श्री तुलसी ने इस आवश्यकता को बहुत पहले पहचान लिया था। उन्होंने अणुव्रत आंदोलन के माध्यम से नैतिकता को सामाजिक जीवन के केंद्र में स्थापित करने का प्रयास किया। उनका मानना था कि व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का वास्तविक विकास नैतिक आधार पर ही संभव है। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में नैतिक मूल्यों को स्थापित करने के लिए नैतिक पाठमाला और नैतिक शिक्षा परीक्षाओं का अभिनव प्रयोग प्रारंभ किया। उस समय यह केवल एक शैक्षणिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि एक सामाजिक परिवर्तन का अभियान था। लाखों विद्यार्थियों ने इन कार्यक्रमों के माध्यम से सत्य, अहिंसा, अनुशासन, संयम, ईमानदारी और कर्तव्यपरायणता जैसे मूल्यों को अपने जीवन में अपनाने की प्रेरणा प्राप्त की।

आचार्य महाप्रज्ञ ने इस विचारधारा को और अधिक वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक रूप प्रदान किया। उन्होंने जीवन विज्ञान के रूप में एक ऐसा शैक्षणिक मॉडल प्रस्तुत किया जिसमें शिक्षा को शरीर, मन, भावना और चेतना के विकास से जोड़ा गया। जीवन विज्ञान ने विद्यार्थियों को केवल परीक्षा में सफल होने की तैयारी नहीं दी, बल्कि तनावमुक्त जीवन, भावनात्मक संतुलन, आत्मानुशासन और सकारात्मक सोच की दिशा भी प्रदान की। आज जब दुनिया मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक शिक्षा पर गंभीरता से विचार कर रही है, तब यह अनुभव होता है कि जीवन विज्ञान जैसी अवधारणाएं अपने समय से बहुत आगे की सोच थीं। आचार्य महाश्रमण ने इस समूची परंपरा को एक नई ऊंचाई प्रदान की है। उनका व्यक्तित्व ज्ञान, साधना, अनुशासन, अहिंसा और मानवीय संवेदनाओं का अद्भुत समन्वय है। उनकी दृष्टि में शिक्षा केवल मस्तिष्क के विकास तक सीमित नहीं रह सकती। उसे मनुष्य के भीतर छिपी नैतिक, आध्यात्मिक और मानवीय संभावनाओं को भी जागृत करना होगा। इसी कारण उनके नाम पर स्थापित आचार्य महाश्रमण इंटरनेशनल स्कूल केवल आधुनिक शिक्षा प्रदान करने वाले संस्थान नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि देने वाले केंद्र बनने की क्षमता रखते हैं।

आचार्य महाश्रमण इंटरनेशनल स्कूल का मूल मंत्र-“ज्ञान, मूल्य और चरित्र” है जो वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता को अभिव्यक्त करता है। आज अधिकांश शैक्षणिक संस्थानों में ज्ञान और कौशल पर तो पर्याप्त ध्यान दिया जाता है, लेकिन मूल्य और चरित्र का पक्ष अपेक्षाकृत कमजोर दिखाई देता है। परिणामस्वरूप समाज में बौद्धिक प्रगति तो होती है, परंतु नैतिक और मानवीय संकट भी बढ़ते जाते हैं। आचार्य महाश्रमण इंटरनेशनल स्कूल इस असंतुलन को दूर करने का एक सार्थक एवं प्रभावी प्रयास साबित होगा। यहां शिक्षा का लक्ष्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि ज्ञान को विवेक में और विवेक को चरित्र में रूपांतरित करना है। भारत की नई शिक्षा नीति 2020 भी इसी प्रकार की समग्र शिक्षा की आवश्यकता पर बल देती है। नई शिक्षा नीति में बहुआयामी विकास, जीवन कौशल, भारतीय ज्ञान परंपरा, मूल्य आधारित शिक्षा और समग्र व्यक्तित्व निर्माण को विशेष महत्व दिया गया है। किंतु किसी भी नीति की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसे व्यवहार में उतारने वाले संस्थान कितने सक्षम हैं। आचार्य महाश्रमण इंटरनेशनल स्कूल इस दृष्टि से नई शिक्षा नीति के जीवंत और प्रभावी मॉडल बन सकते हैं। यहां आधुनिक पाठ्यक्रम, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तकनीकी दक्षता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की तैयारी के साथ-साथ नैतिकता, आत्मानुशासन, सह-अस्तित्व और आध्यात्मिक चेतना को भी समान महत्व दिया जाता है।

जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के अध्यक्ष और प्रख्यात उद्योगपति महेंद्र नाहटा के अनुसार इस परियोजना को महासभा की प्रमुख शैक्षणिक गतिविधि के रूप में विकसित किया है। इन स्कूलों के उद्देश्य एवं उनकी दूरदृष्टि इस योजना को सामान्य विद्यालय परियोजना से कहीं अधिक व्यापक बनाती है। नाहटा का विश्वास है कि आने वाले समय में केवल तकनीकी ज्ञान पर्याप्त नहीं होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन और डिजिटल तकनीक के युग में मशीनें अनेक कार्य कर सकेंगी, लेकिन करुणा, संवेदनशीलता, नैतिक निर्णय, मानवीय संबंध और आत्मिक संतुलन जैसे गुण केवल मनुष्य ही विकसित कर सकता है। इसलिए शिक्षा को मस्तिष्क के साथ-साथ हृदय और आत्मा को भी शिक्षित करना होगा। महेंद्र नाहटा का यह विचार अत्यंत महत्वपूर्ण है कि ये विद्यालय भारत की नई शिक्षा नीति को आध्यात्मिक दृष्टि से समृद्ध करने का माध्यम बन सकते हैं। यहां आध्यात्मिकता का अर्थ किसी धार्मिक संकीर्णता से नहीं है, बल्कि आत्म-जागरूकता, नैतिकता, सहिष्णुता, मानवीय एकता और आंतरिक संतुलन से है। यह दृष्टिकोण आज के वैश्विक समाज की भी आवश्यकता है, क्योंकि विश्व के अनेक विकसित देशों में शिक्षा सुधार की चर्चाओं का केंद्र मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक उत्तरदायित्व और मूल्य आधारित जीवन बनता जा रहा है।

आज शिक्षा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह विद्यार्थियों को सफल तो बना रही है, लेकिन संतुष्ट नहीं; बुद्धिमान तो बना रही है, लेकिन संवेदनशील नहीं; सक्षम तो बना रही है, लेकिन चरित्रवान नहीं। परिणामस्वरूप समाज में तनाव, अवसाद, हिंसा, असहिष्णुता और सामाजिक विघटन जैसी समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। ऐसे समय में शिक्षा के ऐसे मॉडल की आवश्यकता है जो मनुष्य को केवल प्रतिस्पर्धा के लिए नहीं, बल्कि जीवन के लिए तैयार करे। जो उसे केवल करियर नहीं, बल्कि जीवन का उद्देश्य भी प्रदान करे। जो उसे केवल कमाना नहीं, बल्कि जीना भी सिखाए। आचार्य महाश्रमण इंटरनेशनल स्कूल इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल हैं। यहां विज्ञान और अध्यात्म, आधुनिकता और संस्कृति, तकनीक और नैतिकता, प्रतिस्पर्धा और सहयोग, सफलता और संवेदनशीलता के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया जायेगा। यह दृष्टिकोण भविष्य की शिक्षा का आधार बन सकता है। दुनिया भर में आज ऐसी शिक्षा की खोज हो रही है जो विद्यार्थियों को केवल ज्ञानवान नहीं, बल्कि विवेकवान और उत्तरदायी नागरिक भी बना सके। भारतीय शिक्षा परंपरा सदियों से इसी आदर्श की पक्षधर रही है। प्राचीन गुरुकुलों से लेकर आधुनिक आध्यात्मिक चिंतन तक, भारतीय दृष्टि ने शिक्षा को मनुष्य के समग्र विकास का माध्यम माना है।
यदि आचार्य महाश्रमण इंटरनेशनल स्कूलों की यह योजना अपने निर्धारित स्वरूप में विकसित होकर आगे बढ़ती है, तो यह केवल भारत की शिक्षा व्यवस्था के लिए नहीं, बल्कि विश्व शिक्षा जगत के लिए भी एक प्रेरक मॉडल सिद्ध हो सकती है। जिस प्रकार कुछ देशों ने शिक्षा के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है, उसी प्रकार भारत मूल्य-आधारित समग्र शिक्षा का वैश्विक मॉडल प्रस्तुत कर सकता है। यह मॉडल बताएगा कि शिक्षा केवल ज्ञान का संचय नहीं, बल्कि जीवन का निर्माण है; केवल सूचना का विस्तार नहीं, बल्कि चेतना का विकास है; केवल करियर की तैयारी नहीं, बल्कि चरित्र की साधना है। कवास्तव में आचार्य महाश्रमण इंटरनेशनल स्कूलों की स्थापना को केवल एक शैक्षणिक परियोजना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह आचार्य तुलसी के अणुव्रत आंदोलन, आचार्य महाप्रज्ञ के जीवन विज्ञान और आचार्य महाश्रमण की अहिंसामूलक एवं मानवीय दृष्टि का सृजनात्मक विस्तार है। यह शिक्षा को पुनः उसके मूल उद्देश्य से जोड़ने का प्रयास है। यह एक ऐसे भविष्य की परिकल्पना है जहां विद्यालय केवल डिग्री प्रदान करने वाले संस्थान नहीं होंगे, बल्कि मानवता के श्रेष्ठ भविष्य का निर्माण करने वाले केंद्र होंगे। यदि यह सपना साकार होता है तो न केवल भारत की शिक्षा व्यवस्था को नई दिशा मिलेगी, बल्कि विश्व को भी शिक्षा का एक ऐसा मानवीय, नैतिक और आध्यात्मिक मॉडल प्राप्त होगा जो आने वाली पीढ़ियों को अधिक बुद्धिमान, अधिक संवेदनशील और अधिक मानवीय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यही इस महान योजना का वास्तविक महत्व, उद्देश्य और भविष्य है।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
Book Showcase

Best Selling Books

Shri Durgasaptashati Sachitra

By Gorakhpur Gita Press

₹100

Book 2 Cover

Stop Letting Everything Affect You

By Daniel Chidiac

₹190

Truth without apology

By Acharya Prashant

₹240

30 Days to Better English

By Norman Lewis

₹199

Translate »