केंद्रीय युवा मामले एवं खेल मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने डोपिंग के खिलाफ भारत की नीति को और अधिक कठोर बनाने के संकेत देते हुए कहा है कि सरकार प्रतिबंधित पदार्थों की तस्करी और सेवन में शामिल व्यक्तियों के विरुद्ध आपराधिक प्रावधान लागू करने की दिशा में काम कर रही है। उन्होंने यह बात विश्व डोपिंग रोधी एजेंसी के ग्लोबल एंटी-डोपिंग इंटेलिजेंस एंड इन्वेस्टिगेशन नेटवर्क (GAIIN) के मुख्य सम्मेलन के उद्घाटन अवसर पर कही।

डॉ. मांडविया ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि डोपिंग अब केवल व्यक्तिगत अनुशासनहीनता का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह एक संगठित और बहुराष्ट्रीय आपराधिक गतिविधि का रूप ले चुका है। ऐसे में इससे निपटने के लिए वैश्विक स्तर पर समन्वित कार्रवाई आवश्यक है। उन्होंने कहा कि खुफिया जानकारी और जांच आधारित दृष्टिकोण ही इस चुनौती से प्रभावी ढंग से निपटने का माध्यम बन सकता है।
वैश्विक सहयोग पर जोर
सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता पर बल देते हुए मंत्री ने कहा कि एक मजबूत वैश्विक नेटवर्क डोपिंग से जुड़े अपराधों की पहचान और नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उन्होंने कहा कि यह मंच विभिन्न देशों, एजेंसियों और विशेषज्ञों को एक साझा रणनीति विकसित करने का अवसर प्रदान करता है।
विटॉल्ड बांका ने भी अपने संबोधन में इस बात को रेखांकित किया कि डोपिंग विरोधी प्रयासों में कानून प्रवर्तन एजेंसियों और राष्ट्रीय संगठनों के बीच सहयोग अनिवार्य है। उन्होंने बताया कि WADA का इंटेलिजेंस एवं जांच मॉडल साझेदारी आधारित है, जिसमें इंटरपोल और यूरोपोल जैसी संस्थाओं का समर्थन शामिल है।
कानूनी ढांचे को सुदृढ़ करने की दिशा में कदम
डॉ. मांडविया ने कहा कि भारत ने डोपिंग के खिलाफ अपने कानूनी ढांचे को लगातार मजबूत किया है। उन्होंने राष्ट्रीय डोपिंग विरोधी अधिनियम, 2022 को एक सशक्त वैधानिक व्यवस्था बताया और कहा कि प्रस्तावित संशोधन (2025) के माध्यम से इसे वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाया जा रहा है।
उन्होंने संकेत दिया कि आने वाले समय में डोपिंग से जुड़े मामलों में केवल अनुशासनात्मक कार्रवाई ही नहीं, बल्कि आपराधिक दंड भी लागू किया जा सकता है, जिससे इस समस्या पर प्रभावी नियंत्रण संभव होगा।
रोकथाम और जागरूकता पर विशेष ध्यान
मंत्री ने स्पष्ट किया कि केवल परीक्षण और दंड पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि रोकथाम सबसे प्रभावी रणनीति है। उन्होंने कहा कि सही समय पर सही जानकारी उपलब्ध कराने से खिलाड़ी अनजाने में होने वाले उल्लंघनों से बच सकते हैं।
इस दिशा में राष्ट्रीय डोप रोधी एजेंसी द्वारा बहुस्तरीय जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, जिनमें कार्यशालाएं, सेमिनार, डिजिटल अभियान और विशेष प्रशिक्षण शामिल हैं। दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए भी विशेष शैक्षणिक मॉड्यूल विकसित किए गए हैं।
तकनीकी हस्तक्षेप और वैज्ञानिक दृष्टिकोण
डॉ. मांडविया ने “अपनी दवा को जानें” मोबाइल एप्लिकेशन का उल्लेख करते हुए बताया कि यह खिलाड़ियों को यह जांचने में मदद करता है कि उनकी दवाओं में कोई प्रतिबंधित पदार्थ तो नहीं है। इसके अलावा, दूषित सप्लीमेंट्स की समस्या से निपटने के लिए उन्नत परीक्षण सुविधाओं के विकास पर भी जोर दिया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि भारत डोपिंग जांच क्षमता को बढ़ाने के लिए WADA मानकों के अनुरूप नई प्रयोगशालाओं की स्थापना की दिशा में कार्य कर रहा है।
जांच और परीक्षण में उल्लेखनीय प्रगति
डोपिंग नियंत्रण के क्षेत्र में भारत की प्रगति का उल्लेख करते हुए मंत्री ने बताया कि वर्ष 2019 में जहां लगभग 4,000 परीक्षण किए गए थे, वहीं हाल के वर्षों में यह संख्या बढ़कर लगभग 8,000 तक पहुंच गई है। इसके साथ ही प्रतिकूल विश्लेषणात्मक निष्कर्षों में भी गिरावट आई है—जो 2019 में 5.6 प्रतिशत से घटकर अब 2 प्रतिशत से कम हो गई है।
अनंत कुमार ने कहा कि भारत अब जोखिम-आधारित और प्रभावशीलता-आधारित दृष्टिकोण की ओर बढ़ रहा है, जिसमें केवल परीक्षण ही नहीं बल्कि सूचना, शिक्षा और समन्वय को भी प्राथमिकता दी जा रही है।
संस्थागत समन्वय और साझेदारी
खेल सचिव हरि रंजन राव ने बताया कि सरकार ने NADA की संस्थागत क्षमता को मजबूत करने के लिए विभिन्न एजेंसियों के साथ समन्वय बढ़ाया है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण और केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन जैसे निकायों के साथ साझेदारी के माध्यम से दूषित और अनियमित पदार्थों के जोखिम को कम करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
खेल नैतिकता और मूल्यों पर जोर
डॉ. मांडविया ने अपने संबोधन में खेलों के नैतिक पक्ष को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि खेल केवल प्रदर्शन का माध्यम नहीं, बल्कि अनुशासन, ईमानदारी और चरित्र निर्माण का भी आधार है। बढ़ती प्रतिस्पर्धा के दबाव के बीच खिलाड़ियों को सही दिशा में मार्गदर्शन देना आवश्यक है।