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अंक, अपेक्षा और अधूरा जीवन; एक सच्चाई

समाज के सामने कभी-कभी ऐसी खबरें (टीप :- कानपुर के समीप रतनपुर में पढ़ने वाली छात्रा का दसवीं की परीक्षा में अपेक्षा से कम अंक आने पर आत्महत्या) आती हैं जो केवल सूचना नहीं होतीं, बल्कि एक आईना बनकर हमारी सामूहिक सोच, प्राथमिकताओं और संवेदनाओं की पोल खोल देती हैं। एक 16 वर्षीय छात्रा द्वारा केवल अपेक्षा से कुछ कम अंक आने पर जीवन समाप्त कर लेना, किसी एक परिवार की त्रासदी भर नहीं है…..यह हमारे पूरे शिक्षा तंत्र, पारिवारिक दबाव और सामाजिक मानसिकता की विफलता का जीवंत प्रमाण है।

95% की चाह और 92% का परिणाम। यह अंतर केवल तीन अंकों का है, परंतु इसी तीन अंकों ने एक जिंदगी की पूरी संभावनाओं को निगल लिया। प्रश्न यह नहीं कि उस बच्ची ने ऐसा कदम क्यों उठाया; असली प्रश्न यह है कि हम उसे उस मानसिक स्थिति तक पहुंचने से रोक क्यों नहीं पाए?

आज का शैक्षिक वातावरण अंक-केन्द्रित हो गया है, जहाँ ज्ञान की गहराई से अधिक महत्व प्रतिशत के आंकड़ों को दिया जा रहा है। बच्चे अब सीखने के लिए नहीं, बल्कि “टॉप” करने के लिए पढ़ते हैं। माता-पिता की अपेक्षाएं, समाज की तुलना और प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ ये सब मिलकर बच्चों के कोमल मन पर एक अदृश्य दबाव बनाते हैं, जो कई बार असहनीय हो जाता है।

यह विडंबना ही है कि जिस उम्र में बच्चों को असफलताओं से सीखने और जीवन के उतार-चढ़ाव को समझने की जरूरत होती है, उसी उम्र में वे “पूर्णता” के बोझ तले दबकर टूट जाते हैं। हम उन्हें यह सिखाने में असफल रहे हैं कि जीवन एक परीक्षा के परिणाम से कहीं बड़ा है, और असफलता अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत का अवसर है।

इस घटना का सबसे पीड़ादायक पहलू यह है कि उस छात्रा ने अपने साथियों को पहले ही अपनी निराशा का संकेत दिया था। इसका अर्थ है कि कहीं न कहीं संवाद का अभाव था- कोई ऐसा नहीं था जिससे वह खुलकर अपने मन की बात कह पाती। यह हमारे पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों की उस दूरी को उजागर करता है, जहाँ हम साथ रहते हुए भी एक-दूसरे के भीतर झांक नहीं पाते।

सबसे पहले, हमें अपनी सोच बदलनी होगी। बच्चों को “अंकों की मशीन” नहीं, बल्कि संवेदनशील इंसान के रूप में देखना होगा। माता-पिता को चाहिए कि वे अपने सपनों का बोझ बच्चों पर न थोपें, बल्कि उनकी रुचियों और क्षमताओं को समझें।

शिक्षा व्यवस्था को भी अंकों की अंधी दौड़ से बाहर निकलकर मानसिक स्वास्थ्य, नैतिक शिक्षा और जीवन कौशल पर अधिक ध्यान देना होगा। स्कूलों में काउंसलिंग की व्यवस्था अनिवार्य होनी चाहिए, ताकि बच्चे अपने तनाव और भय को साझा कर सकें।

समाज को भी यह समझना होगा कि तुलना और प्रतिस्पर्धा की संस्कृति केवल सफलता नहीं, बल्कि कई बार विनाश भी लाती है। हमें “कितने प्रतिशत आए?” के बजाय “तुम खुश हो?” पूछने की आदत डालनी होगी।

हर बच्चे की जिंदगी अनमोल है ….किसी भी परीक्षा, किसी भी परिणाम से कहीं अधिक।अंक केवल कागज पर लिखे आंकड़े हैं, वे किसी की प्रतिभा, संघर्ष और भविष्य का पूर्ण मापदंड नहीं हो सकते।यदि हम समय रहते नहीं चेते, तो ऐसी खबरें केवल सुर्खियां नहीं रहेंगी, बल्कि हमारे समाज की स्थायी पीड़ा बन जाएंगी। अब वक्त है कि हम बच्चों को यह भरोसा दें!

तुम्हारी कीमत तुम्हारे अंकों से नहीं, तुम्हारे अस्तित्व से है।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
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