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बदलते समय में ‘घोड़े’—मेहनतकश इंसान की अनकही दास्तान

मज़दूर दिवस विशेष

दरवाजे की घंटी बजी। दरवाजा खोला तो आगंतुक ने एक पैकेट पकड़ाया। वह कुछ ज्यादा ही थका हुआ लग रहा था। मेरे घर तक आने के लिए दस बारह सीढ़िया ही चढ़ना पड़ता है और वह लड़का जवान भी था। पता चला सौ डेढ़ सौ किलोमीटर  चल कर आ रहा था। चेहरा गौर से देखा, मैं कुछ पहचानने की कोशिश कर रहा था। तभी स्मृति ने ज़ोर से घूंसा लगाया: अरे, दो बीघा जमीन, फिल्म भूल गए। समझ में आ गया, मैं कोई विमल रॉय तो हूं नहीं कि बलराज साहनी में घोड़े की भूमिका सोंच सकूं। तब पहचाना ये तो घोड़ा है। अब घोड़े मोटर साइकिल पर आते हैं, क्यों नहीं आएं, टेक्नोलॉजी के युग में जब हम घर बैठे शॉपिंग कर सकते हैं तो घोड़े मोटरसाइकिल क्यों नहीं चला सकते।

लेकिन घोड़ा तो घोड़ा है, मशीन नहीं है। थक सकता है। दस पन्द्रह सीढ़िया, बीसियों घरों में चढ़ना उतरना पड़े तो घोड़ा हांफने लग सकता है। मेरी सीढ़ियों पर तो प्याऊ भी नहीं है। याद आया, कुछ दिन पहले लाल बत्ती पर मेरी गाड़ी के आगे तिरछे तीन घोड़े आ लगे थे। मुझे बड़ा गुस्सा आया, इन घोड़ों को देखो हर लेन में घुस जाते हैं। मैं तो गर्मी से खुद ही परेशान था कि अप्रैल के महीने में भी लगता है कि एसी काम ही नहीं कर रहा है तो आगे मई जून में क्या होगा, ऊपर से सड़कों का जाम और अव्यवस्था!!  बुद्धि विलास की आदत के कारण सोंचने लगा कि लालबत्ती या जाम की स्थिति में दाएं बाएं बीसियों बसों और गाड़ियों के एसी की गरमा गरम के बीच फंसे घोड़ों की त्वचा और मस्तिष्क पर कैसा प्रभाव पड़ता होगा। जो वैज्ञानिक ये जानना चाहें कि धरती पर बढ़ते तापमान से बीस तीस साल बाद स्थिति क्या होगी, इन घोड़ों के अध्ययन से मालूम कर सकते हैं। इन परिस्थितियों और प्रदूषण में इनकी सुरक्षा या आयु की बातें मानवाधिकार से सम्बन्धित होंगी, किन्तु हम तो घोड़ों की बात कर रहे थे। रिक्शे और साइकिलों पर भी आपको घोड़े मिल जायेंगे। एक बात  ये और जान लीजिए कि इन घोड़ों की प्रजाति के लुप्त होने का भय बढते हुए तापमान से नहीं है, उसके पहले ड्रोन इन्हें डुबा ( drown ) कर के लुप्त कर देगा।

सड़क पर  गाड़ी चलाते मुझे गुस्सा भी आता है, और डर भी लगता है सामान ढोती भीमकाय ट्रकों से। इन ट्रकों को चलाने वालो को हम सीनियर घोड़े कह सकते हैं, उनका वाहन भी विशाल और तय करने वाली दूरियां भी विशाल। हमारे देश की विशालता का उनसे अच्छा अनुभव शायद ही किसी का हो। रेल गाड़ियों के चालको की बात अलग है,  वे आठ दस घंटे की ड्यूटी के बाद विश्रामालयों में आराम करके वापस घर की दिशा में लौट जाते हैं, आपकी आगे की यात्रा अन्य ड्राइवरों को सौंप दी जाती है। किंतु ट्रक ड्राइवर घर से दूर घरवाली से दूर घाट घाट का पानी पीते, मानवीय संवेदनाओं से भी उपेक्षित विकृत जीवन ही सामान्यतः जीने को मजबूर हैं।

बचपन में इलाहाबाद में इकन्नी सवारी में इक्के पर बैठ कर बहुत बार संगम नहाया है। घोड़े लुप्त हो रहे हैं, परंपरागत मज़दूर भी लुप्त हो रहे हैं। कुछ लोगो को तो मजदूर दिवस पर कुछ लगता होगा, कुछ करने को मन करता होगा।

विष्णु प्रकाश श्रीवास्तव
विष्णु प्रकाश श्रीवास्तव
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