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गृहिणी राष्ट्रनिर्माता है तो हिंसा की शिकार क्यों?

भारतीय समाज में महिलाओं को सशक्त बनाने के दावे लंबे समय से किए जाते रहे हैं। उन्हें ‘आधी आबादी’ और विकास की समान भागीदार कहा जाता है। शिक्षा, रोजगार, राजनीति और नेतृत्व के क्षेत्र में उनकी भागीदारी बढ़ाने के लिए अनेक योजनाएं बनाई जाती हैं। संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की प्रतिबद्धता जताई जाती है। सरकारें महिला सशक्तीकरण को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल करती हैं और समाज भी महिलाओं की उपलब्धियों पर गर्व व्यक्त करता है। लेकिन इन सबके बीच कुछ ऐसे तथ्य सामने आते हैं, जो हमें इस सशक्तीकरण के वास्तविक स्वरूप पर पुनर्विचार करने के लिए विवश करते हैं। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने गृहिणियों के योगदान को राष्ट्र निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए उन्हें ‘नेशन बिल्डर’ अर्थात् राष्ट्रनिर्माता कहा। न्यायालय ने यह भी माना कि घरेलू कार्यों और परिवार की देखभाल में महिलाओं द्वारा किए जाने वाले श्रम का आर्थिक मूल्य है और उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के आंकड़े बताते हैं कि देश में ग्रामीण क्षेत्रों की प्रत्येक चौथी तथा शहरी क्षेत्रों की प्रत्येक छठी महिला किसी न किसी रूप में हिंसा का शिकार होती है। यह स्थिति एक गहरे विरोधाभास को उजागर करती है। जिस महिला को राष्ट्रनिर्माता कहा जा रहा है, वही महिला अपने घर, परिवार और समाज में असुरक्षा और हिंसा का सामना करने को विवश है।

सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय भारतीय समाज में महिलाओं के अवैतनिक श्रम को मान्यता देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। सदियों से गृहिणियों द्वारा किए जाने वाले कार्यों को केवल कर्तव्य या प्रेम का विस्तार मान लिया गया। घर की सफाई, भोजन बनाना, बच्चों का पालन-पोषण, बुजुर्गों की सेवा, परिवार के स्वास्थ्य और संस्कारों की रक्षा, घरेलू प्रबंधन और सामाजिक संबंधों का निर्वहन-इन सभी कार्यों को महिलाओं का स्वाभाविक दायित्व माना गया। परिणामस्वरूप उनके श्रम को कभी आर्थिक दृष्टि से नहीं आंका गया। वास्तव में यदि किसी परिवार में गृहिणी द्वारा किए जाने वाले सभी कार्यों के लिए अलग-अलग व्यक्तियों को नियुक्त किया जाए, तो उस पर भारी आर्थिक व्यय आएगा। इसके बावजूद गृहिणी के श्रम को न तो वेतन मिलता है और न ही सामाजिक मान्यता। वह चौबीस घंटे और वर्ष के तीन सौ पैंसठ दिन कार्यरत रहती है। उसका कोई अवकाश नहीं होता, कोई पदोन्नति नहीं होती और कोई सेवानिवृत्ति नहीं होती। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय का यह कहना कि गृहिणी केवल परिवार नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण में भी योगदान देती है, सामाजिक चेतना को नई दिशा देने वाला विचार है।

न्यायालय ने मोटर दुर्घटना मुआवजा मामले में गृहिणी की सेवाओं का मूल्यांकन न्यूनतम 30 हजार रुपये प्रतिमाह के आधार पर करने की बात कही। यह केवल एक कानूनी निर्णय नहीं, बल्कि उस सामाजिक मानसिकता को चुनौती है जो घरेलू श्रम को महत्वहीन समझती रही है। वास्तव में महिलाओं का यह अदृश्य श्रम देश की अर्थव्यवस्था की नींव है। यदि इस श्रम का आर्थिक मूल्यांकन किया जाए और उसे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में शामिल किया जाए, तो भारत की अर्थव्यवस्था की तस्वीर काफी बदल सकती है। लेकिन इसी संदर्भ में दूसरा पक्ष और भी अधिक चिंता पैदा करता है। जिस महिला के योगदान को सर्वोच्च न्यायालय राष्ट्र निर्माण का आधार मान रहा है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने सफल 12 वर्ष के रिकार्ड प्रधानमंत्री शासन की आयोजनाओं के अवसर पर महिलाओं के सर्वांगीण विकास एवं सम्मान की अधिकारी मान कर रहे हैं, क्या उसे वह सम्मान, सुरक्षा और गरिमा प्राप्त है जिसकी वह अधिकारी है? दुर्भाग्य से इसका उत्तर संतोषजनक नहीं है।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के विरुद्ध हिंसा आज भी एक गंभीर सामाजिक समस्या बनी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्येक चौथी महिला और शहरी क्षेत्रों में प्रत्येक छठी महिला हिंसा का सामना करती है। 18 से 49 वर्ष आयु वर्ग की विवाहित महिलाओं में लगभग 22 प्रतिशत ने स्वीकार किया है कि उन्हें वैवाहिक जीवन में घरेलू हिंसा झेलनी पड़ी। यह स्थिति एक गहरे विरोधाभास को उजागर करती है। जिस महिला को राष्ट्रनिर्माता कहा जा रहा है, वही महिला अपने घर, परिवार और समाज में असुरक्षा और हिंसा का सामना करने को विवश है। यह स्थिति तब है जब महिलाओं की सुरक्षा के लिए अनेक कानून बनाए जा चुके हैं और महिला अधिकारों को लेकर व्यापक जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि यदि कानून मौजूद हैं, योजनाएं चल रही हैं और महिला सशक्तीकरण को राष्ट्रीय एजेंडा बनाया जा चुका है, तो फिर महिलाओं के खिलाफ हिंसा क्यों नहीं रुक रही? आखिर क्यों घर से लेकर कार्यस्थल तक महिलाएं स्वयं को पूर्णतः सुरक्षित महसूस नहीं कर पातीं?
इसका उत्तर केवल कानूनी व्यवस्था में नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता में छिपा है।

भारतीय समाज का एक बड़ा हिस्सा आज भी पितृसत्तात्मक सोच से प्रभावित है। महिलाओं को परिवार की धुरी तो माना जाता है, लेकिन निर्णय लेने की स्वतंत्रता और समान अधिकार देने में संकोच किया जाता है। एक ओर उनके श्रम पर परिवार की पूरी व्यवस्था निर्भर रहती है, दूसरी ओर उनके योगदान को पर्याप्त सम्मान नहीं मिलता। यही मानसिकता कई बार घरेलू हिंसा, आर्थिक शोषण और सामाजिक भेदभाव का कारण बनती है। आज भी दहेज प्रथा समाज पर कलंक बनी हुई है। अनेक शिक्षित परिवारों में भी दहेज की मांग और उससे जुड़े अपराध सामने आते हैं। हाल के वर्षों में दहेज हत्या और उत्पीड़न के अनेक मामले राष्ट्रीय चर्चा का विषय बने हैं। यह विडंबना ही है कि एक लड़की की शिक्षा, पालन-पोषण और विवाह पर भारी व्यय करने वाले माता-पिता को विवाह के समय अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाने के लिए मजबूर किया जाता है। यह केवल सामाजिक कुरीति नहीं, बल्कि महिलाओं के सम्मान पर सीधा आघात है।

इसके अतिरिक्त कई क्षेत्रों में महिलाओं को डायन बताकर प्रताड़ित करने, यौन हिंसा, बाल विवाह, मानव तस्करी और लैंगिक भेदभाव जैसी समस्याएं भी मौजूद हैं। विशेष रूप से ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में अंधविश्वासों तथा सामाजिक पिछड़ेपन के कारण महिलाओं के खिलाफ हिंसा की घटनाएं अधिक दिखाई देती हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि आर्थिक विकास के बावजूद सामाजिक चेतना का विकास अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाया है। महिला सशक्तीकरण को केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व या आर्थिक अवसरों तक सीमित नहीं किया जा सकता। सशक्तीकरण का वास्तविक अर्थ है-सम्मान, सुरक्षा, समान अवसर और स्वतंत्र निर्णय क्षमता। यदि कोई महिला आर्थिक रूप से सक्षम है, लेकिन घर में हिंसा का शिकार है, तो उसे पूर्णतः सशक्त नहीं कहा जा सकता। इसी प्रकार यदि उसे राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिल जाए, लेकिन सामाजिक सम्मान न मिले, तो भी सशक्तीकरण अधूरा रहेगा।

आज आवश्यकता इस बात की है कि महिला सशक्तीकरण को बहुआयामी दृष्टि से देखा जाए। महिलाओं के घरेलू श्रम को मान्यता देने के साथ-साथ उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है। विद्यालयों और परिवारों में लैंगिक समानता के संस्कार विकसित किए जाएं। पुरुषों और लड़कों को भी इस परिवर्तन प्रक्रिया का भाग बनाया जाए। केवल महिलाओं को जागरूक करने से समस्या का समाधान नहीं होगा, समाज की सोच में परिवर्तन लाना होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक बनाने, शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ाने तथा कानूनी सहायता उपलब्ध कराने की आवश्यकता है। पुलिस और प्रशासन को महिलाओं से जुड़े मामलों में अधिक संवेदनशील और उत्तरदायी बनाना होगा। कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना होगा ताकि अपराधियों में दंड का भय उत्पन्न हो और पीड़ित महिलाओं को न्याय प्राप्त हो सके। साथ ही यह भी आवश्यक है कि महिलाओं के अवैतनिक श्रम को राष्ट्रीय आर्थिक विमर्श का हिस्सा बनाया जाए। समय आ गया है कि घरेलू कार्यों को केवल निजी दायित्व न मानकर सामाजिक और आर्थिक योगदान के रूप में स्वीकार किया जाए। इससे न केवल महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ेगा, बल्कि समाज में उनके प्रति सम्मान की भावना भी सुदृढ़ होगी। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय हमें यह संदेश देता है कि राष्ट्र निर्माण केवल संसद, उद्योग, सेना या प्रशासन तक सीमित नहीं है। परिवार का निर्माण और उसका संरक्षण भी राष्ट्र निर्माण की आधारशिला है और इस कार्य की सबसे बड़ी वाहक महिला है। लेकिन यदि वही महिला हिंसा, भेदभाव और असुरक्षा का सामना करती रहे, तो राष्ट्र निर्माण का यह सपना अधूरा ही रहेगा। इसलिए आज आवश्यकता केवल महिलाओं के श्रम का मूल्यांकन करने की नहीं, बल्कि उनके जीवन का मूल्य समझने की है।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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