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एक यात्रा, जो बाहर से शुरू होकर भीतर अनंत गहराइयों तक पहुँचती है

 “इस बार कहीं अलग चलते हैं?….. यात्रा अक्सर इसी छोटे से सवाल से जन्म लेती है। पर कुछ यात्राएँ सिर्फ जगह बदलने के लिए नहीं होतीं, वे भीतर के शोर को सुनने, थमे हुए एहसासों को फिर से जगाने और खुद से मिलने का अवसर बन जाती हैं।

जंगल…… ऐसी ही एक यात्रा है, जहाँ हर कदम किसी दृश्य की ओर नहीं, बल्कि एक अनुभव की ओर बढ़ता है। जब आप अचानकमार टाइगर रिजर्व जैसे किसी वन्य विस्तार में प्रवेश करते हैं, तो सबसे पहले जो चीज़ महसूस होती है, वह है… यहां की छाई हुई और गहराई असीम शांति का एहसास। यह साधारण शांति नहीं, बल्कि एक गहराई लिए हुए मौन है, जिसमें पक्षियों की पुकार, पत्तों की सरसराहट और दूर कहीं बहती नदी की धीमी ध्वनि मिलकर एक अद्भुत संगीत रचती हैं। शहरों के शोर से दूर, यहाँ प्रकृति अपने मूल रूप में सांस लेती दिखाई देती है।

सुबह की पहली किरण जब घने सागौन और साल के वृक्षों के बीच उतरती है, तो ऐसा लगता है जैसे समय थम गया हो। हल्की धुंध के बीच से छनकर आती रोशनी, ओस से भीगी धरती और ताज़ी हवा…ये सब मिलकर मन को एक अजीब सी शांति से भर देते हैं। यही वह क्षण होता है जब इंसान महसूस करता है कि वह प्रकृति का हिस्सा है, उससे अलग नहीं।

जंगल का सबसे रोमांचक पहलू है…उसकी अनिश्चितता। जिप्सी सफारी या फिर हाथी की सवारी के साथ के दौरान हर मोड़ एक नई उम्मीद लेकर आता है। कभी हिरणों का झुंड दिखाई देता है, कभी रंग-बिरंगे पक्षियों की उड़ान, और कभी अचानक सामने आ जाता है वह अद्भुत दृश्य-बंगाल टाइगर। बाघ सिर्फ एक जानवर नहीं, बल्कि जंगल की आत्मा है-उसकी उपस्थिति इस बात का संकेत है कि पूरा पारिस्थितिकी तंत्र संतुलित और जीवित है।

भारत में टाइगर रिजर्व केवल पर्यटन स्थल नहीं हैं, बल्कि संरक्षण के जीवंत उदाहरण हैं। प्रोजेक्ट टाइगर के अंतर्गत देशभर में कई संरक्षित क्षेत्र विकसित किए गए हैं, जहाँ न केवल बाघों की रक्षा की जाती है, बल्कि पूरे जंगल और उसमें बसे जीवन को सुरक्षित रखने का प्रयास किया जाता है। यह पहल हमें यह भी सिखाती है कि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बनाना कितना आवश्यक है।जंगल की असली खूबसूरती दिन के उजाले में ही नहीं, बल्कि रात की खामोशी में भी दिखती है। जब आसमान तारों से भर जाता है और चारों ओर सन्नाटा छा जाता है, तो लगता है जैसे पूरी प्रकृति किसी गहरे ध्यान में लीन हो। ऐसे क्षणों में, जब आप बोनफायर के पास बैठकर अपनों के साथ बातें करते हैं, तो हर छोटी-छोटी बात भी एक याद बन जाती है….एक ऐसी याद, जो जीवनभर साथ रहती है।

जंगल की खामोशी में खुद की आवाज़ सुनाई दी,
भीड़ में जो खो गया था, वो पहचान फिर दिखाई दी।

अचानकमार टाइगर रिजर्व की वह सघन हरियाली और साल के ऊंचे वृक्षों के बीच से छनकर आती धूप केवल एक दृश्य नहीं, बल्कि एक रूहानी अनुभव है। जब आप बिलासपुर की हलचल पीछे छोड़कर लोरमी मार्ग से होते हुए अचानकमार की गोद में प्रवेश करते हैं, तो शोर थम जाता है और संवाद शुरू होता है….प्रकृति के साथ और स्वयं के साथ।ये एक ऐसी यात्र है जो इस अनुभव की गहराइयों को समेटने का प्रयास करता है।अचानकमार का जंगल जहां मौन बोलता है और समय ठहर जाता है। जैसे ही गाड़ी पहिए अचानकमार की सीमा को छूते हैं, हवा का मिजाज बदल जाता है। वह शहर की धूल भरी गर्म हवा नहीं, बल्कि आदिम गंध से भरी एक शीतल छुअन होती है। यहाँ साल (सरई) के दरख्त आसमान को छूने की जिद में खड़े हैं, मानो वे धरती और अंबर के बीच कोई प्राचीन संदेशवाहक हों।

जंगल में प्रवेश करना ऐसा लगेगा मानो किसी मंदिर के गर्भगृह में पहुंच गए हों। यहाँ हर कदम पर एक रहस्य है। बंदरों की कुलाचें, हिरणों की चौकन्नी निगाहें और हवा में तैरती पक्षियों की चहचहाहटें  ….कहीं दूर से आती किसी जानवर जंगल की शांत नीरव सन्नाटे को तोड़ती हुई आवाजें ये सब बताते हैं कि हम यहाँ अतिथि हैं, मालिक नहीं।    

जब जिप्सी कच्ची पगडंडियों पर धीरे-धीरे आगे बढ़ती है, तो मन की सारी परतें एक-एक कर खुलने लगती हैं। वह भागदौड़, वह पत्रकारिता का तनाव और वह शब्दों का जाल, सब पीछे छूट जाता है। जंगल हमें सिखाता है। धीमे चलना, ठहरना, और महसूस करना। यहाँ कोई दिखावा नहीं, कोई बनावट नहीं। सब कुछ अपने सबसे सच्चे रूप में होता है। शायद यही कारण है कि जो व्यक्ति एक बार जंगल की इस दुनिया में प्रवेश करता है, वह कुछ न कुछ बदलकर ही लौटता है। वह सिर्फ तस्वीरें नहीं, बल्कि एक एहसास अपने साथ ले जाता है…..एक ऐसा एहसास, जो उसे बार-बार उसी शांति की ओर खींचता है।

कुल मिलाकर यही समझ में आता है कि यात्रा केवल नई जगह देखने के लिए नहीं होती, बल्कि खुद को नए सिरे से समझने के लिए होती है। और जंगल… वह एक ऐसा दर्पण है, जिसमें हम अपने वास्तविक स्वरूप को देख पाते हैं।

जंगल की यात्रा की सबसे बड़ी खूबी यही है कि यह आपको ‘अकेला’ नहीं करती, बल्कि आपको ‘एकांत’ देती है। अचानकमार की उस अनंत नीरवता में जब आप अपनी ही सांसों की आवाज सुनते हैं, तब समझ आता है कि हम कृत्रिम दुनिया में कितने खो गए थे।

मनियारी नदी के किनारे पत्थरों पर बैठकर जब आप बहते पानी को देखते हैं, तो वह केवल जल नहीं होता, वह जीवन की निरंतरता का प्रतीक बन जाता है। वहां न कोई पद होता है, न प्रतिष्ठा…..वहाँ आप केवल एक ‘मनुष्य’ होते हैं, जो अपनी ही आत्मा की गहराइयों को टटोल रहा होता है।

अचानकमार के जंगल में शाम का ढलना एक कविता जैसा है। सूरज जब पहाड़ियों के पीछे छिपता है, तो पूरा जंगल एक सिंदूरी चादर ओढ़ लेता है। दूर कहीं किसी ग्रामीण के चूल्हे से निकलता धुआं और वन्यजीवों की सांझ की पुकार एक अजीब सी कसक पैदा करती है। यह अहसास होता है कि हमारी जड़ें आज भी यहीं हैं।

यह यात्रा केवल बाघ देखने की लालसा नहीं है, बल्कि उस जीवन पद्धति को समझने का जरिया है जहाँ हर जीव एक-दूसरे पर निर्भर है। अचानकमार का जंगल सिखाता है कि “अनंत गहराइयां बाहर नहीं, हमारे भीतर हैं”, बस उन्हें देखने के लिए जंगल जैसी पवित्रता और शांति चाहिए।

बिलासपुर के इस अंचल में स्थित अचानकमार का जंगल महज एक अभ्यारण्य या’टाइगर रिजर्व’ नहीं है, बल्कि यह उन लोगों के लिए एक तीर्थ है जो खुद को खोकर फिर से पाना चाहते हैं। यह यात्रा हमें विनम्र बनाती है और याद दिलाती है कि हम इस विशाल प्रकृति का एक बहुत छोटा सा, लेकिन अभिन्न हिस्सा मात्र हैं। अब यहां पर अपनी इस लेखनी को विराम देते हुए इसी आशा में कि मेरी इस लेखनी से आपके अंतरमन तक यह यात्रा और जंगल की तस्वीर पहुंची हो इन्हीं आशाओं के साथ निम्न दो शब्द…….

जंगल की खामोशी में भी कितनी गहरी बात होती है,
जो खुद से मिल ले यहाँ… वही असली मुलाकात होती है।।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”

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