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स्क्रीन के साए में बचपन: भाषा विकास पर बढ़ता खतरा

वर्ष 2007 में स्मार्टफोन के व्यापक उपयोग के साथ लोगों के रोजमर्रा की जिंदगी का एक अभिन्न हिस्सा बन गया है। यह बच्चों के भाषा विकास को प्रभावित करता है।  माता-पिता अपने बच्चों की उपस्थिति में स्मार्टफोन का उपयोग करते हैं तो उनका ध्यान फोन पर ही केंद्रित होता है। जिसके कारण माता-पिता और बच्चों के बीच बातचीत में बाधा उत्पन्न होती है। माता-पिता की स्क्रीन आदतें बच्चों के भाषा सीखने में 16% तक की कमी ला सकती हैं। शिशु अवस्था व बचपनावस्था मूलभूत भाषा कौशल सीखने के लिए महत्वपूर्ण समय होता है। छोटे बच्चे अपने माता-पिता से ही नहीं बल्कि अपने आसपास के लोगों से, खिलौनों से व किताबों सिखते हैं। स्क्रिन वन-वे कम्युनिकेशन है। 0-2 वर्ष तक स्क्रीन टाइम शून्य और 2-5 वर्ष तक अधिकतम 1 घंटा होना चाहिए।

बच्चों के भाषा विकास पर मोबाइल के उपयोग का नकारात्मक प्रभाव पडता है। जैसे- सुनने में देरी, बोलने में देरी, ध्यान की कमी, शब्दावली में कमी व संवाद कौशल कमजोर होना। स्क्रीन टाइम अधिक होने के कारण बच्चों का माता -पिता व अन्य के साथ बातचीत कम होती है, जो भाषा विकास में बाधा डालती है। स्क्रीन वातावरण में सीखी गई जानकारी को वास्तविक दुनिया में उपयोग करना बच्चों के लिए बेहद मुश्किल होता है, क्योंकि उनमें यह क्षमता लगभग तीन साल की उम्र में विकसित नहीं होती। इससे कम उम्र के बच्चों में एक संदर्भ से दूसरे संदर्भ में सीखने को स्थानांतरित करने की क्षमता की कमी होती है।

भाषा विकास में मोबाइल का नकारात्मक प्रभाव:-

बोलने में देरी:- स्क्रीन समय का अधिक होना (प्रतिदिन 1 घंटे से अधिक) बच्चों में भाषा के खराब विकास, अभिव्यक्ति व भाषा कौशल में कठिनाई उत्पन्न करता है। बच्चे देर से बोलना शुरू करते हैं।

संवाद में कमी:- जब बच्चे स्क्रीन पर अधिक लगे रहते हैं, तो वे वयस्कों से कम बातचीत करते हैं और भाषा का आदान-प्रदान कम होता है जो भाषा सीखने के लिए आवश्यक है।

माता-पिता से जुड़ाव में कमी :- माता-पिता द्वारा फोन का उपयोग करने से बच्चों के साथ उनकी बातचीत कम होती है, जिससे बच्चों का भाषा विकास प्रभावित होता है। माता-पिता से सांवेगिक लगाव कम होता है जो आगे चलकर भाषा विकास को प्रभावित करता है

तकनीकी हस्तक्षेप:- अधिक

स्क्रीन समय माता-पिता और बच्चों के बीच की बातचीत को बाधित करता है, जिससे छोटे बच्चों के भाषा विकास पर असर पड़ता है स्मार्टफोन के उपयोग से माता-पिता की प्रतिक्रियाशीलता कम हो जाती है, जिससे मौखिक व गैर-मौखिक बातचीत में बाधा आती है।

ध्यान केंद्रित करने में कमी:-

स्क्रीन की लत के कारण बच्चे बोरियत महसूस करते हैं और लोगों से बातचीत करने में रुचि नहीं लेते, जिससे संवाद कौशल विकसित नहीं होता है। मीडिया में अनेक ऐसे तत्व होते हैं जो शैक्षिक सामग्री से बच्चों का ध्यान भटकाते हैं, सीखने की क्षमता को कम करते हैं।

शब्दों सीखने में देरी:-

शोध बताते हैं कि हर 30 मिनट का मोबाइल स्क्रीन टाइम बच्चों में स्पीच डिले का जोखिम 49% तक बढ़ाता है। बच्चे शब्दों को देर से सीखते हैं और बोलते हैं।

भाषा समझने में कठिनाई:-  प्रतिदिन 2 घंटे से अधिक स्क्रीन टाइम से बच्चों में भाषा को समझने व अभिव्यक्त करने की क्षमता कम होती है।

सीखने में बाधा:-  मोबाइल चलाना व वीडियो देखना, बच्चों की सामाजिक और संज्ञानात्मक समझ को कम करता है क्योंकि वे सक्रिय बातचीत नहीं करते हैं। उनके नए कौशलों के सीखने की प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न होता है।

कमजोर संज्ञानात्मक कौशल:- स्क्रीन पर बहुत अधिक समय बिताने से बच्चों के सोचने, समझने, समस्या समाधान के कौशल और याद रखने की क्षमता पर नकारात्मक असर पड़ता है।

भाषा विकास के उपाय:-

बातचीत करें:- बच्चा जब छोटा हो (शिशु अवस्था) तभी से उससे बातें करना शुरू करें। दिनचर्या के कार्यों (नहलाना, खिलाना व अन्य) के बारे में बोलकर बताएं।

जोर जोर से पढ़कर सुनाएं:- रोजाना चित्र वाली किताबें पढ़कर बच्चे को सुनाऐ। तस्वीरों को उंगली से दिखाकर उनके नाम बताएं।

सुने व प्रतिक्रिया दें:- जब बच्चा बड़बड़ाए या तुतलाकर कुछ बोले, तो उसे ध्यान से सुनें और जवाब दें। इससे उन्हें बोलने के लिये प्रोत्साहन मिलेगा।

खुला प्रश्न पूछें:- “हां” या “ना” वाले प्रश्नों के बजाय, उनसे ऐसे सवाल करें जिनका उत्तर लंबा हो, जैसे- “आज स्कूल में क्या मज़ेदार हुआ?”।

कविताएं पढ़ें:- बच्चों के साथ गाने गाएं व तुकबंदी वाली कविताएं पढ़ें। यह नए शब्द और लय सीखने में मदद करता है।

चीजों का नाम बताएं:- घर में या बाहर घूमते समय वस्तुओं, रंगों और क्रियाओं के नाम दोहराएं।

इशारों का उपयोग:- बोलते समय हाथों के इशारों और हाव-भाव का प्रयोग करें इससे बच्चों को बात को समझना आसान होता है।

दुहराऐं नहीं:- यदि बच्चा किसी शब्द का गलत उच्चारण करता है या तुतला कर बोलता है तो अभिभावक उसे दोहराऐं नहीं इससे गलत उच्चारण और मजबूत होता है बल्कि बार-बार उस शब्द का सही उच्चारण बच्चों के सामने करें ताकि वे सही उच्चारण सीख सके।

माता-पिता के लिए सुझाव:-

स्क्रीन टाइम सीमित करें:- 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों का स्क्रीन समय प्रतिदिन 1 घंटे से अधिक नहीं होना चाहिए। 18 महीने से कम उम्र के बच्चों के लिए स्क्रीन समय शून्य रखें।

आमने-सामने बातचीत:- मोबाइल की जगह बच्चों से बातें करें, कहानियांँ सुनाएं और उनके साथ खेलें। बच्चे स्क्रीन से नहीं, इंसान से संवाद करके भाषा सीखते हैं।

तकनीकी हस्तक्षेप से बचें:- बच्चे के साथ रहने के दौरान फोन का इस्तेमाल कम से कम करें क्योंकि मोबाइल के कारण 16% तक कम बातचीत होती है।

खाना खाते समय फोन न चलाऐं:- भोजन करते समय फोन का इस्तेमाल न करें, यह बच्चों के साथ जुड़ने का महत्वपूर्ण समय है।

सोने से पहले स्क्रीन बंद:- सोने से कम से कम एक घंटा पहले मोबाइल बंद कर दें, क्योंकि इसकी नीली रोशनी नींद में बाधा डालती है।

डिजिटल डिटॉक्स:- घर में कुछ स्थान जैसे बेडरूम, पूजा घर, अध्ययन कक्ष व डाइनिंग टेबल को ‘फोन-फ्री जोन’ बनाएं।

मोबाइल ब्रत- प्रतिदिन कुछ घंटे तथा सप्ताह में एक दिन मोबाइल न चलाने का नियम बनाएं तथा घर के सभी सदस्य इसका पालन करें।

शिक्षकों के लिए सुझाव:-

डिजिटल साक्षरता:- बच्चों को तकनीक के ‘उपभोक्ता’ के बजाय ‘निर्माता’ बनना सिखाएं (जैसे- कोडिंग, डिजिटल स्टोरीटेलिंग)।

फोन-मुक्त क्षेत्र:- कक्षा में ‘फोन-मुक्त क्षेत्र’ या समय निर्धारित करें जैसे- लंच या ग्रुप डिस्कशन के दौरान।

अभिभावकों से संबाद:- माता-पिता को स्क्रीन समय और भाषा के बीच संबंधों के बारे में शिक्षित करें।

सामग्री का चयन:- यदि स्क्रीन का उपयोग किया जा रहा है, तो ऐसी सामग्री चुनें जो संवादात्मक हो (जैसे शैक्षिक ऐप), न कि केवल निष्क्रिय देखने वाली।

शैक्षिक सामाग्री की सीमा:- ‘एजुकेशनल’ वीडियो भी भाषा विकास का विकल्प नहीं हैं, परस्पर बातचीत ही बच्चों के भाषा विकास के लिये सर्वश्रेष्ठ होता है।

संवादपूर्ण खेल, सामाजिक जुड़ाव व सोच-समझकर मीडिया के उपयोग को संयोजित करके एक संतुलित वातावरण विकसित करना बच्चों के सर्वोत्तम भाषा विकास में सबसे अच्छा सहयोग देता है। माता-पिता, भाई-बहन परिवार के सदस्यों, पड़ोसी एवं शिक्षकों के संयुक्त प्रयास से बच्चों के भाषा विकास को सर्वोत्तम दिशा एवं गति प्रदान किया जा सकता है।

डॉ. मनोज कुमार तिवारी 
वरिष्ठ परामर्शदाता 
एआरटीसी, एसएस हॉस्पिटल, आईएमएस, बीएचयू, वाराणसी
डॉ. मनोज कुमार तिवारी
वरिष्ठ परामर्शदाता
एआरटीसी, एसएस हॉस्पिटल, आईएमएस, बीएचयू, वाराणसी
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