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किराये की संतान नहीं, अपनत्व का पुनर्जागरण चाहिए

जीवन की सांझ जब अपने पूरे विस्तार के साथ उतरती है, तब मनुष्य को सबसे अधिक आवश्यकता दवाइयों या धन की नहीं, बल्कि अपनों के सान्निध्य और अपनों की होती है। यह वही समय होता है जब व्यक्ति अपने जीवन की संचित स्मृतियों, अनुभवों और भावनाओं को साझा करना चाहता है। लेकिन आज का कठोर यथार्थ यह है कि अनेक बुजुर्ग अपने ही घरों में अजनबी-से होकर रह गए हैं। विशाल मकानों में गूंजती खामोशी, सूने आंगन, और दरवाजे पर टकटकी लगाए प्रतीक्षा करती आंखें-यह सब मिलकर एक ऐसी त्रासदी रचते हैं, जो केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक विघटन का संकेत है। आज वैश्वीकरण, रोजगार की अनिवार्यता और बेहतर भविष्य की तलाश ने नई पीढ़ी को देश-विदेश के कोनों में बिखेर दिया है। यह स्वाभाविक भी है, लेकिन इस प्रक्रिया में जो सबसे बड़ी कीमत चुकाई जा रही है, वह है पारिवारिक संवेदना का क्षरण। अनेक बच्चे विदेश जाकर वहीं बस जाते हैं, अपने जीवन में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि माता-पिता केवल फोन कॉल और औपचारिक संदेशों तक सीमित रह जाते हैं। कुछ तो ऐसे भी हैं जो एक ही शहर में रहते हुए वर्षों तक माता-पिता की सुध नहीं लेते। यह केवल दूरी की समस्या नहीं, बल्कि भावनात्मक दूरी का संकट है।
इसी संवेदनहीनता के वातावरण में एक नया और विचलित करने वाला प्रचलन उभरा है-“किराये की संतान”। कुछ कंपनियां और संस्थान अब ऐसे युवाओं या बच्चों को उपलब्ध करा रहे हैं, जो बुजुर्गों के साथ समय बिताते हैं, उनसे बातें करते हैं, उनके साथ सैर करते हैं, खेलते हैं और उनके अकेलेपन को कुछ हद तक कम करने का प्रयास करते हैं। पहली दृष्टि में यह व्यवस्था राहत देती प्रतीत होती है, लेकिन गहराई से देखने पर यह हमारे सामाजिक ढांचे की विफलता का प्रमाण बन जाती है। यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है-क्या अब ममता और अपनत्व भी अनुबंधों और पैकेजों में बांटे जाएंगे? क्या संबंधों की गरमाहट अब सेवा-शुल्क के साथ उपलब्ध होगी? यह स्थिति केवल विडंबना नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक चेतावनी है कि हम अपने मूल्यों से कितनी दूर चले आए हैं। किराये की संतान सुलभ कराने की परम्परा आधुनिक समाज-संरचना की एक बड़ी विडम्बना एवं त्रासदी है।


हालांकि यह भी सत्य है कि हर परिवार की परिस्थितियां समान नहीं होतीं। कई बार बच्चों के सामने ऐसी मजबूरियां होती हैं, जिनके कारण वे माता-पिता के साथ नहीं रह पाते। वहीं कुछ बुजुर्ग भी अपने स्वभाव या सोच के कारण नई पीढ़ी के साथ सामंजस्य नहीं बैठा पाते। लेकिन इन अपवादों के बावजूद, व्यापक स्तर पर जो प्रवृत्ति उभर रही है, वह आत्मकेंद्रित जीवनशैली और संवेदनाओं के ह्रास की ही परिणति है। और भी चिंताजनक तथ्य यह है कि यह सुविधा केवल उन बुजुर्गों के लिए सुलभ है, जिनके पास पर्याप्त आर्थिक संसाधन हैं। मध्यमवर्गीय या निम्नवर्गीय बुजुर्ग, जिनकी आय के स्रोत सीमित हो चुके हैं, वे इस प्रकार की सेवाओं का खर्च वहन नहीं कर सकते। निजी क्षेत्र से सेवानिवृत्त कर्मचारियों की स्थिति और भी दयनीय हो जाती है, जहां पेंशन नगण्य होती है और चिकित्सा खर्च लगातार बढ़ते जाते हैं। ऐसे में उनका जीवन आर्थिक असुरक्षा और मानसिक अवसाद के बीच झूलता रहता है।
निश्चिततौर पर आज का समाज तीव्र गति से बाज़ारवाद और भौतिकवाद की ओर बढ़ रहा है, जहाँ संबंधों की ऊष्मा और भावनाओं की गहराई धीरे-धीरे क्षीण होती जा रही है। जीवन की प्राथमिकताएँ अब मानवीय मूल्यों से हटकर उपभोग, प्रतिस्पर्धा और आर्थिक सफलता तक सीमित हो गई हैं। परिणामस्वरूप रिश्ते भी उपयोगिता और स्वार्थ के आधार पर आँके जाने लगे हैं। परिवार, जो कभी संवेदना, सहारा और संस्कार का केंद्र हुआ करता था, अब व्यस्तताओं और महत्वाकांक्षाओं के दबाव में बिखरता नजर आ रहा है। इस बदलते परिवेश में बुजुर्ग पीढ़ी सबसे अधिक उपेक्षित हो रही है, क्योंकि वे न तो बाज़ार की दौड़ में शामिल हो सकते हैं और न ही नई पीढ़ी की भौतिक अपेक्षाओं को पूरा कर पाते हैं। उनके अनुभव, त्याग और स्नेह को अब बोझ या बाधा के रूप में देखा जाने लगा है। संयुक्त परिवारों के टूटने और एकल परिवारों के बढ़ने से उनकी सामाजिक और भावनात्मक सुरक्षा भी कमजोर हुई है। डिजिटल दुनिया ने संवाद को और अधिक सतही बना दिया है, जिससे आत्मीयता का स्थान औपचारिकता ने ले लिया है। ऐसे में बुजुर्गों का अकेलापन, असुरक्षा और उपेक्षा बढ़ती जा रही है, जो हमारे समाज के नैतिक पतन का संकेत है।

विकसित देशों में बुजुर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा की मजबूत व्यवस्थाएं हैं। वहां सरकारें उनकी स्वास्थ्य सेवाओं, पेंशन और देखभाल की जिम्मेदारी निभाती हैं। इसके विपरीत भारत में, जहां परिवार को ही सबसे बड़ी सुरक्षा माना गया था, आज वही ढांचा कमजोर पड़ता जा रहा है। सरकारें कर तो वसूलती हैं, लेकिन बुजुर्गों के लिए समुचित कल्याणकारी योजनाओं का अभाव स्पष्ट दिखाई देता है। ऐसी परिस्थितियों में समाधान केवल भावनात्मक अपील तक सीमित नहीं रह सकता। इसके लिए बहुआयामी और रचनात्मक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। सबसे पहले हमें पारिवारिक मूल्यों के पुनर्जागरण की दिशा में गंभीर प्रयास करने होंगे। बच्चों में बचपन से ही माता-पिता के प्रति कर्तव्यबोध, सम्मान और संवेदना का संस्कार विकसित करना होगा। शिक्षा केवल रोजगार का माध्यम न होकर, जीवन मूल्यों का संवाहक बनेकृयह सुनिश्चित करना समय की मांग है।

दूसरा महत्वपूर्ण कदम है-वृद्धाश्रमों और अनाथालयों का एकीकरण। यह विचार केवल कल्पना नहीं, बल्कि एक अत्यंत व्यावहारिक और मानवीय समाधान हो सकता है। यदि एक ही परिसर में बुजुर्गों और अनाथ बच्चों को साथ रखा जाए, तो दोनों की समस्याओं का समाधान संभव है। बच्चों को जहां स्नेह और मार्गदर्शन मिलेगा, वहीं बुजुर्गों को अपनत्व और बच्चों के साथ का अनुभव होगा। यह संबंध कृत्रिम नहीं, बल्कि स्वाभाविक और आत्मीय होगा। सरकार को इस दिशा में नीतिगत पहल करनी चाहिए। सुविधा-संपन्न, गरिमामय और मानवीय वृद्धाश्रमों का निर्माण, जहां केवल देखभाल ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी समावेश हो, यह अत्यंत आवश्यक है। साथ ही निजी संस्थाओं को भी इस क्षेत्र में प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, लेकिन यह सुनिश्चित करते हुए कि सेवाएं केवल व्यवसाय न बन जाएं, बल्कि सेवा का भाव प्रमुख रहे। बुजुर्गों को भी इस सच्चाई को स्वीकार करना होगा कि जीवन का यह चरण आत्मनिर्भरता और आत्मबल की मांग करता है। योग, ध्यान, प्राणायाम, सत्संग और सामाजिक सहभागिता उनके जीवन को सकारात्मक दिशा दे सकते हैं। डिजिटल साक्षरता भी उन्हें अपने बच्चों और समाज से जुड़े रहने में सहायक हो सकती है।

साररूप में यह समझना होगा कि समाज केवल आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि संवेदनाओं की समृद्धि से विकसित होता है। यदि हम अपने बुजुर्गों को सम्मान, स्नेह और सुरक्षा नहीं दे पा रहे हैं, तो हमारी सारी उपलब्धियां अधूरी हैं। “किराये की संतान” का प्रचलन हमें यह सोचने पर विवश करता है कि कहीं हम संबंधों को भी वस्तु तो नहीं बना रहे, भौतिकता की तराजू में तो नहीं तौल रहे हैं। यह समय है आत्ममंथन का अपने भीतर झांकने का और यह तय करने का कि हम कैसा समाज बनाना चाहते हैं। यदि हम सच में एक स्वस्थ, संवेदनशील और संतुलित समाज की कल्पना करते हैं, तो हमें अपनत्व के उस दीप को पुनः प्रज्वलित करना होगा, जिसकी रोशनी में हर बुजुर्ग अपने जीवन की सांझ को गरिमा और सुकून के साथ जी सके।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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