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भगवन् तुल्य प्रथम गुरु: मातृ-पितृ

1 जून: वैश्विक अभिभावक दिवस विशेष

 प्रत्येक वर्ष 1 जून को संपूर्ण विश्व ‘वैश्विक अभिभावक दिवस’ मनाता है। भारतीय संस्कृति में तो ‘माता-पिता’ को देवताओं से भी उच्च स्थान दिया गया है-  “मातृ देवो भव, पितृ देवो भव”। यह दिन केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि परिवार की उस धुरी को नमन करने का अवसर है, जो निस्वार्थ भाव से अपनी संतानों के भविष्य की नींव रखते हैं। इसे ‘मातृ-पितृ पूजन दिवस’ के रूप में भी मनाया जाता है, जहाँ बच्चे अपने माता-पिता का तिलक-आरती कर उनका आशीर्वाद लेते हैं, जो नई पीढ़ी में विनय और कृतज्ञता जैसे मूल्यों का संचार करता है।

पौराणिक संदर्भ: श्रवण कुमार और रामायण की आधारशिला

जब हम माता-पिता की सेवा की बात करते हैं, तो ‘श्रवण कुमार’ का नाम स्वर्ण अक्षरों में उभरता है। उन्होंने अपने अंधे माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर जो तीर्थ यात्रा कराई, वह युगों-युगों तक संतान के धर्म का सर्वोच्च मानक रहेगी।

रोचक तथ्य यह है कि श्रवण कुमार की कथा केवल एक उदाहरण नहीं, बल्कि रामायण के महाकाव्य की आधारशिला भी है। राजा दशरथ द्वारा अनजाने में किए गए शब्दभेदी बाण के प्रहार से जब श्रवण कुमार की मृत्यु हुई, तब उनके शोक संतप्त माता-पिता के श्राप ने ही राम के वनवास और दशरथ के पुत्र-वियोग का मार्ग प्रशस्त किया। यदि वह घटना न होती, तो न राम का वनवास होता, न रावण का वध और न ही अधर्म पर धर्म की विजय की वह गाथा लिखी जाती। अतः श्रवण कुमार का चरित्र भक्ति और नियति दोनों का संगम है।

पितृत्व: उत्तरदायित्व और सामाजिक बेड़ियाँ

अक्सर ‘मातृ दिवस’ की चर्चा अधिक होती है, लेकिन ‘पितृ दिवस’ उसका अनिवार्य पूरक है। समाज ने पुरुष को सदैव एक ‘कठोर रक्षक’ के रूप में देखा है। विडंबना यह है कि पुरुषत्व की परिभाषा ने उसे भावनाओं को व्यक्त करने से रोका है।भावनात्मक अवरोध: एक पिता चाहकर भी समाज के डर से दहाड़ मारकर रो नहीं सकता या बच्चों के प्रति सरेआम अति-संवेदनशील नहीं हो सकता। रूढ़िवादिता: हमारे समाज में आज भी यह धारणा घर किए हुए है कि बड़े निर्णय या नेतृत्व केवल पुरुषों के वश की बात है, यही कारण है कि राजनीति से लेकर सेना तक महिलाओं को अपना स्थान बनाने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा। 

लैंगिक भेदभाव: जड़ों पर प्रहार

यह पक्ष अत्यंत विचारणीय है कि भेदभाव की जड़ें हमारी प्राथमिक शिक्षा और विज्ञापनों में हैं। रंगों का खेल: नीला रंग विशालता और पौरुष का प्रतीक मानकर लड़कों को दिया गया, जबकि गुलाबी को कोमलता से जोड़कर लड़कियों तक सीमित कर दिया गया। खिलौने और भूमिकाएँ: बचपन में ही लड़की को ‘किचन सेट’ और लड़के को ‘बंदूक या गाड़ी’ देना यह तय कर देता है कि भविष्य में उनकी सामाजिक भूमिकाएँ क्या होंगी। दोहरा शोषण: पुराने समय में पिता समाज के डर से अपनी पत्नी की मदद नहीं कर पाते थे, जिससे स्त्रियों का दोहरा शोषण होता था। साथ ही, ‘कुल की नाक’ का सारा बोझ बेटियों के आचरण पर डाल दिया गया, जबकि पुरुषों को हर गलती की छूट मिलती रही।

परिवर्तन की बयार

सकारात्मक पक्ष यह है कि अब ये रूढ़ियाँ टूट रही हैं। आज का पिता अधिक मित्रवत है। वह घर के कार्यों में हाथ बटाता है और अपनी संतानों (चाहे पुत्र हो या पुत्री) के सपनों को पंख देने में विश्वास रखता है। ‘ग्लोबल पेरेंट्स डे’ इसी बदलाव और निस्वार्थ प्रेम को सम्मानित करने का दिन है।

जीवन का सार

माता-पिता केवल जन्मदाता नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व के शिल्पकार हैं। उनकी तपस्या का मोल चुकाना असंभव है, बस उनके प्रति सम्मान और सेवा का भाव ही सच्ची पूजा है।

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