आया ज्येष्ठ मास ये भीषण,
तपने लगा धरा का प्रांगण।
रोहिणी नक्षत्र में तेज सूर्य का,
लाया है नौतपा की तपन।
नौ दिन का यह महाव्रत,
नौ दिन का प्रचंड अंगार।
सूर्यदेवता सतत कर रहे,
तप्त रश्मियों की बौछार।
किंतु धरा का महाताप ये,
अमृत वर्षा का मधुमास।
जितना तपेगा मास जेठ का,
उतनी सुहानी बरखा की आस।
सूरज का यह तीव्र ताप ही,
सागर का जल वाष्प बनाता।
वही वाष्प अम्बर पर जाकर,
काली घटा बनकर छा जाता।
सहन कर रही है वसुंधरा,
नौतपा का विष,अमृत पाने को।
उत्सुक है यह सावन की,
वर्षा का दिव्य सुख पाने को।
नौतपा की तपती गर्मी से,
सारे कीटाणु हैं मर जाते।
तब फसलों से हरे भरे
होकर ये खेत हैं मुस्काते।
नौतपा नहीं केवल है तपन,
ये है नवजीवन का वरदान।
प्रकृति का यह कड़ा नियम है,
कृषकों के मुख की मुस्कान !!!


स्मृति श्रीवास्तव : लेखक के बारे में : स्मृति श्रीवास्तव का तृतीय काव्य संग्रह डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित “अन्तर्ध्वनि” समकालीन हिंदी काव्यधारा में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में उभरता है। हिंदी साहित्य में एम.ए. उपाधि प्राप्त करने के उपरांत लेखिका ने अपना जीवन हिंदी भाषा, भारतीय संस्कृति और मानवीय मूल्यों के संवर्धन को समर्पित किया है। नई दिल्ली के सेंट थॉमस स्कूल में दो दशकों तक हिंदी एवं संस्कृत का अध्यापन, दिल्ली विश्वविद्यालय के नेत्रहीन विद्यार्थियों के लिए दुर्लभ ग्रंथों का वाचन-रिकॉर्डिंग तथा वंचित महिलाओं के लिए सामाजिक सक्रियता—इन सभी अनुभवों की गहन मानवीय संवेदना इस कृति की पंक्तियों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है।