जल सुरक्षा, वैज्ञानिक नवाचार और उद्यमशीलता को एक साझा मंच पर लाने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए 200 करोड़ रुपये की ‘अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (एएनआरएफ)-जल शक्ति मंत्रालय महा जल परियोजना’ का शुभारंभ किया है। इस मिशन का उद्देश्य जल क्षेत्र से जुड़ी चुनौतियों के समाधान के लिए अनुसंधान, प्रौद्योगिकी विकास और स्टार्टअप नवाचारों को बढ़ावा देना है।
नई दिल्ली स्थित डॉ. अंबेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र में आयोजित जल अनुसंधान एवं विकास पर राष्ट्रीय कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा एवं अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि एएनआरएफ देश में अनुसंधान वित्तपोषण के ढांचे को अधिक समावेशी और व्यापक बना रहा है।

उन्होंने कहा कि लंबे समय तक अनुसंधान अनुदान का बड़ा हिस्सा कुछ चुनिंदा संस्थानों तक सीमित रहा, जिससे छोटे विश्वविद्यालयों, स्टार्टअप उद्यमों और उभरते नवप्रवर्तकों को पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाए। एएनआरएफ की स्थापना इसी असंतुलन को दूर करने और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र में व्यापक भागीदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की गई है।
डॉ. सिंह ने कहा कि फाउंडेशन अब संसाधनों, साझेदारियों और मिशन आधारित अनुसंधान अवसरों को देश के अधिकाधिक संस्थानों तक पहुंचा रहा है, जिससे राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप अनुसंधान और तकनीकी समाधान विकसित किए जा सकें।
उन्होंने बताया कि एएनआरएफ ने रणनीतिक महत्व वाले क्षेत्रों में ‘मिशन फॉर एडवांसमेंट ऑफ हाई-इम्पैक्ट एरियाज’ (एमएएचए) कार्यक्रम प्रारंभ किया है। इसके अंतर्गत इलेक्ट्रिक वाहन, ड्रोन, चिकित्सा प्रौद्योगिकी, 6जी संचार और जल प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में अनुसंधान से लेकर प्रौद्योगिकी विकास, परीक्षण और तैनाती तक की एकीकृत व्यवस्था तैयार की जा रही है। महा जल मिशन इसी श्रृंखला का नवीनतम और महत्वपूर्ण चरण है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस दृष्टिकोण का विस्तार है, जिसमें विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार को विकास की केंद्रीय शक्ति के रूप में देखा गया है। उन्होंने कहा कि जल शक्ति मंत्रालय के गठन ने पहली बार देश में जल संबंधी गतिविधियों को एकीकृत ढांचे के अंतर्गत लाकर जल सुरक्षा को राष्ट्रीय एजेंडा का प्रमुख विषय बनाया।
उन्होंने कहा कि महा जल मिशन वैज्ञानिक संस्थानों, उद्योग जगत, स्टार्टअप, शोध संगठनों और जमीनी स्तर के हितधारकों को जोड़कर जल क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक और व्यवहारिक समाधान विकसित करने का प्रयास करेगा।
भारत के बढ़ते स्टार्टअप परिदृश्य का उल्लेख करते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि लगभग एक दशक पहले जहां देश में 350 से 400 स्टार्टअप सक्रिय थे, वहीं आज उनकी संख्या दो लाख से अधिक हो चुकी है। इस क्षेत्र ने लगभग 20 से 24 लाख रोजगार सृजित किए हैं और यह नवाचार आधारित आर्थिक विकास का एक प्रमुख आधार बनकर उभरा है।
उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य ऐसे स्टार्टअप को केवल व्यावसायिक सफलता तक सीमित न रखते हुए राष्ट्रीय चुनौतियों के समाधान में भागीदार बनाना है। महा जल मिशन इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए जल संरक्षण, जल गुणवत्ता, भूजल प्रबंधन और जल उपयोग दक्षता जैसे क्षेत्रों में उद्यमशीलता आधारित समाधानों को प्रोत्साहित करेगा।
कार्यक्रम में अंतरिक्ष क्षेत्र में हुए सुधारों का उल्लेख करते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में लागू नीतिगत परिवर्तनों ने भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को नई गति प्रदान की है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का आकार लगभग 9 बिलियन अमेरिकी डॉलर है, जिसके आगामी वर्षों में 40 से 45 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने की संभावना है।
उन्होंने कहा कि अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी अब केवल वैज्ञानिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है, बल्कि शासन, कृषि, अवसंरचना विकास, संसाधन मानचित्रण और सार्वजनिक सेवाओं में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इसी अनुभव का उपयोग अब जल संसाधनों के वैज्ञानिक प्रबंधन में किया जाएगा।
डॉ. सिंह ने जल शक्ति मंत्रालय और अंतरिक्ष विभाग/इसरो के बीच हुए समझौता ज्ञापन को जल प्रबंधन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम बताते हुए कहा कि उपग्रह तकनीक, भू-स्थानिक डेटा और वैज्ञानिक विश्लेषण जल संसाधनों के मानचित्रण, भूजल मूल्यांकन, सिंचाई नियोजन और बुनियादी ढांचे के विकास में नई संभावनाएं खोल रहे हैं।
राष्ट्रीय कार्यशाला के दौरान डॉ. जितेंद्र सिंह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल ने संयुक्त रूप से एएनआरएफ-जल शक्ति मंत्रालय महा जल मिशन का शुभारंभ किया। इस अवसर पर मिशन दस्तावेज जारी किया गया तथा प्रस्तावों के लिए खुला आमंत्रण भी घोषित किया गया। स्टार्टअप और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को उत्पाद एवं प्रोटोटाइप विकास के लिए आवेदन करने का अवसर दिया गया है।
कार्यक्रम के दौरान जल संसाधन विभाग और अंतरिक्ष विभाग/इसरो के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए। साथ ही ‘जल संचय जन भागीदारी-नागरिक ट्रैकिंग एवं रिपोर्टिंग’ (जेएसजेबी-सीटीआर) पोर्टल और मोबाइल एप्लिकेशन का भी शुभारंभ किया गया।
महा जल मिशन को विज्ञान, उद्योग, उद्यमिता और सामुदायिक सहभागिता के समन्वित मंच के रूप में विकसित किया जा रहा है। एएनआरएफ और जल शक्ति मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से वित्तपोषित इस कार्यक्रम का कुल अनुमानित परिव्यय पांच वर्षों में 200 करोड़ रुपये होगा।
इस मिशन के अंतर्गत विश्वविद्यालयों, राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं, अनुसंधान संस्थानों, स्टार्टअप, एमएसएमई और उद्योग साझेदारों के बहु-विषयक संघों को प्रोत्साहित किया जाएगा। चयनित परियोजनाओं को प्रौद्योगिकी विकास, क्षेत्रीय परीक्षण, सत्यापन और कार्यान्वयन के लिए 20 करोड़ रुपये तक की सहायता प्रदान की जाएगी।
मिशन पांच प्रमुख विषयों पर केंद्रित रहेगा—जल संसाधन मूल्यांकन एवं सतत प्रबंधन, पेयजल सुरक्षा, जल गुणवत्ता एवं पारिस्थितिक स्वास्थ्य, जल उपयोग दक्षता एवं सर्कुलर अर्थव्यवस्था तथा जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन क्षमता। इसका उद्देश्य प्रयोगशाला स्तर पर विकसित तकनीकों को जमीनी स्तर तक पहुंचाकर जल सुरक्षा के लिए टिकाऊ और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप समाधान तैयार करना है।
केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल ने कहा कि भारत की विकास यात्रा में जल सुरक्षा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने अनुसंधान, तकनीकी नवाचार और जनभागीदारी के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर बल देते हुए विश्वास व्यक्त किया कि महा जल मिशन देश के जल क्षेत्र में ठोस और व्यापक परिवर्तन लाने में सहायक सिद्ध होगा।
राष्ट्रीय कार्यशाला में नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, स्टार्टअप प्रतिनिधियों, उद्योग जगत, एमएसएमई और विभिन्न राज्यों के जल संसाधन विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया। कार्यशाला के दौरान जल संसाधन प्रबंधन, भूजल संरक्षण, जलवायु अनुकूलन और जल गुणवत्ता से संबंधित अनुसंधान अध्ययनों तथा उभरती प्रौद्योगिकियों पर भी विस्तृत प्रस्तुतियां दी गईं।