पहले रूठती थी तो पापा जी झट से मुझे
गुदगुदी करते, गोदी में झूला झुलाते, या उठाकर उछालते
या कोई भी तरीका हो, पर मनाते ज़रूर थे।
अब रूठती हूँ तो बस खामोश रह जाती हूँ
पापा जी की तरह कोई लाड़ नहीं लड़ाता
न ही कोई मनाता है।
पहले रूठती थी तो भाव खाती थी, इठलाती थी
मन ही मन झूमती थी
कि मैं नखरे दिखाऊँगी, खूब मुँह फुलाऊँगी।
पहले रूठने में एक मज़ा था
पर अब जब-जब मैं रूठती हूँ
मैं भीतर से गुमसुम, खामोश ही रहती हूँ
पर नहीं समझ पाता मेरा रूठना कोई
न ही कोई मनाता है।
बस खुद ही खुद को समझा
हर सुबह तरोताज़ा हवा सी बहने लग जाती हूँ।
पहले भी रूठती थी, अब भी रूठती हूँ
फ़र्क है कि अब मैं पापा जी की लाडो नहीं
अब मैं अधिकार नहीं, सिर्फ कर्तव्य हूँ।”

अध्यापिका,लेखिका , मोटिवेशनल स्पीकर