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वृक्ष : पृथ्वी की साँस, मानवता की आस

विश्व वृक्ष दिवस 28 जून पर विशेष-

प्रकृति ने मनुष्य को अनेक अनुपम उपहार दिए हैं, किन्तु उनमें वृक्ष सबसे अनमोल हैं। वृक्ष केवल हरियाली का प्रतीक नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के जीवनदाता हैं। वे निस्वार्थ भाव से हमें प्राणवायु, छाया, फल, फूल, औषधियाँ, वर्षा, जल संरक्षण, जैव विविधता तथा जीवन का आधार प्रदान करते हैं। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में वृक्षों को केवल वनस्पति नहीं, बल्कि देवत्व का स्वरूप माना गया है। पीपल, वट, नीम, तुलसी, आँवला और बेल जैसे वृक्षों की पूजा केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण की हमारी प्राचीन वैज्ञानिक परंपरा का परिचायक है।

आज जब पृथ्वी जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा, जल संकट, प्रदूषण और जैव विविधता के विनाश जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है, तब विश्व वृक्ष दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि समूची मानव सभ्यता के आत्ममंथन का दिवस है। यह हमें याद दिलाता है कि यदि वृक्ष सुरक्षित हैं, तो हमारा भविष्य भी सुरक्षित है।

दुर्भाग्यवश विकास की अंधी दौड़ में हमने जंगलों को कंक्रीट के जंगलों में बदल दिया। चौड़ी सड़कों, ऊँची इमारतों, उद्योगों और आधुनिक सुविधाओं के विस्तार के लिए लाखों वृक्ष काट दिए गए। परिणामस्वरूप पृथ्वी का संतुलन डगमगाने लगा। 

कहीं भीषण गर्मी, कहीं बाढ़, कहीं सूखा, तो कहीं असमय वर्षा और प्राकृतिक आपदाएँ हमारे सामने विकराल रूप में खड़ी हैं। प्रकृति बार-बार संकेत दे रही है कि यदि हमने समय रहते वृक्षों का महत्व नहीं समझा, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी क्षमा नहीं करेंगी। एक परिपक्व वृक्ष प्रतिवर्ष सैकड़ों किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर वातावरण को शुद्ध करता है। वह असंख्य पक्षियों, जीव-जंतुओं और सूक्ष्म जीवों का आश्रय बनता है। उसकी जड़ें मिट्टी को कटाव से बचाती हैं, भूजल स्तर को बनाए रखती हैं और वर्षा चक्र को संतुलित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वस्तुतः एक वृक्ष अपने जीवनकाल में जितना देता है, उसका मूल्य धन से कभी नहीं आँका जा सकता।अब आवश्यकता केवल वृक्ष लगाने की नहीं, बल्कि उन्हें जीवित रखने की है। अक्सर अभियान के दौरान पौधे लगाए जाते हैं, परंतु उनकी देखभाल नहीं हो पाती।

वास्तविक वृक्षारोपण तब सफल माना जाएगा जब लगाया गया प्रत्येक पौधा विशाल वृक्ष बनकर आने वाली पीढ़ियों को छाया दे। इसलिए प्रत्येक नागरिक को अपने जन्मदिन, विवाह, पुण्यतिथि, राष्ट्रीय पर्व या किसी भी विशेष अवसर पर कम से कम एक पौधा अवश्य लगाना चाहिए और उसकी जिम्मेदारी भी स्वयं लेनी चाहिए।विद्यालयों, महाविद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं, पंचायतों, नगर निकायों और स्वयंसेवी संगठनों को मिलकर जन-जागरण का व्यापक अभियान चलाना होगा। बच्चों के मन में प्रकृति के प्रति प्रेम, संवेदनशीलता और उत्तरदायित्व का भाव बचपन से ही विकसित करना होगा। जब प्रत्येक परिवार हर वर्ष कम से कम एक वृक्ष लगाएगा और उसकी रक्षा करेगा, तभी हरियाली का वास्तविक विस्तार संभव होगा।

छत्तीसगढ़ जैसी वनसमृद्ध धरती, जिसे “धान का कटोरा” कहा जाता है, वहाँ वृक्ष केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि संस्कृति, लोकजीवन और आजीविका का भी आधार हैं। साल, सागौन, महुआ, तेंदू, चार, हर्रा, बहेरा और बाँस जैसे वृक्ष यहाँ की लोक संस्कृति, जनजातीय जीवन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धड़कन हैं। इनका संरक्षण केवल पर्यावरण की रक्षा नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत को बचाने का भी संकल्प है।

इस दिवस हमें हमें यह प्रेरणा लेनी होगी कि हम केवल पर्यावरण की चिंता करने वाले दर्शक न बनें, बल्कि उसके सजग प्रहरी बनें। याद रखिए, वृक्ष लगाने वाला व्यक्ति केवल एक पौधा नहीं रोपता, वह भविष्य की साँसें बोता है, आने वाली पीढ़ियों के लिए आशा का बीज रोपता है और धरती माँ के प्रति अपना ऋण चुकाने का प्रयास करता है।

इस विश्व वृक्ष दिवस पर हम सभी यह संकल्प लें कि “एक व्यक्ति – एक वृक्ष” नहीं, बल्कि “एक व्यक्ति – अनेक वृक्ष और उनका संरक्षण” हमारा जीवन मंत्र बने। क्योंकि वृक्ष बचेंगे, तभी प्रकृति मुस्कुराएगी; प्रकृति मुस्कुराएगी, तभी मानवता सुरक्षित रहेगी। आओ हम सब संकल्प लें-

“वृक्ष लगाएँ, वृक्ष बचाएँ;
धरती माँ का ऋण चुकाएँ।
हर आँगन हरियाली हो,
जीवन में खुशहाली हो।”
हर पत्ती में जीवन गाए,
हर डाली में प्यार रहे,
धरती का हर आँचल फिर
से हरियाली से सरोबार रहे।
आओ मिलकर वृक्ष उगाएँ,
यही सदी का सबसे बड़ा धर्म,
वृक्ष बचेंगे तो बचेगा मानव
बचेगी प्रकृति और समूचा कर्म।।
विश्व वृक्ष दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
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