वैज्ञानिक अनुसंधान का वास्तविक महत्व तब सामने आता है, जब प्रयोगशालाओं में विकसित ज्ञान और तकनीक समाज के जीवन से जुड़कर किसानों, विद्यार्थियों, उद्यमियों, उद्योगों और आम नागरिकों के लिए उपयोगी बनती है। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा एवं अंतरिक्ष राज्य मंत्री तथा वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के उपाध्यक्ष डॉ. जितेंद्र सिंह ने लखनऊ में एक महत्वपूर्ण पर्यावरण-शैक्षिक पहल ‘प्रकृति ज्ञान धाम’ राष्ट्र को समर्पित किया।

बंथरा स्थित महर्षि पाराशर बायोरिसोर्स सेंटर (एमपीबीसी) परिसर में सीएसआईआर-राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर-एनबीआरआई) द्वारा विकसित यह अपनी तरह का पहला इको-एजुकेशनल हब है। इसका उद्देश्य केवल पौधों और वनस्पतियों का संरक्षण करना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक अनुसंधान, पर्यावरण शिक्षा, जैव विविधता, भारतीय वनस्पति विरासत और सांस्कृतिक इतिहास को एक साझा मंच पर लाकर लोगों को प्रकृति के साथ अधिक गहरे स्तर पर जोड़ना है।
इस अवसर पर डॉ. जितेंद्र सिंह ने वैज्ञानिक संस्थानों से आह्वान किया कि वे अपनी प्रयोगशालाओं और संस्थागत परिसरों तक सीमित न रहें, बल्कि अपने अनुसंधान, सफल तकनीकों और सामाजिक उपयोगिता वाले प्रयोगों को व्यापक स्तर पर समाज के सामने लाएं। उनका कहना था कि वैज्ञानिक संस्थानों की उपलब्धियों को व्यवस्थित ढंग से प्रदर्शित किया जाना चाहिए, ताकि उनके वास्तविक लाभार्थियों तक वैज्ञानिक समाधान और आजीविका सृजन के अवसर आसानी से पहुंच सकें।
डॉ. सिंह ने वैज्ञानिक उपलब्धियों को आम लोगों तक पहुंचाने में डिजिटल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। आज सूचना के प्रसार के साधन तेजी से बदल रहे हैं। ऐसे में वैज्ञानिक संस्थानों के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वे अपने शोध और तकनीकी उपलब्धियों को केवल शोध-पत्रों या प्रयोगशाला रिपोर्टों तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें किसानों, विद्यार्थियों, उद्यमियों, उद्योग जगत और अन्य संभावित उपयोगकर्ताओं की भाषा और जरूरत के अनुरूप प्रस्तुत करें। ‘प्रकृति ज्ञान धाम’ इसी व्यापक दृष्टिकोण का एक उदाहरण बनकर सामने आया है।
इको-एजुकेशनल हब को भारत की समृद्ध वनस्पति एवं सांस्कृतिक विरासत के जीवंत संग्रहालय के रूप में विकसित किया गया है। इसकी विशेषता यह है कि यहां प्रकृति को केवल देखने का अवसर नहीं मिलता, बल्कि उसके वैज्ञानिक, पर्यावरणीय, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पक्षों को समझने का भी अवसर उपलब्ध कराया गया है। विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं, शिक्षकों, प्रकृति प्रेमियों और आम नागरिकों के लिए यह स्थान अनुभवात्मक शिक्षा का केंद्र बनने की क्षमता रखता है।
यह पहल वैज्ञानिक ज्ञान और जनभागीदारी के बीच एक प्रत्यक्ष संपर्क स्थापित करती है। भारत जैसे जैव विविधता से समृद्ध देश में वनस्पतियों का महत्व केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है। अनेक पौधे हमारी औषधीय परंपराओं, कृषि व्यवस्था, लोक संस्कृति, धार्मिक आस्थाओं, पारंपरिक ज्ञान, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और स्थानीय आजीविकाओं का भी हिस्सा रहे हैं। इस व्यापक संदर्भ को ध्यान में रखते हुए हब में विभिन्न सुविधाओं का विकास किया गया है, जिनके माध्यम से आगंतुक भारतीय वनस्पति विविधता और उसके संरक्षण की आवश्यकता को प्रत्यक्ष रूप से समझ सकते हैं।
इस हब की प्रमुख विशेषताओं में ‘पावन पथ’ शामिल है। पावन पथ का विस्तृत नाम ‘प्लांट्स एंड एसोसिएटेड वेजीटेशन्स फॉर एप्रीशिएटिंग नेचर’ है। इसे प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत स्थलों तथा पर्यटन सुविधाओं के क्षेत्रीय नेटवर्क के रूप में विकसित किया गया है। यह परिसर के प्रमुख अनुभवात्मक घटकों में से एक है। इस पथ के माध्यम से आगंतुकों को विभिन्न पारिस्थितिक क्षेत्रों और उनसे संबंधित वनस्पतियों का प्रतिनिधित्व करने वाले पौधों के विशेष संग्रह से परिचित कराया जाता है।
‘प्रकृति ज्ञान धाम’ का भारतीय विरासत उद्यान भी अपने आप में विशेष महत्व रखता है। इस उद्यान में देश के विभिन्न ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थानों से जुड़े विरासत वृक्षों को संरक्षित किया गया है। इनमें फतेहपुर का बावन इमली वृक्ष विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिसका संबंध 52 स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान से जोड़ा जाता है। इसी प्रकार लखनऊ के मदर दशहरी आम के वृक्ष, प्रयागराज के पातालपुरी बरगद, चंपारण के भितिहरवा में महात्मा गांधी द्वारा लगाए गए आम के वृक्ष और गुजरात के ऐतिहासिक दांडी मार्च मार्ग से जुड़े वृक्षों के वंशजों को भी इस उद्यान में स्थान दिया गया है।
इन विरासत वृक्षों की उपस्थिति वनस्पति संरक्षण को इतिहास और संस्कृति से जोड़ती है। एक वृक्ष यहां केवल वनस्पति की एक प्रजाति नहीं रह जाता, बल्कि वह किसी ऐतिहासिक घटना, आंदोलन, स्थान या सामाजिक स्मृति का जीवंत प्रतीक बन जाता है। इस दृष्टि से भारतीय विरासत उद्यान नई पीढ़ी को इतिहास और पर्यावरण दोनों से जोड़ने का प्रभावी माध्यम बन सकता है।
उद्यान में लगाए गए क्यूआर-कोड आधारित ऑडियो सिस्टम इस पहल को आधुनिक तकनीक से भी जोड़ते हैं। आगंतुक अपने स्मार्टफोन के माध्यम से संबंधित विरासत वृक्षों के बारे में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और वनस्पति संबंधी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इससे पारंपरिक उद्यान व्यवस्था को डिजिटल और संवादात्मक स्वरूप मिलता है तथा आगंतुकों को अपनी गति और रुचि के अनुसार जानकारी हासिल करने की सुविधा मिलती है।
हब में ‘विभव एन्क्लेव’ के नाम से भारत के संकटग्रस्त पौधों का एक विशेष उद्यान भी विकसित किया गया है। दुर्लभ, लुप्तप्राय और संकटग्रस्त पौधों की प्रजातियों के संरक्षण को समर्पित यह क्षेत्र जैव विविधता के सामने मौजूद गंभीर चुनौतियों को समझने का अवसर देता है। आवासों का क्षरण, जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता में कमी और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव आज दुनिया के सामने बड़ी पर्यावरणीय चुनौतियां हैं। ऐसे में पौधों के आनुवंशिक संसाधनों का संरक्षण भविष्य की पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।
इसी क्रम में ‘भैरव एन्क्लेव’ में भारत के राज्य पौधों को प्रदर्शित किया गया है। देश के विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा आधिकारिक रूप से घोषित राज्य पौधों को एक स्थान पर प्रदर्शित करने वाली यह पहल वनस्पति विविधता को देश की क्षेत्रीय पहचान से जोड़ती है। इन पौधों के पारिस्थितिक, सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक महत्व को भी सामने लाया गया है। इससे आगंतुकों को यह समझने में सहायता मिलती है कि विभिन्न क्षेत्रों की वनस्पतियां वहां की भौगोलिक परिस्थितियों के साथ-साथ स्थानीय संस्कृति और पहचान का भी हिस्सा होती हैं।
‘बैंबूस्टीयम’ भी हब का एक प्रमुख आकर्षण है। यहां 43 देशी और विदेशी बांस प्रजातियों को संरक्षित किया गया है। बांस को लंबे समय से पारंपरिक निर्माण, हस्तशिल्प और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ा जाता रहा है, लेकिन आधुनिक संदर्भ में इसकी उपयोगिता इससे कहीं अधिक व्यापक है। यह पारिस्थितिक पुनर्स्थापना, कार्बन अवशोषण, मृदा संरक्षण, हरित अवसंरचना और टिकाऊ आजीविका के लिए महत्वपूर्ण जैव-संसाधन के रूप में उभर रहा है। बांस आधारित गतिविधियां ग्रामीण और स्थानीय स्तर पर रोजगार तथा उद्यमिता के नए अवसर भी पैदा कर सकती हैं।
‘प्रकृति ज्ञान धाम’ की विशेषता केवल पर्यावरण और वनस्पति शिक्षा तक सीमित नहीं है। कार्यक्रम के दौरान विज्ञान को उद्यमिता, उद्योग और आजीविका से जोड़ने वाली कई पहलों को भी सामने रखा गया। हिमालया के सहयोग से विकसित पुरुष प्रजनन स्वास्थ्य के लिए एक हर्बल फॉर्मूलेशन का औपचारिक शुभारंभ किया गया। यह उदाहरण दर्शाता है कि वैज्ञानिक संस्थानों में विकसित वनस्पति आधारित अनुसंधान को उपयुक्त औद्योगिक सहयोग के माध्यम से उपयोगी उत्पादों में बदला जा सकता है।
महिलाओं के नेतृत्व वाले उद्यमिता और आजीविका सृजन को बढ़ावा देने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठाया गया। चार पौध-आधारित प्रौद्योगिकियां—हर्बल एंटी-डैंड्रफ हेयर केयर ऑयल, फ्रोटस कमल से प्रेरित परफ्यूम, फ्रोटस रुद्र परफ्यूम और हर्बल नैनो सीरम—केरल के कुडुंबश्री राज्य गरीबी उन्मूलन मिशन को हस्तांतरित की गईं। इन तकनीकों का उद्देश्य विज्ञान आधारित मूल्यवर्धित उत्पादों के माध्यम से महिलाओं के लिए उद्यमिता और आय के अवसरों को मजबूत करना है।
यह पहल इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि वैज्ञानिक अनुसंधान का लाभ तभी व्यापक माना जा सकता है, जब वह रोजगार और आर्थिक गतिविधियों से भी जुड़े। पौध-आधारित संसाधनों पर आधारित उत्पादों में स्थानीय स्तर पर उत्पादन, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और विपणन की संभावनाएं मौजूद हैं। यदि वैज्ञानिक संस्थान, महिला समूह, सहकारी संस्थाएं और उद्योग मिलकर काम करें तो अनुसंधान आधारित तकनीकें ग्रामीण और अर्धशहरी अर्थव्यवस्था में नई गतिविधियों को जन्म दे सकती हैं।
उद्योग और अकादमिक क्षेत्र के बीच सहयोग को मजबूत करने की दिशा में सीएसआईआर-एनबीआरआई ने लखनऊ स्थित विटवेक सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड को कम लागत वाले फोटोबायोरिएक्टर के डिजाइन और विकास से संबंधित तकनीक भी हस्तांतरित की। यह प्रौद्योगिकी हस्तांतरण इस बात का उदाहरण है कि वैज्ञानिक संस्थानों में विकसित अनुसंधान को उद्योग के माध्यम से व्यापक तकनीकी अनुप्रयोगों तक पहुंचाया जा सकता है। शोध संस्थानों और उद्योग के बीच ऐसे सहयोग से प्रयोगशाला स्तर पर विकसित तकनीकों को व्यावसायिक और सामाजिक उपयोग के लिए आगे बढ़ाने की संभावना बढ़ती है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने इसी संदर्भ में वैज्ञानिक संस्थानों के सफल प्रयोगों और तकनीकी उपलब्धियों के प्रभावी जनसंचार पर जोर दिया। वैज्ञानिक उपलब्धियों की जानकारी केवल उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय संभावित उपयोगकर्ताओं को यह बताना आवश्यक है कि कोई तकनीक उनके लिए किस प्रकार उपयोगी हो सकती है। यदि किसी वैज्ञानिक खोज से खेती की लागत कम हो सकती है, किसी उत्पाद की गुणवत्ता बढ़ सकती है, रोजगार पैदा हो सकता है या पर्यावरणीय नुकसान कम किया जा सकता है तो उस उपयोगिता को समाज तक स्पष्ट रूप से पहुंचाना वैज्ञानिक संचार का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए।
उन्होंने विभिन्न विभागों, मंत्रालयों और संस्थानों के बीच समन्वय और एकीकरण की आवश्यकता पर भी बल दिया। कई बार अलग-अलग संस्थानों में समान या पूरक उद्देश्यों पर काम होता है। यदि इन प्रयासों को एक-दूसरे से जोड़ा जाए तो संसाधनों का बेहतर उपयोग होने के साथ-साथ अनुसंधान के परिणामों का प्रभाव भी अधिक व्यापक बनाया जा सकता है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बहु-संस्थागत सहयोग आने वाले समय में ऐसे समाधानों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, जो पर्यावरण, कृषि, स्वास्थ्य, उद्योग और आजीविका जैसे विभिन्न क्षेत्रों को एक साथ प्रभावित करते हैं।
डॉ. सिंह ने सीएसआईआर-एनबीआरआई के पौध विज्ञान अनुसंधान को किसानों, उद्योग और आम जनता के लिए उपयोगी तकनीकों एवं उत्पादों में बदलने के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ जोड़ने की आवश्यकता पर भी बल दिया। भारत की वनस्पति परंपरा में सदियों से संचित ज्ञान मौजूद है। आधुनिक वैज्ञानिक पद्धतियों के माध्यम से इस ज्ञान का अध्ययन, प्रमाणीकरण और उपयोग किया जाए तो पर्यावरणीय चुनौतियों के समाधान के साथ-साथ नए आर्थिक अवसर भी विकसित किए जा सकते हैं।
कार्यक्रम के दौरान भारत के विरासत उद्यानों पर आधारित एक वृत्तचित्र भी जारी किया गया। इसमें देश की वनस्पति संपदा और पौध विविधता से जुड़े सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और पारिस्थितिक महत्व को प्रस्तुत किया गया है। ऐसे दृश्य माध्यम वनस्पति संरक्षण के विषय को आम दर्शकों तक पहुंचाने में प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं, क्योंकि वे वैज्ञानिक तथ्यों के साथ स्थान, इतिहास और मानवीय अनुभव को भी जोड़ते हैं।
कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के सलाहकार (स्वास्थ्य) डॉ. जी.एन. सिंह, केंद्रीय विश्वविद्यालय ओडिशा के कुलपति डॉ. अजीत कुमार शासनी, सीएसआईआर-एनबीआरआई एवं सीएसआईआर-आईआईआईएम जम्मू के निदेशक डॉ. ज़बीर अहमद, वरिष्ठ वैज्ञानिक, शोधकर्ता, सीएसआईआर फ्लोरीकल्चर मिशन के किसान लाभार्थी तथा अन्य आमंत्रित अतिथि उपस्थित रहे।
इससे पहले अतिथियों का स्वागत करते हुए सीएसआईआर-एनबीआरआई एवं सीएसआईआर-आईआईआईएम जम्मू के निदेशक डॉ. ज़बीर अहमद ने पौध विज्ञान अनुसंधान, संरक्षण और प्रौद्योगिकी विकास में संस्थान के योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इको-एजुकेशनल हब की कल्पना भारत की वनस्पति विविधता के जीवंत संग्रहालय के रूप में की गई है, जहां आगंतुक संवादात्मक और अनुभवात्मक माध्यम से देश की वनस्पति विरासत से जुड़ सकेंगे।
बंथरा स्थित एमपीबीसी परिसर में विकसित यह हब आने वाले समय में अनुभवात्मक शिक्षण और जनभागीदारी के लिए राष्ट्रीय स्तर का गंतव्य बनने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। इसकी अवधारणा में वनस्पति विविधता, जैव संरक्षण, सांस्कृतिक विरासत, वैज्ञानिक जनसंपर्क और तकनीकी नवाचार को एक साथ जोड़ा गया है। जीवंत पौध संग्रहों से लेकर विरासत वृक्षों, संकटग्रस्त पौधों, राज्य पौधों, बांस प्रजातियों और डिजिटल सूचना प्रणालियों तक, यहां विज्ञान को लोगों के दैनिक अनुभव से जोड़ने का प्रयास दिखाई देता है।
आज जब जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता में कमी और प्राकृतिक संसाधनों के असंतुलित उपयोग जैसी चुनौतियां लगातार गंभीर हो रही हैं, तब समाज में पर्यावरणीय चेतना विकसित करना केवल विद्यालयों या विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी नहीं रह गई है। वैज्ञानिक संस्थानों की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है। ‘प्रकृति ज्ञान धाम’ जैसी पहलें इसी जिम्मेदारी को सार्वजनिक भागीदारी के माध्यम से आगे बढ़ाती हैं।
इस परियोजना की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यही है कि यहां पौधों को केवल वैज्ञानिक नमूनों के रूप में नहीं, बल्कि प्रकृति, इतिहास, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और मानव जीवन के बीच संबंधों के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। विरासत वृक्ष अतीत की स्मृतियों को जीवित रखते हैं, संकटग्रस्त पौधों का उद्यान संरक्षण की आवश्यकता का संदेश देता है, राज्य पौधों का संग्रह भारत की क्षेत्रीय विविधता को सामने लाता है और बैंबूस्टीयम टिकाऊ संसाधनों की संभावनाओं को रेखांकित करता है।
वहीं प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की पहलें यह संदेश देती हैं कि वैज्ञानिक अनुसंधान का अंतिम पड़ाव प्रयोगशाला नहीं है। जब शोध किसान तक पहुंचता है, उद्योग के साथ जुड़ता है, महिलाओं के लिए उद्यमिता का आधार बनता है या किसी पर्यावरणीय समस्या के समाधान में योगदान देता है, तभी उसका सामाजिक प्रभाव व्यापक रूप से सामने आता है।
‘प्रकृति ज्ञान धाम’ इसी विचार को एक संस्थागत रूप देने का प्रयास है। यह विज्ञान और समाज के बीच संवाद को मजबूत करने के साथ-साथ भारत की वनस्पति विरासत के संरक्षण और उसके प्रति जन-जागरूकता बढ़ाने का माध्यम बन सकता है। यदि इस केंद्र की गतिविधियों को निरंतर वैज्ञानिक कार्यक्रमों, शैक्षिक यात्राओं, शोध गतिविधियों, डिजिटल सामग्री और उद्योग एवं समुदाय आधारित पहलों से जोड़ा जाता है, तो यह आने वाले वर्षों में पर्यावरण शिक्षा और वैज्ञानिक जनसंपर्क का एक उल्लेखनीय मॉडल बन सकता है।
लखनऊ में स्थापित यह इको-एजुकेशनल हब इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह विकास और संरक्षण के बीच संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित करता है। विज्ञान का उद्देश्य केवल नई खोज करना नहीं, बल्कि उन खोजों को मानव समाज और प्रकृति के हित में उपयोगी बनाना भी है। ‘प्रकृति ज्ञान धाम’ इसी सोच को मूर्त रूप देते हुए विज्ञान, पर्यावरण, विरासत और आजीविका को एक साझा मंच पर लाता है। आने वाली पीढ़ियों के लिए यह पहल प्रकृति को समझने, उसकी विविधता का सम्मान करने और वैज्ञानिक सोच के साथ उसके संरक्षण की जिम्मेदारी निभाने की दिशा में महत्वपूर्ण आधार तैयार कर सकती है।