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“आदिवासी समाज : प्रकृति, संस्कृति और मानव सभ्यता के अनमोल प्रहरी”

9 अगस्त – विश्व आदिवासी दिवस पर  विशेष

प्रतिवर्ष विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य विश्वभर के आदिवासी समुदायों की अस्मिता, संस्कृति, परंपराओं, भाषाओं तथा उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 1994 में इस दिवस को मनाने की घोषणा की थी। यह दिन हमें यह स्मरण कराता है कि आदिवासी केवल किसी भूभाग के मूल निवासी ही नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव सभ्यता के सबसे प्राचीन संरक्षक भी हैं।

भारत विविधताओं का देश है और यहाँ आदिवासी समाज हमारी सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग है। देश की कुल जनसंख्या का लगभग 8 से 9 प्रतिशत हिस्सा अनुसूचित जनजातियों का है। छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात तथा पूर्वोत्तर के अनेक राज्यों में आदिवासी समाज अपनी विशिष्ट पहचान के साथ आज भी अपनी परंपराओं को जीवित रखे हुए है।

छत्तीसगढ़ को आदिवासी संस्कृति की जीवंत भूमि कहा जाता है। यहाँ गोंड, बैगा, हल्बा, मुरिया, मारिया, उरांव, कमार, बिरहोर सहित अनेक जनजातियाँ अपनी अनूठी सांस्कृतिक परंपराओं के साथ निवास करती हैं। इनके लोकनृत्य, लोकगीत, पर्व-त्योहार, हस्तशिल्प, चित्रकला और जीवन-दर्शन भारतीय संस्कृति को समृद्ध बनाते हैं।

आदिवासी समाज का प्रकृति से गहरा आत्मीय संबंध है। जंगल उनके लिए केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार और आस्था का केंद्र है। वे जल, जंगल और जमीन को पूज्य मानते हैं। पर्यावरण संरक्षण का जो संदेश आज आधुनिक विश्व दे रहा है, उसे आदिवासी समाज सदियों से अपने जीवन में अपनाए हुए है। प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग और जैव विविधता का संरक्षण उनके जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है।

वर्तमान समय में आदिवासी समाज अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पलायन, विस्थापन, भूमि अधिकार, वन अधिकार तथा पारंपरिक भाषाओं का संरक्षण आज भी महत्वपूर्ण विषय हैं। विकास की दौड़ में यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि उनकी संस्कृति और पहचान सुरक्षित रहे। विकास ऐसा हो जो उनकी सहभागिता और सम्मान के साथ आगे बढ़े।

भारत सरकार तथा विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और वनाधिकार के क्षेत्र में अनेक योजनाएँ संचालित की जा रही हैं। इन प्रयासों के साथ समाज का भी यह दायित्व है कि वह आदिवासी समुदायों को समान सम्मान दे तथा उनकी संस्कृति से सीखने का प्रयास करे।

अब आवश्यकता केवल आदिवासी समाज के विकास की नहीं, बल्कि उनकी ज्ञान-परंपरा से सीखने की भी है। जल संरक्षण, जैव विविधता, सामुदायिक जीवन, प्राकृतिक चिकित्सा तथा पर्यावरण संतुलन जैसे विषयों पर आदिवासी समाज का अनुभव आधुनिक दुनिया के लिए अत्यंत उपयोगी है।

विश्व आदिवासी दिवस हमें यह बताता है कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक समृद्धि उसकी सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक समरसता में निहित होती है। आदिवासी समाज का सम्मान केवल एक समुदाय का सम्मान नहीं, बल्कि मानवता, प्रकृति और भारतीय संस्कृति की जड़ों का सम्मान है। इस विश्व आदिवासी दिवस पर हम संकल्प लें कि आदिवासी समाज की संस्कृति, भाषा, परंपराओं और अधिकारों की रक्षा करेंगे तथा उनके ज्ञान और जीवन मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुँचाने में अपना योगदान देंगे।

“जब पूरी दुनिया पर्यावरण संकट, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से जूझ रही है, तब आदिवासी समाज का जीवन-दर्शन मानव सभ्यता के लिए एक प्रेरणादायी मार्गदर्शक बनकर सामने आता है। प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व, सामुदायिक जीवन और संसाधनों के संतुलित उपयोग का जो संदेश आदिवासी समाज सदियों से देता आया है, वही आज विश्व के सतत विकास की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है।” “विश्व आदिवासी दिवस केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी दिन है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि आदिवासी समाज विकास की मुख्यधारा में सहभागी बने, पर उसकी संस्कृति, भाषा, परंपराएँ और प्रकृति से उसका आत्मीय रिश्ता अक्षुण्ण रहे। यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी उन मूल निवासियों के प्रति, जिन्होंने सदियों से धरती, जंगल और मानवता की धरोहर को सुरक्षित रखा है।”

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
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